कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
Kalpana Ramani
"वह जिनकी क़लम परिवार के लिए दीप थी।" "Whose pen was a lamp for her family." "उनहीं जी क़लम घर वारन लाइ डीवो हुई।"

परिचय A life remembered परिचयु

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

६ जून १९५१ · २७ दिसम्बर २०२३ 6 June 1951 · 27 December 2023 ६ जून १९५१ · २७ दिसम्बर २०२३

कवयित्री, माँ, दादी। तीन भूमिकाएँ, एक स्वर। उज्जैन की धरती से नवी मुंबई के क्षितिज तक। एक कोमल, अडिग जीवन। Poet, mother, grandmother. Three lives in one voice. From the soil of Ujjain to the skyline of Navi Mumbai. A gentle, unyielding life. कवयित्री, अम्मा, डाडी। ट्रिनि भूमिकाऊं, हिक आवाज़।

पत्र पहला Letter the first पहिरों ख़त ०१

साहस की पहली पंक्ति The first line of courage हिम्मत जो पहिरयों मिसरा

दादी का जन्म उज्जैन में हुआ। मध्यप्रदेश की कालिदास की धरती। उनका जन्म-नाम था अंजना रोचवानी। रिश्तों के बीच वे इन्नू दीदी कहलाईं। और उनकी बहन शुषी ने उन्हें एक नाम दिया जो जीवन भर साथ रहा। लड्डू। चार भाइयों और पाँच बहनों का भरा पूरा घर। भाई थे अड्डा, अमर, अशोक, और अरुण। बहनें थीं अड्डी, शीला, रत्ती, शुषी, और सीता। Daadi was born in Ujjain — Kalidas's earth, in Madhya Pradesh. Her birth name was Anjana Rochwani. To most of the relatives she was Innu Didi. To her sister Shushi she was Laddoo, a name that stayed with her for life. A full house of nine children. Her brothers were Adda, Amar, Ashok, and Arun. Her sisters: Addi, Sheila, Ratti, Shushi, and Sita. डाडी जो जन्मु उज्जैन में थियो। मध्यप्रदेश में, कालिदास जी धरती। हुनन जो जन्म-नालो हुयो अंजना रोचवानी। मिट-मांउसन लाइ हू इन्नू दीदी हुयूं। पंहिंजी भेण शुषी हुनन खे लड्डू सडींदी हुई, हो नालो हमेशा साथ रहियो। चार भाउ ऐं पंजि भेणूं।

बचपन से ही ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ बैठी। माँ अक्सर गर्भवती रहती थीं। पूरे घर का खाना दादी बनातीं, अपनी पढ़ाई संभालतीं, और छोटे भाई बहनों को भी पढ़ाने बैठातीं। उम्र छोटी थी; बोझ बड़ा। उसी थकान का बीज, वर्षों बाद, उनके जोड़ों में गठिया बनकर उगा। Responsibility found her early. Her mother was often expecting. The cooking, her own studies, the teaching of her younger siblings, all of it fell on her shoulders. Too much, too young. The seed of that fatigue would surface, decades later, as arthritis. बचपन मां ज़िम्मेदारी हुनन ते आ वठी। अम्मा अकसर पेट सां हुई। रसोई, पंहिंजी पढ़ाइ, नंढन भाउ-भेणन जी तालीम, सभु हुनन ते। उन्हीं थकेंदड़ुअ जो बीज, वर्षन खांपोइ, गठिया बणजी उगियो।

गणित उनके लिए कविता थी। पूरे अंक से कभी कम नहीं। परिवार का काम शहर-दर-शहर ले जाता रहा — उज्जैन, बुरहानपुर, हरसूद, तिमरनी — और हर शाला में वे प्रथम आईं। तिमरनी से ग्यारहवीं पास करने वाली वे पहली लड़की बनीं। विज्ञान चुना। पर पढ़ाई की राह बीच में ही रुक गई। उनका विवाह हो गया, श्री सुन्दरलाल रामानी से। मेरे दादा। Mathematics was her poetry. Never less than a hundred. Work took the family city to city — Ujjain, Burhanpur, Harsud, Timarni — and at every school, she came first. From Timarni she became the first girl to pass the eleventh grade. She chose science. But the road broke off too soon. She was married, to Shri Sundarlal Ramani. My grandfather. गणित हुनन लाइ कविता हुई। सदा पूरा सौ. घर वारा शहर-शहर बदलिंदा रह्या — उज्जैन, बुरहानपुर, हरसूद, तिमरनी — ऐं हर शाला में हू पहिरीं आयूं। तिमरनी मां ग्यारहवीं पास कंदड़ पहिरीं छोकरी। विज्ञान चुणियो। पर पढ़ाइ बिच में रुकी। विवाह थियो, श्री सुन्दरलाल रामानी सां। मुहिंजे डाडे सां।

बड़नगर में नया जीवन शुरू हुआ। पैसा कम था, पर सपने बहुत बड़े। पहले बेटे, अज्जू, मेरे पिता, के जन्म के बाद उन्होंने तय किया कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी, और कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ेंगे। मोहल्ले की भौंहें टेढ़ी हुईं। रिश्तेदारों ने कहा, इतना दिखावा क्यों। पर वे टसमस न हुईं। पूरी कॉलोनी की सिलाई करतीं। दिन रात सीतीं। और कपड़ों को अपने बच्चों की फ़ीस में बदल देतीं। Life began in Barnagar. The money was thin, the dreams were not. After Ajju, her firstborn, my father, came home, she made a decision that no one around her supported. Her children would study in English. In a convent school. The neighbourhood frowned. Relatives told her not to overreach. She did not bend. She sewed for the whole colony. Day and night, stitch after stitch, and turned the cloth into her children's school fees. बड़नगर में नई जीअण शुरू थी। पैसा घटि हुआ, पर सपना वडा। अज्जू, हुनन जो पहिरयों पुट, मुहिंजो पिउ, जे जन्म खांपोइ, उन्हीं तह कियो ते बारन खे अंग्रेज़ी ऐं कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ायेंदियूं। हू न रुकयूं। पूरी कॉलोनी जी सिलाइ कंदी हुई।

फिर एक रात आई जिसने सब बदल दिया। बहुत कम उम्र में, मस्तिष्क-रक्तस्राव से, दादा चले गए। कुछ ही समय बाद, उनकी सबसे छोटी बेटी, मोना, भी छूट गई। दो ज़ख़्म, एक के बाद एक। पर बीच में अज्जू थे, उनके बेटे। और पप्पल थीं, उनकी बेटी। दोनों उनकी जान। दोनों उनकी वजह। Then a night came that changed everything. A brain haemorrhage took her husband, far too young. A short while later, her youngest daughter, Mona, was gone too. Two wounds, one after the other. But Ajju was there, her son. And Pappal was there, her daughter. Both were her life. Both were her reason. पोइ हिक रात आई जा सभु बदलायो। थोरी उमिर में, दिमाग़ खूनरीज़ी सां, डाडो हलियो वियो। थोरि देर खांपोइ, हुनन जी सभ खां नंढी ध्या, मोना, पिणि छडे वियी। बि ज़ख़म, हिक खांपोइ बीअ। पर बिच में अज्जू हुयो, हुनन जो पुटु। ऐं पप्पल हुयूं, हुनन जी ध्या। बि हुनन जी जान।

जीवन ने आगे भी इम्तिहान लिए। गठिया ने जोड़ों को जकड़ लिया। अज्जू दुबई से लौटे, माँ की देखभाल के लिए। प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लिया। फिर एक के बाद एक शहर बदले। बड़नगर से उज्जैन। उज्जैन से भोपाल। भोपाल से इन्दौर। हर शहर में नया घर। और घर के बीचों-बीच, एक माँ जो कभी नहीं झुकी। Life kept testing her. The old fatigue surfaced as arthritis. Ajju came home from Dubai to look after her. She turned to naturopathy. The cities began to change. Barnagar to Ujjain. Ujjain to Bhopal. Bhopal to Indore. In each city, a new home. At the heart of each home, a mother who never bent. जीअण इम्तिहान करिंदो रहियो। गठिया जोड़न खे जकड़ियो। अज्जू दुबई मां वापस आयो, अम्मा जी ख़बरगीरीअ लाइ। प्राकृतिक इलाज लईं। शहर बदलिंदा रह्या। बड़नगर, उज्जैन, भोपाल, इन्दौर। हर शहर में नओं घरु। ऐं घरि जे बिच में, हिक अम्मा जा कडहिं नह झुकी।

Daadi smiling beside flowering parijaat
परिजात की महक के बीच। Among the parijaat in bloom. परिजात जी खुशबू में।
पत्र दूसरा Letter the second बियों ख़त ०२

क़लम जो कभी न रुकी A pen that never rested क़लम जा कडहिं न बीठी

हाई स्कूल के बाद की पढ़ाई औपचारिक नहीं रही। परंतु उनकी क़लम ने स्वाध्याय की राह पकड़ी। कंप्यूटर और इंटरनेट ने उनकी क़लम को एक नया आकाश दिया। और उसी आकाश में उनकी रचनाएँ देश और देश से बाहर तक पहुँचीं। After high school, her education was self-directed. But her pen took up the discipline of reading and writing as a vocation. Computers and the internet gave her a new sky. And in that sky, her work travelled across the country and beyond. हाई स्कूल खांपोइ औपचारिक तालीम नह थी। पर हुनन पंहिंजी पढ़ाइ पाण कई। कंप्यूटर ऐं इंटरनेट हुनन क़लम खे नओं आसमान डियो।

वे गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहा, कुण्डलिया, कह-मुकरी, हाइकु, छन्दमुक्त कविता और कहानी, सभी विधाओं में सक्रिय रहीं। 'अनुभूति' और 'अभिव्यक्ति' जैसी प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं की वे सह-संपादक थीं। प्रतिलिपि पर अकेले ७,०३,४९९ पाठकों ने उन्हें पढ़ा। She wrote across geet, navgeet, ghazal, doha, kundaliya, kah-mukri, haiku, free verse, and short fiction. She co-edited Anubhuti and Abhivyakti, two of the most respected Hindi web journals. On Pratilipi alone, 703,499 readers found her work. हू गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहो, हाइकु, छन्दमुक्त कविता ऐं कहाणी, सभनी विधाऊं में सक्रिय हुयूं।

सम्मान Recognition इज़त ऐं इनाम

  • नवांकुर पुरस्कार Navankur Puraskar नवांकुर इनाम पहले काव्य संग्रह के लिए for her debut poetry collection पहिरे काव्य संग्रह लाइ
  • कमलेश्वर स्मृति पुरस्कार Kamleshwar Smriti Puraskar कमलेश्वर यादगार इनाम कहानी 'कसाईख़ाना' के लिए for the story 'Kasaaikhana' कहाणी 'कसाईख़ाना' लाइ
  • जय-विजय रचनाकार सम्मान Jay-Vijay Rachnakar Samman जय-विजय रचनाकार सम्मान ग़ज़ल विधा में योगदान के लिए for her contribution to the ghazal form ग़ज़ल विधा में पंहिंजे योगदान लाइ
  • प्रतिलिपि कथा प्रतियोगिता Pratilipi Story Competition प्रतिलिपि कहाणी मुक़ाबलो प्रथम पुरस्कार first prize पहिरयों इनामु
  • लघुकथा प्रतियोगिता Micro-tale Competition लघुकहाणी मुक़ाबलो द्वितीय पुरस्कार second prize बियों इनामु

जीवन-रेखा A life, in passing जीअण जी लकीर

  1. १९५१1951१९५१ उज्जैन Ujjain उज्जैन ६ जून, अंजना रोचवानी का जन्म। घर में इन्नू दीदी, बहन शुषी के लिए लड्डू। 6 June. Anjana Rochwani is born. To the family she is Innu Didi; to her sister Shushi, Laddoo. ६ जून, अंजना रोचवानी जो जन्म। घरि में इन्नू दीदी, भेण शुषी लाइ लड्डू।
  2. सन ६० का दशक1960sसन ६० जो दहो उज्जैन · बुरहानपुर · हरसूद · तिमरनी Ujjain · Burhanpur · Harsud · Timarni उज्जैन · बुरहानपुर · हरसूद · तिमरनी गणित में पूरे अंक, हमेशा। चार शहरों की चार शालाएँ, हर एक में प्रथम। तिमरनी से ग्यारहवीं पास करने वाली पहली लड़की। A perfect hundred in mathematics, every time. Four schools across four towns — first at every one. The first girl from Timarni to pass the eleventh grade. गणित में सदा पूरा सौ. चार शहरन जूं चार शालाऊं, हर हिक में पहिरीं। तिमरनी मां ग्यारहवीं पास कंदड़ पहिरीं छोकरी।
  3. सन ७० का दशक1970sसन ७० जो दहो बड़नगर Barnagar बड़नगर श्री सुन्दरलाल रामानी से विवाह। बेटे अज्जू और बेटी पप्पल का जन्म। बच्चों की फ़ीस, कॉलोनी की सिलाई से। Married Shri Sundarlal Ramani. Their children arrived: Ajju, a son, and Pappal, a daughter. School fees came from stitching for the colony, day and night. श्री सुन्दरलाल रामानी सां विवाह। पुटु अज्जू ऐं ध्या पप्पल जा जन्म। फीस, कॉलोनी जी सिलाइ मां।
  4. सन ८० का दशक1980sसन ८० जो दहो घर का अंधेरा A darkness at home घर जो अंधेरो पति का असमय जाना, मस्तिष्क-रक्तस्राव से। उसके कुछ ही समय बाद, सबसे छोटी बेटी, मोना, भी विदा हुई। बीच में अज्जू और पप्पल थे, दोनों उनकी जान। A brain haemorrhage took her husband, far too young. A short while later, her youngest daughter Mona was gone too. Ajju and Pappal stayed. Both became her life. मड़स जो असमय वियणु, दिमाग़ खूनरीज़ी सां। थोरि देर खांपोइ, मोना पिणि वियी। बिच में अज्जू ऐं पप्पल, बि हुनन जी जान।
  5. सन २००० का दशक2000sसन २००० जो दहो कई शहर, एक माँ Many cities, one mother कई शहर, हिक अम्मा गठिया बढ़ा। अज्जू दुबई से लौटे, माँ की देखभाल के लिए। बड़नगर, उज्जैन, भोपाल, इन्दौर। हर शहर एक नई शुरुआत। पर माँ अडिग। Arthritis worsened. Ajju came home from Dubai to look after her. Barnagar, Ujjain, Bhopal, Indore. In each city, a new beginning. The mother never bent. गठिया वधियो। अज्जू दुबई मां वापस आयो, अम्मा जी ख़बरगीरीअ लाइ। बड़नगर, उज्जैन, भोपाल, इन्दौर।
  6. २०११2011२०११ क़लम जागी The pen awoke क़लम जागी साठ की उम्र में उन्होंने पहला लैपटॉप ख़रीदा। उसी रात कुछ टूटा और कुछ शुरू हुआ। पहले एक कविता, फिर एक ग़ज़ल, फिर एक कहानी। फिर बारह साल लगातार लिखती रहीं। योग ने गठिया को क़ाबू में रखा। In her sixties, she bought her first laptop. Something broke open that night, and something began. First a poem, then a ghazal, then a story. For the next twelve years, she did not stop. Yoga held the arthritis at bay. साठ जी उमिर में पहिरयों लैपटॉप वठियो। उन्हीं रात कुजहु टुटियो, ऐं कुजहु शुरू थियो। पहिरीं हिक कविता, पोइ ग़ज़ल, पोइ कहाणी।
  7. २०१२–२१2012–21२०१२–२१ सात पुस्तकें, छह सौ रचनाएँ Seven books, six hundred writings सत किताबूं, छह सौ रचनाऊं नवांकुर पुरस्कार। कमलेश्वर स्मृति पुरस्कार। जय-विजय रचनाकार सम्मान। 'अनुभूति' और 'अभिव्यक्ति' की सह-संपादक। प्रतिलिपि पर सात लाख से अधिक पाठक। Navankur Puraskar. Kamleshwar Smriti Puraskar. Jay-Vijay Rachnakar Samman. Co-editor of Anubhuti and Abhivyakti. Over seven hundred thousand readers on Pratilipi alone. नवांकुर इनाम, कमलेश्वर इनाम, जय-विजय सम्मानु। प्रतिलिपिअ ते सत लाख खां वधीक पढ़ंदड़।
  8. २०२२2022२०२२ पहली लड़ाई The first fight पहिरीं लड़ाइ कैंसर का पता चला। उन्होंने उसे चुपचाप सहा। कीमोथेरेपी ली। और जीत गईं। कैंसर मुक्त। A cancer diagnosis. She took it on quietly. Through chemotherapy, and then through to the other side. Cancer free. कैंसर जो पतो लगो। हुनन चुपचाप सहियो। कीमो ली। ऐं जीतयूं।
  9. सितम्बर २०२३September 2023सितंबर २०२३ दूसरी लहर The second wave बीअ लहर कैंसर लौट आया। इस बार और भारी होकर। पर वे अंत तक अपने तरीक़े से जीती रहीं। गन्ने के रस के लिए बाहर जातीं, नर्सरी से पौधे लातीं। हरे रंग से उनका प्रेम कभी नहीं घटा। The cancer came back. Harder this time. She went on living, in her own way, until the end. Out for sugarcane juice. Out to the nursery for new plants. Her love of green never thinned. कैंसर मुड़ आयो, भारी थी। पर हू आख़िरी डिंहं तक पंहिंजे तरीक़े सां जीअंदी रहियूं। गन्ने जे रस लाइ बाहर वंदी, नर्सरी मां बूटा आणींदी।
पत्र तीसरा Letter the third ट्रियों ख़त ०३

मन लगाके पढ़ाई करना Mann lagake padhai karna मन लगाके पढ़ाई करणी

दादी मेरे जीवन का एक पन्ना नहीं थीं। वे हर पन्ने के पीछे, हर पंक्ति के बीच, साँस की तरह बहती थीं। बहुत कुछ जो मैं आज हूँ, उन्हीं की दी हुई आदतें हैं। बहुत कुछ जो मैं आज जानता हूँ, उन्हीं का सिखाया हुआ है। Daadi was never a single chapter in my life. She lived behind every page, between every line, the way a breath lives inside a sentence. Most of who I am today is just the habits she left in me. Most of what I know today, she taught me first. डाडी मुहिंजे जीअण जो हिक पन्नो नह हुयूं। हू हर पन्ने जे पोयानि साह जिन रहती। बहुत कुजहु जो आउं अज आहियां, सोई उन्हीं जो सिखार्यो आहे।

बत्ती जलाकर कमरे से निकल जाना उन्हें कभी मंज़ूर नहीं था। 'ज़रूरत नहीं है तो क्यों जला रहे हो?' वॉशरूम से निकलते वक़्त लाइट बंद। बाथरूम के बाद वाइपर से पानी हटाना ताकि अगला फिसले नहीं। पौधों को नापा हुआ पानी, न ज़्यादा न कम। बड़ों को 'हाँ' कभी नहीं कहना; हमेशा 'जी'। छोटी छोटी आदतें थीं, पर एक एक से एक पूरा आदमी बनता है। मैं उनसे, हर मिनट, कुछ सीख रहा था। Walking out of a room with the light burning was never allowed. "If you do not need it, why is it on?" Off after the washroom. The wiper across the bathroom floor after a bath, so the next person would not slip. Water for the plants, measured, never too much. To elders, never haan; always ji. Small habits. But one habit at a time, she was making a whole person of me. कमरे मां बत्ती जलंदी छडे वंयण उन्हीं खे कडहिं नह वठे। 'ज़रूरत नह तां काहे जलाई आहे?' बारन खे कडहिं 'हाँ' नह, सदा 'जी'।

'सीना बाहर, पेट अंदर,' वे अक्सर कहतीं। मेरी मुद्रा सुधारने का एक छोटा सा मंत्र। पर उसमें छिपा हुआ था, हर बार, उनका प्यार। "Chest out, stomach in," she would say. A small posture correction. Inside it, each time, was her love. 'सीनो बाहर, पेट अंदर,' हू अकसर चवंदी। मुहिंजी मुद्रा सिधारण जो हिक नंढो मंत्रु। पर उन्हीं में हर भर, हुनन जो पियारु।

वर्षों पहले, जब मेरी बारहवीं की पढ़ाई शुरू हुई, मैं कोटा गया, बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए। और दादी आईं। एक पूरा महीना मेरे साथ रहीं। मैं देर रात तक पढ़ता, सुबह सोता रहता, नाश्ता छूट जाता। पर उनके परांठे? कभी नहीं छूटे। रोज़ सुबह उनकी रसोई से ताज़े परांठे आते। मेरी प्लेट पर रख दिए जाते। और वे चुपचाप जाकर कहीं और बैठ जातीं। मैं सोता रहता, पेट भरता रहता, पढ़ाई चलती रहती। Years before all this, when my twelfth-grade year began, I had moved to Kota to prepare for the board exams. And Daadi came. She stayed with me a whole month. I would study late, sleep through the morning, miss breakfast. But her parathas? They never missed. Hot from her kitchen each morning, set down quietly on my plate, and she would slip away to sit somewhere else. I slept on. The stomach stayed full. The studying went on. वर्षों अगिते, जदहिं मुहिंजी बारहवीं जी पढ़ाइ शुरू थी, मां कोटा वियस, बोर्ड लाइ। ऐं डाडी आयूं। हिक पूरो महीनो साह रहीं। मां रात देर ताईं पढ़ंदो हुयस, सुबहु सुती रहंदी हुयस, नाशता छुटजी वंदो। पर हुनन जा परांठा कडहिं न छुटिआ।

२०२२ में, बहुत बाद के एक दिन, उन्हें कैंसर हुआ। मुझे लगा कि अब सब रुक जाएगा। पर वे रुकीं नहीं। चुपचाप कीमोथेरेपी ली। ज़ख़्म सहे। बाल झड़ने दिए। और जीत गईं। कैंसर मुक्त हो गईं। In 2022, much later, she was diagnosed with cancer. I thought everything would stop. She did not stop. She took chemotherapy quietly. She let the wounds happen. She let the hair fall. And then she won. She was cancer free. २०२२ में, बहुत पोइ हिक डिंहं, हुनन खे कैंसर थियो। मां सोचियो ते सभु रुकी विंदो। पर हू न रुकयूं। चुपचाप कीमो लईं। ज़ख़्म सहियाऊं। ऐं जीतयूं। कैंसर मुक्त थियूं।

अपनी इस लड़ाई के बीच भी, फ़ोन उठाकर पूछतीं, 'पढ़ाई कैसी चल रही है, बेटा?' अपनी कीमो को छोड़कर, उनकी चिंता मेरे आगे के दिनों की होती। उनके पोते के डर, उनके पोते के तनाव, सब वे अपने अंदर ले लेतीं। Even in the middle of her own fight, she would pick up the phone and ask, "How are your studies going, beta?" Setting her own chemotherapy aside, it was my days ahead she was carrying. Her grandson's fears, her grandson's stresses, she took them all on for me. पंहिंजी इन लड़ाइ जे बिच में पिणि, फोन क करे पुछंदी, 'पढ़ाइ कीअं हलंदी आहे, पुटा?' पंहिंजी कीमोथेरेपी छडे, उन्हीं जी चिंता मुहिंजे आइंदड़ डिंहंनि जी हुई।

Daadi during chemotherapy, looking out at the palm trees from her balcony
बीमारी के बीच भी, खिड़की के बाहर हरियाली। उनका हमेशा का साथ। Even through the illness, the greenery beyond the window. Her oldest company. बीमारीअ जे बिच में पिणि, खिड़कीअ जे पारि साग। हुनन जो पुराणो साथ।

सितम्बर २०२३ में, कैंसर लौट आया। इस बार और भारी होकर। पर वे आख़िरी दिनों में भी जीना नहीं छोड़ीं। गन्ने का रस पीने जातीं। नर्सरी से नए पौधे लातीं। हरे रंग से उनका प्रेम कभी नहीं घटा। In September 2023, the cancer came back. Harder this time. She still refused to stop living. She went out for sugarcane juice. She brought home new plants from the nursery. Her love of green never thinned. सिप्तंबर २०२३ में, कैंसर मुड़ आयो। भारी थी। पर हू आख़िरी डिंहं तक पिणि जीअण नह छडियो। गन्ने जो रस पीअण लाइ वंदी। नर्सरी मां नवा बूटा आणींदी।

मेरी ज़िन्दगी में दादी का आख़िरी वाक्य जो उन्होंने मुझसे कहा, वह यह था: The last sentence she ever said to me, in this life, was this: मुहिंजी ज़िन्दगीअ में डाडी जो आख़िरी जुमलो जो हुनन मुहिंजे लाइ चियो, सो हो:

मन लगाके पढ़ाई करना। Mann lagake padhai karna. मन लगाके पढ़ाई करणी।

मन। पूरा मन। हर काम में, हर रिश्ते में, हर दिन में। यही उनकी दी हुई सबसे बड़ी सीख है। और मैं, हर दिन, उसी सीख के साथ जी रहा हूँ। Mann. The whole heart. In every act, every relationship, every day. That is the largest thing she gave me. And every day, I try to live by it. मन। पूरो मन। हर कम में, हर रिश्ते में, हर डिंहं में। हीअ उन्हीं जी डिनी सभ खां वडी सीख आहे।

Daadi and Rohan together, sharing sugarcane juice
गन्ने का रस, दादी के साथ। Sugarcane juice, with Daadi. गन्ने जो रस, डाडी सां गडु।
रोहन अजय कल्पना रामानी Rohan Ajay Kalpana Ramani रोहन अजय कल्पना रामानी