कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ६१ / ११४ № 61 of 114 रचना ६१ / ११४
४ अगस्त २०१७ 4 August 2017 ४ अगस्त २०१७

मोह moh मोह

“इतनी सारी सब्जियाँ! और ये मिठाइयाँ...क्या बात है जानेमन, फ्रिज को तो तुमने आज भंडार-गृह ही बना दिया है, मुँह में पानी आ गया”। सुबोध ने पत्नी सुजाता को खुले हुए फ्रिज के सामने विचारमग्न देखकर पूछा।

“कल अनुभव आ रहा है न, दुबई से पूरे एक साल के बाद”! कहते हुए सुजाता खुशी से फूली नहीं समा रही थी। इकलौता बेटा दुबई में एक अच्छी कंपनी में जॉब पा गया था और एक सप्ताह की छुट्टी पर भारत आ रहा था।

“फिर भला आज क्या खिला रही हो?”

“समझ में ही नहीं आ रहा, जिस सब्जी पर हाथ रखती हूँ, अनुभव की पसंद की निकलती है। सोचती हूँ आज कुछ दिन पहले के रखे हुए करेले ही बना लूँ”।

“लेकिन करेले तो मुझे भी पसंद नहीं।”

“आपके लिए पुदीने की चटनी के साथ आलू के पराँठे बना दूँगी”।

“नहीं करेले ही ठीक हैं, आलू के पराँठे तो अनुभव को भी बहुत पसंद हैं, कल सुबह ही तो वो पहुँच रहा है न, नाश्ते में बना देना”।

सुजाता दिन भर मन ही मन बेटे की पसंद का मेन्यू बनाती और रटती रही, कल ये सब्जी, परसों वो डिश, नरसों वो...इसी उथल-पुथल में रात में भी उसे ठीक से नींद नहीं आई।

सुबह तड़के ही पति-पत्नी उठ बैठे और चाय पीकर अनुभव का इंतज़ार करने लगे। फोन पर उसने कहा था मैं स्वयं ही आ जाऊँगा, सुबह-सुबह आपको एयर-पोर्ट आने में व्यर्थ परेशानी होगी। आखिर गेट पर एक टैक्सी रुकी और अनुभव ड्राइवर को पैसे देकर अंदर आ गया। माँ-पिता के चरण स्पर्श किए। दोनों ने भाव-विह्वल होकर उसे बारी-बारी गले लगाया। अनुभव ने बैग खोलकर माँ-पिता के लिए लाए हुए कपड़े व अन्य उपहार निकालकर उनको दिये फिर नहाने चला गया। सुजाता ने शीघ्रता से किचन का मोर्चा सँभाल लिया।

जब तक वो तैयार होकर आया, भोजन की मेज पर नाश्ता लग चुका था। अपनी पसंद के आलू के पराँठे और पुदीने की चटनी देखकर माँ से लिपटकर बोला- वाह माँ, मेरी पसंद तुम्हें अभी तक याद है...कहते हुए उसने खड़े-खड़े एक कौर तोड़कर खाया तो सुजाता ने टोका- अरे इस तरह खाया जाता है क्या, बैठकर आराम से खाओ, अभी तो बहुत कुछ आना है नाश्ते में...-

“बस माँ, आप व्यर्थ परेशान मत हो, मैं ज़रा जल्दी में हूँ, मेरी एक मित्र भी मेरे साथ भारत-भ्रमण के लिए आई है, उसे होटल में छोड़कर आया हूँ, वो मेरा नाश्ते पर इंतज़ार कर रही होगी। और हाँ...मैंने रहने के लिए होटल में ही कमरा बुक करवा लिया है। नैनी को अकेली नहीं छोड़ सकता, खाना भी घूमते हुए बाहर ही हो जाएगा, पर मिलने के लिए आता रहूँगा। कहकर उसने माँ-पिता का अभिवादन किया और बैग लेकर निकल गया।

सुजाता अचंभित सी अपने मन के पन्ने पर उकेरे हुए मेन्यू से ममता का पेपरवेट हटाकर पुत्र-मोह से मुक्त होने का प्रयास करने लगी।

कल्पना रामानी

नवी मुंबई

“itanee saaree sabjiyaan! aur ye mithaaiyaankyaa baat hai jaaneman, phrij ko to tumane aaj bhandaar-griih hee banaa diyaa hai, munh men paanee aa gayaa” subodh ne patnee sujaataa ko khule hue phrij ke saamane wichaaramagn dekhakar poochaa

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“kal anubhaw aa rahaa hai n, dubaee se poore ek saal ke baad”! kahate hue sujaataa khushee se phoolee naheen samaa rahee thee ikalautaa betaa dubaee men ek achchee kanpanee men jॉb paa gayaa thaa aur ek saptaah kee chuttee par bhaarat aa rahaa thaa

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“phir bhalaa aaj kyaa khilaa rahee ho?”

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“samajh men hee naheen aa rahaa, jis sabjee par haath rakhatee hoon, anubhaw kee pasand kee nikalatee hai sochatee hoon aaj kuch din pahale ke rakhe hue karele hee banaa loon”

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“lekin karele to mujhe bhee pasand naheen”

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“aapake lie pudeene kee chatanee ke saath aaloo ke paraanthe banaa doongee”

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“naheen karele hee theek hain, aaloo ke paraanthe to anubhaw ko bhee bahut pasand hain, kal subah hee to wo pahunch rahaa hai n, naashte men banaa denaa”

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sujaataa din bhar man hee man bete kee pasand kaa menyoo banaatee aur ratatee rahee, kal ye sabjee, parason wo dish, narason woisee uthal-puthal men raat men bhee use theek se neend naheen aaee

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subah tadake hee pati-patnee uth baithe aur chaay peekar anubhaw kaa intazaar karane lage phon par usane kahaa thaa main svayan hee aa jaaoongaa, subah-subah aapako eyar-port aane men wyarth pareshaanee hogee aakhir get par ek taiksee rukee aur anubhaw draaiwar ko paise dekar andar aa gayaa maan-pitaa ke charan sparsh kie donon ne bhaaw-wihval hokar use baaree-baaree gale lagaayaa anubhaw ne baig kholakar maan-pitaa ke lie laae hue kapade w any upahaar nikaalakar unako diye phir nahaane chalaa gayaa sujaataa ne sheeghrataa se kichan kaa morchaa sanbhaal liyaa

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jab tak wo taiyaar hokar aayaa, bhojan kee mej par naashtaa lag chukaa thaa apanee pasand ke aaloo ke paraanthe aur pudeene kee chatanee dekhakar maan se lipatakar bolaa- waah maan, meree pasand tumhen abhee tak yaad haikahate hue usane khade-khade ek kaur todakar khaayaa to sujaataa ne tokaa- are is tarah khaayaa jaataa hai kyaa, baithakar aaraam se khaao, abhee to bahut kuch aanaa hai naashte men-

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“bas maan, aap wyarth pareshaan mat ho, main zaraa jaldee men hoon, meree ek mitr bhee mere saath bhaarat-bhraman ke lie aaee hai, use hotal men chodakar aayaa hoon, wo meraa naashte par intazaar kar rahee hogee aur haanmainne rahane ke lie hotal men hee kamaraa buk karawaa liyaa hai nainee ko akelee naheen chod sakataa, khaanaa bhee ghoomate hue baahar hee ho jaaegaa, par milane ke lie aataa rahoongaa kahakar usane maan-pitaa kaa abhiwaadan kiyaa aur baig lekar nikal gayaa

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sujaataa achanbhit see apane man ke panne par ukere hue menyoo se mamataa kaa peparawet hataakar putr-moh se mukt hone kaa prayaas karane lagee

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kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

“इतनी सारी सब्जियाँ! और ये मिठाइयाँ...क्या बात है जानेमन, फ्रिज को तो तुमने आज भंडार-गृह ही बना दिया है, मुँह में पानी आ गया”। सुबोध ने पत्नी सुजाता को खुले हुए फ्रिज के सामने विचारमग्न देखकर पूछा।

“कल अनुभव आ रहा है न, दुबई से पूरे एक साल के बाद”! कहते हुए सुजाता खुशी से फूली नहीं समा रही थी। इकलौता बेटा दुबई में एक अच्छी कंपनी में जॉब पा गया था और एक सप्ताह की छुट्टी पर भारत आ रहा था।

“फिर भला आज क्या खिला रही हो?”

“समझ में ही नहीं आ रहा, जिस सब्जी पर हाथ रखती हूँ, अनुभव की पसंद की निकलती है। सोचती हूँ आज कुछ दिन पहले के रखे हुए करेले ही बना लूँ”।

“लेकिन करेले तो मुझे भी पसंद नहीं।”

“आपके लिए पुदीने की चटनी के साथ आलू के पराँठे बना दूँगी”।

“नहीं करेले ही ठीक हैं, आलू के पराँठे तो अनुभव को भी बहुत पसंद हैं, कल सुबह ही तो वो पहुँच रहा है न, नाश्ते में बना देना”।

सुजाता दिन भर मन ही मन बेटे की पसंद का मेन्यू बनाती और रटती रही, कल ये सब्जी, परसों वो डिश, नरसों वो...इसी उथल-पुथल में रात में भी उसे ठीक से नींद नहीं आई।

सुबह तड़के ही पति-पत्नी उठ बैठे और चाय पीकर अनुभव का इंतज़ार करने लगे। फोन पर उसने कहा था मैं स्वयं ही आ जाऊँगा, सुबह-सुबह आपको एयर-पोर्ट आने में व्यर्थ परेशानी होगी। आखिर गेट पर एक टैक्सी रुकी और अनुभव ड्राइवर को पैसे देकर अंदर आ गया। माँ-पिता के चरण स्पर्श किए। दोनों ने भाव-विह्वल होकर उसे बारी-बारी गले लगाया। अनुभव ने बैग खोलकर माँ-पिता के लिए लाए हुए कपड़े व अन्य उपहार निकालकर उनको दिये फिर नहाने चला गया। सुजाता ने शीघ्रता से किचन का मोर्चा सँभाल लिया।

जब तक वो तैयार होकर आया, भोजन की मेज पर नाश्ता लग चुका था। अपनी पसंद के आलू के पराँठे और पुदीने की चटनी देखकर माँ से लिपटकर बोला- वाह माँ, मेरी पसंद तुम्हें अभी तक याद है...कहते हुए उसने खड़े-खड़े एक कौर तोड़कर खाया तो सुजाता ने टोका- अरे इस तरह खाया जाता है क्या, बैठकर आराम से खाओ, अभी तो बहुत कुछ आना है नाश्ते में...-

“बस माँ, आप व्यर्थ परेशान मत हो, मैं ज़रा जल्दी में हूँ, मेरी एक मित्र भी मेरे साथ भारत-भ्रमण के लिए आई है, उसे होटल में छोड़कर आया हूँ, वो मेरा नाश्ते पर इंतज़ार कर रही होगी। और हाँ...मैंने रहने के लिए होटल में ही कमरा बुक करवा लिया है। नैनी को अकेली नहीं छोड़ सकता, खाना भी घूमते हुए बाहर ही हो जाएगा, पर मिलने के लिए आता रहूँगा। कहकर उसने माँ-पिता का अभिवादन किया और बैग लेकर निकल गया।

सुजाता अचंभित सी अपने मन के पन्ने पर उकेरे हुए मेन्यू से ममता का पेपरवेट हटाकर पुत्र-मोह से मुक्त होने का प्रयास करने लगी।

कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗