कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ११२ / ११४ № 112 of 114 रचना ११२ / ११४
३१ मार्च २०२१ 31 March 2021 ३१ मार्च २०२१

उसने छुआ था, अंतिम भाग usane chuaa thaa, antim bhaag उसने छुआ था, अंतिम भाग

बस के टिमोरा पहुँचने की घोषणा होते ही ऊँघते हुए बाराती सजग होकर अपना अपना सामान सहेजते हुए हुलिया ठीक करने लगे। कुछ ही देर में बस टिमोरा के तीन-सितारा होटल के सामने थी। कुछ महिला पुरुष स्वागत के लिए बाहर तैयार खड़े थे।

स्वागत सत्कार और  अन्य सारी औपचारिकताओं के बाद सबको आदर सहित होटल के  कमरों तक ले जाया गया। विवाह समारोह के लिए सजे धजे हॉल के बाहरी परिसर में  जलपान, भोजन आदि की व्यवस्था थी।

फेरों का समय शाम का था। समारोह स्थल कुछ दूरी पर था। वधू पक्ष के  वहाँ पहुंचने तक उन्हें तैयार होकर बारात लेकर वहां पहुंचना था।

अपना सामान एक कमरे में व्यवस्थित करने के बाद देवराज ने सबसे पहले संग्रहालय के संपर्क नंबर पर, जो उन्होंने समाचार पत्र से ही नोट कर लिया था, फोन करके अपना उद्देश्य बताकर संग्रहालय खुलने का समय पूछा. फोन पर विनोद पालीवाल ही थे. उन्होंने कहा-

“महाशय, हमारा घर परिवार सब यहीं है, आप सुबह ८ से १२ और शाम ३ से ९ के बीच किसी भी दिन आ सकते हैं.”

देवराज ने सुप्रिया से कहा-

प्रिया, जल्दी तैयार हो जाओ, हमारे पास ३- ४ घंटे हैं.पहले हम संग्रहालय चलेंगे फिर और कुछ देखने घूमने लायक हुआ तो वहीँ से पूछताछ करके तुम्हारा शहर देखने चले चलेंगे.

सुप्रिया को भी 35 वर्षों से अपनी रूह में बसे उस शहर का नया रूप देखने की उत्सुकता थी। तैयार होकर दोनों ने हल्का सा नाश्ता किया और विवाह की औपचारिकताओं को नज़रंदाज़ करते हुए अपने पैकेट के साथ बाहर निकल गए।

सुप्रिया ने देवराज को बताया कि इतने वर्षों में शहर ने काफी तरक्की कर ली है. पुराने घरों के तो हुलिए ही बदल गए हैं. देवराज ने बाहर मुख्य सड़क से एक ऑटो लिया और वे उस संग्रहालय तक बिना किसी परेशानी के पहुँच गए।

सुप्रिया ने चारों तरफ दृष्टि घुमाकर देखा, संग्रहालय उसी स्थान पर उसी बिल्डिंग की प्रथम मंजिल पर ही था. सिर्फ बालकनी पर टंगे बोर्ड पर “पालीवाल रेडियो शॉप” के स्थान पर “पालीवाल रेडियो संग्रहालय” लिखा हुआ था. उसके नीचे ऑनर विनोद पालीवाल भी लिखा हुआ था. सामने वाले भवनों की कतार में बैंक का वही भवन मौजूद था जहाँ उसके पिताजी का कार्यालय था. संग्रहालय के बाजू वाली बिल्डिंग भी अपने नए रंग रूप के साथ वही थी. दोनों बिल्डिंग्स के बीच वही संकरी गली थी, गली की तरफ वाली खिड़कियों पर परदे लगे हुए थे. बिल्डिंग का प्रवेश द्वार गली के बीच में था जहाँ से वो पिता के साथ एक बार ऊपर शॉप तक जा चुकी थी.

सुप्रिया पैकेट के साथ चलते हुए देव के पीछे-पीछे ही एक अनजान की तरह प्रवेश द्वार तक पहुंची. वहाँ संग्रहालय का नाम और ऊपर जाने के लिए तीर का निशान बना हुआ था. वे घुमावदार सीढियों से ऊपर तक पहुंच गए.

अन्दर जाने के लिए एक तरफ के द्वार के ऊपर विनोद पालीवाल का नाम और बगल में घंटी का बटन था. द्वार पर पर्दा लटका हुआ था. देव के बटन दबाते ही एक व्यक्ति ने वहाँ आकर उन्हें अन्दर बुला लिया. अन्दर एक तरफ काउंटर नुमा टेबल के एक तरफ कुर्सी पर बैठे विनोद पालीवाल को उन्होंने तुरंत पहचान लिया क्योंकि उसका नवीनतम चित्र वे साक्षात्कार वाले अखबार में देख चुके थे. काउंटर पर रखे हुए एक रेडियो पर पुराने मधुर गीत बज रहे थे.

सुप्रिया ने बजते हुए रेडियो को गौर से देखा तो उसका कलेजा धक् से रह गया. यह वही ३५ वर्ष पुराना उसी का रेडियो था जिसके  बदले में उसने टेप रिकार्डर ख़रीदा था. यानी विनोद भी उसकी स्मृतियों को अब तक इस तरह संजोए हुए था. सुप्रिया के मन में भी शायद अब तक कोई चोर छिपा था जो उसने देवराज से इस शहर में अपने रहने के समय की कोई भी बात साझा नहीं की थी. अब तो चोरी पकड़े जाने के डर से वो घबरा गई कि कहीं विनोद वो पुराना प्रसंग न छेड़ दे. उसने यह तो सोचा ही नहीं था कि इस तरह की परिस्थिति भी निर्मित हो सकती है.

उन्हें देखते ही विनोद ने उठकर हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया और अपना परिचय देकर बैठते हुए उन्हें सामने रखी हुई कुर्सियों की तरफ संकेत करते हुए बैठने के लिए कहा. देवराज ने भी बैठने से पहले विनोद के अभिवादन का उत्तर देते हुए  अपना और सुप्रिया का परिचय देते हुए कहा-

‘मैं देवराज सिंह रिटायर्ड बैंक मैनेजर और ये मेरी श्रीमती जी सुप्रिया सिंह...ये इस शहर में अपने स्कूली जीवन के ३ वर्ष बिता चुकी हैं और अपनी मायके से दहेज़ में लाई हुई शेष बची हुई एकमात्र पूँजी इस संग्रहालय को सौंपने आई हैं.” कहते हुए देवराज अपना लाया हुआ पैकेट काउंटर पर रखकर खोलने लगा.

सुप्रिया नाम सुनते ही विनोद ने चौंककर सुप्रिया की तरफ देखा तो उसने घबराहट में हाथ जोड़कर नहीं की मुद्रा में दोनों तरफ गर्दन हिलाई और अपनी नज़रें झुका लीं. विनोद तुरंत मामला समझ गया. देवराज का ध्यान अभी उनकी तरफ नहीं गया था, विनोद ने  भी सिर नीचे करके पलकें मूंदकर सुप्रिया को निश्चिंत रहने का इशारा कर दिया और फिर सामान्य होकर स्वयं पर कंट्रोल कर लिया.

देवराज ने टेप-रिकार्डर और उसके साथ का कैसेट बॉक्स निकालकर टेबल पर रख दिया था जिसे विनोद ने एक नज़र देखते ही पहचान लिया. दोनों तरफ के एहसास मौन थे मगर बेजान उपकरण उनकी जान-पहचान की गवाही दे रहे थे. विनोद ने वो टेप-रिकार्डर उठाकर बजते हुए रेडियो के साथ रख दिया और माहौल को हल्का करने के लिए अपने कर्मचारी को नीचे सबके लिए चाय बनवाने के लिए भेजा.

चाय आने तक इधर उधर की बातें होने लगीं. विनोद ने बताया-

“यह भवन मेरे पिताजी का बनवाया हुआ है. मैं उनका इकलौता पुत्र हूँ. पहले जब यह रेडियो की दुकान हुआ करती थी, लोग एक्स्चेंज ऑफर में नया खरीदकर पुराना दे जाते थे और निम्न वर्ग के शौकीन लोगों को पुराने उपकरण सस्ते में उपलब्ध हो जाते थे. फिर जब हम घर-परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त हुए और हमारे इकलौते पुत्र और पुत्री विवाह के बाद विदेश जाकर बस गए तो माता-पिता के परलोक वासी होने के बाद हम दो प्राणी ही इस घर में रह गए. अतः बढ़ती उम्र और घटती आवश्यकताओं को देखते हुए  हमने धीरे-धीरे नई खरीदी-बिक्री का कार्य बंद करके एकत्र हो चुके पुराने नमूनों को सहेजना आरम्भ कर दिया.”

चाय के साथ नाश्ता भी आ गया था. चाय नाश्ते का दौर समाप्त होने पर  विनोद उन्हें अंदरूनी हिस्से में बने अपने हाल में स्थापित संग्रहालय तक ले गया और बोला-

“देवराज जी, यही मेरा छोटा सा घरेलू संग्रहालय है. यहाँ आपको बीती सदी के चौथे दशक से लेकर अब तक के सभी मॉडल देखने को मिलेंगे.”

देवराज ने चारों तरफ नज़र घुमाई. हाल के सामने का प्रवेश द्वार वाला हिस्सा छोड़कर तीन तरफ काउंटर नुमा लम्बे और लगभग २० इंच चौड़े प्लेटफोर्म की उंचाई में चार पंक्तियाँ थीं. बीचोंबीच भी लम्बा प्लेटफोर्म था. नीचे की दो पंक्तियों और बीच के प्लेटफोर्म पर लगातार रेडियो, ट्रांजिस्टर और रेडियो-कम टेप-रिकार्डर करीने से रखे हुए थे.

सुप्रिया और देवराज हर मॉडल को निकट से ध्यान पूर्वक देखने लगे. हर उपकरण के साथ एक कार्ड लटका हुआ था जिसपर उसके दानदाता का नाम उसके शहर के नाम के साथ अंकित था.

विनोद उनके साथ रहकर रुचिपूर्वक हर मॉडल के साथ जुड़ी कहानी भी सुनाता रहा. आधे घंटे में ही वे वापस अपने स्थान तक आ गए.

विनोद ने उनके उपकरण के लिए उनका और शहर का नाम लिखकर देने को कहा, तभी देवराज का ध्यान अपने उपकरण के साथ रखे हुए उस छोटे से रेडियो की तरफ चला गया. उन्होंने उसपर कोई लेबल न देखकर विनोद से इसका कारण पूछा तो विनोद ने ठहाका लगाते हुए कहा-

“मित्र, यह रेडियो किशोर वय में मेरे साथ हुए एक एक्सीडेंट की निशानी है और तब से मेरे नितांत निजी पलों का साथी है.”

सुप्रिया के तो प्राण हलक में थे ही, देवराज भी हैरान हुए बिना नहीं रह सका, वो बोला-

“ऐसा कैसे विनोद जी, रेडियो और एक्सीडेंट में तो कोई समानता ही नहीं...”

विनोद फिर हँसते हुए बोला-

"देवराज जी, वो कोई ऐसा वैसा सामान्य एक्सीडेंट नहीं था. एक बार बारिश के पानी में फंसी हुई एक सहपाठी  लड़की की सहायता करते हुए उसके हाथ के स्पर्श मात्र से हमारे दिल टकरा गए थे फिर परिस्थितियों वश मिलने से पहले ही विपरीत दिशाओं में मुड़ गए और उसके जाते-जाते इत्तफाक से उसकी निशानी यानी यह रेडियो मेरे पास रह गया.

इत्तफाक इसलिए कि वो एक बार हमारी शॉप पर अपने पिता के साथ आई थी और एक्सचेंज ऑफर के तहत मेरे पिताजी से मेरे सामने ही इसके बदले उस समय के टेप रिकार्डर का नया मॉडल ले गई थी. सच कहूँ तो यह संग्रहालय बनाने की प्रेरणा इसी रेडियो से ही मिली. उस घटना का जिक्र मैने आज तक अपनी पत्नी से भी नहीं किया।"

“क्यों, क्या यह आपका अपनी पत्नी के साथ अन्याय नहीं?”

“नहीं मित्र, यह अन्याय नहीं. दुनिया बहुत छोटी है,  हो सकता है, जैसे आप इस संग्रहालय का नाम सुनकर यहाँ आए हैं, कभी वो लड़की भी अपने पति के साथ या उसकी नई पौध कभी यहाँ तक आ पहुंचे और नाम के टैग से कोई उसके अतीत की परतें उधेड़ने लगे।

मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण यह रेडियो उसकी रुसवाई का कारण बने. इस पुरुष-प्रधान समाज में तब भी और अब भी मर्द स्वयं चाहे कितनी ही लड़कियों के साथ फ्लर्ट करे, पत्नी के साथ अपनी करतूत चटखारे लेकर साझा करेगा, और पत्नी अपने पति को तनाव-मुक्त रखने के लिए सहनशील रुख भी अपनाएगी मगर वो यदि जान जाए कि उसकी पत्नी को विवाह पूर्व किसी ने हाथ भी लगाया है तो उसके मन में उसके प्रति शक का बीज अंकुरित होने लगेगा.”

सुप्रिया बुत बनी विनोद की बातों को सुनती और मन ही मन उसके विचारों को सराहती रही. आज दोनों अपने परिवर्तित भौतिक और मानसिक रूप के साथ आमने-सामने थे. आज के उजाले में अतीत की परछाइयाँ विलुप्त हो चुकी थीं, दोनों अपने वर्तमान में सुखी और संतुष्ट थे, उसे विश्वास था कि आज के बाद विनोद भी अपने बीते हुए अहसासों को उसकी तरह समाधिस्थ कर देगा.

देवराज ने घड़ी देखी, अब शहर देखने की गुंजाइश नहीं थी.  चर्चा समाप्त करके विनोद से जाने की इज़ाज़त लेकर सुप्रिया के साथ बाहर का रुख कर लिया

कल्पना रामानी, नवी मुंबई

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svaagat satkaar aur any saaree aupachaarikataaon ke baad sabako aadar sahit hotal ke kamaron tak le jaayaa gayaa wiwaah samaaroh ke lie saje dhaje hॉl ke baaharee parisar men jalapaan, bhojan aadi kee wyawasthaa thee

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“mahaashay, hamaaraa ghar pariwaar sab yaheen hai, aap subah 8 se 12 aur shaam 3 se 9 ke beech kisee bhee din aa sakate hain”

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“kyon, kyaa yah aapakaa apanee patnee ke saath anyaay naheen?”

“naheen mitr, yah anyaay naheen duniyaa bahut chotee hai, ho sakataa hai, jaise aap is sangrahaalay kaa naam sunakar yahaan aae hain, kabhee wo ladakee bhee apane pati ke saath yaa usakee naee paudh kabhee yahaan tak aa pahunche aur naam ke taig se koee usake ateet kee paraten udhed़ne lage

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kalpanaa raamaanee, nawee munbaee

बस के टिमोरा पहुँचने की घोषणा होते ही ऊँघते हुए बाराती सजग होकर अपना अपना सामान सहेजते हुए हुलिया ठीक करने लगे। कुछ ही देर में बस टिमोरा के तीन-सितारा होटल के सामने थी। कुछ महिला पुरुष स्वागत के लिए बाहर तैयार खड़े थे।

स्वागत सत्कार और  अन्य सारी औपचारिकताओं के बाद सबको आदर सहित होटल के  कमरों तक ले जाया गया। विवाह समारोह के लिए सजे धजे हॉल के बाहरी परिसर में  जलपान, भोजन आदि की व्यवस्था थी।

फेरों का समय शाम का था। समारोह स्थल कुछ दूरी पर था। वधू पक्ष के  वहाँ पहुंचने तक उन्हें तैयार होकर बारात लेकर वहां पहुंचना था।

अपना सामान एक कमरे में व्यवस्थित करने के बाद देवराज ने सबसे पहले संग्रहालय के संपर्क नंबर पर, जो उन्होंने समाचार पत्र से ही नोट कर लिया था, फोन करके अपना उद्देश्य बताकर संग्रहालय खुलने का समय पूछा. फोन पर विनोद पालीवाल ही थे. उन्होंने कहा-

“महाशय, हमारा घर परिवार सब यहीं है, आप सुबह ८ से १२ और शाम ३ से ९ के बीच किसी भी दिन आ सकते हैं.”

देवराज ने सुप्रिया से कहा-

प्रिया, जल्दी तैयार हो जाओ, हमारे पास ३- ४ घंटे हैं.पहले हम संग्रहालय चलेंगे फिर और कुछ देखने घूमने लायक हुआ तो वहीँ से पूछताछ करके तुम्हारा शहर देखने चले चलेंगे.

सुप्रिया को भी 35 वर्षों से अपनी रूह में बसे उस शहर का नया रूप देखने की उत्सुकता थी। तैयार होकर दोनों ने हल्का सा नाश्ता किया और विवाह की औपचारिकताओं को नज़रंदाज़ करते हुए अपने पैकेट के साथ बाहर निकल गए।

सुप्रिया ने देवराज को बताया कि इतने वर्षों में शहर ने काफी तरक्की कर ली है. पुराने घरों के तो हुलिए ही बदल गए हैं. देवराज ने बाहर मुख्य सड़क से एक ऑटो लिया और वे उस संग्रहालय तक बिना किसी परेशानी के पहुँच गए।

सुप्रिया ने चारों तरफ दृष्टि घुमाकर देखा, संग्रहालय उसी स्थान पर उसी बिल्डिंग की प्रथम मंजिल पर ही था. सिर्फ बालकनी पर टंगे बोर्ड पर “पालीवाल रेडियो शॉप” के स्थान पर “पालीवाल रेडियो संग्रहालय” लिखा हुआ था. उसके नीचे ऑनर विनोद पालीवाल भी लिखा हुआ था. सामने वाले भवनों की कतार में बैंक का वही भवन मौजूद था जहाँ उसके पिताजी का कार्यालय था. संग्रहालय के बाजू वाली बिल्डिंग भी अपने नए रंग रूप के साथ वही थी. दोनों बिल्डिंग्स के बीच वही संकरी गली थी, गली की तरफ वाली खिड़कियों पर परदे लगे हुए थे. बिल्डिंग का प्रवेश द्वार गली के बीच में था जहाँ से वो पिता के साथ एक बार ऊपर शॉप तक जा चुकी थी.

सुप्रिया पैकेट के साथ चलते हुए देव के पीछे-पीछे ही एक अनजान की तरह प्रवेश द्वार तक पहुंची. वहाँ संग्रहालय का नाम और ऊपर जाने के लिए तीर का निशान बना हुआ था. वे घुमावदार सीढियों से ऊपर तक पहुंच गए.

अन्दर जाने के लिए एक तरफ के द्वार के ऊपर विनोद पालीवाल का नाम और बगल में घंटी का बटन था. द्वार पर पर्दा लटका हुआ था. देव के बटन दबाते ही एक व्यक्ति ने वहाँ आकर उन्हें अन्दर बुला लिया. अन्दर एक तरफ काउंटर नुमा टेबल के एक तरफ कुर्सी पर बैठे विनोद पालीवाल को उन्होंने तुरंत पहचान लिया क्योंकि उसका नवीनतम चित्र वे साक्षात्कार वाले अखबार में देख चुके थे. काउंटर पर रखे हुए एक रेडियो पर पुराने मधुर गीत बज रहे थे.

सुप्रिया ने बजते हुए रेडियो को गौर से देखा तो उसका कलेजा धक् से रह गया. यह वही ३५ वर्ष पुराना उसी का रेडियो था जिसके  बदले में उसने टेप रिकार्डर ख़रीदा था. यानी विनोद भी उसकी स्मृतियों को अब तक इस तरह संजोए हुए था. सुप्रिया के मन में भी शायद अब तक कोई चोर छिपा था जो उसने देवराज से इस शहर में अपने रहने के समय की कोई भी बात साझा नहीं की थी. अब तो चोरी पकड़े जाने के डर से वो घबरा गई कि कहीं विनोद वो पुराना प्रसंग न छेड़ दे. उसने यह तो सोचा ही नहीं था कि इस तरह की परिस्थिति भी निर्मित हो सकती है.

उन्हें देखते ही विनोद ने उठकर हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया और अपना परिचय देकर बैठते हुए उन्हें सामने रखी हुई कुर्सियों की तरफ संकेत करते हुए बैठने के लिए कहा. देवराज ने भी बैठने से पहले विनोद के अभिवादन का उत्तर देते हुए  अपना और सुप्रिया का परिचय देते हुए कहा-

‘मैं देवराज सिंह रिटायर्ड बैंक मैनेजर और ये मेरी श्रीमती जी सुप्रिया सिंह...ये इस शहर में अपने स्कूली जीवन के ३ वर्ष बिता चुकी हैं और अपनी मायके से दहेज़ में लाई हुई शेष बची हुई एकमात्र पूँजी इस संग्रहालय को सौंपने आई हैं.” कहते हुए देवराज अपना लाया हुआ पैकेट काउंटर पर रखकर खोलने लगा.

सुप्रिया नाम सुनते ही विनोद ने चौंककर सुप्रिया की तरफ देखा तो उसने घबराहट में हाथ जोड़कर नहीं की मुद्रा में दोनों तरफ गर्दन हिलाई और अपनी नज़रें झुका लीं. विनोद तुरंत मामला समझ गया. देवराज का ध्यान अभी उनकी तरफ नहीं गया था, विनोद ने  भी सिर नीचे करके पलकें मूंदकर सुप्रिया को निश्चिंत रहने का इशारा कर दिया और फिर सामान्य होकर स्वयं पर कंट्रोल कर लिया.

देवराज ने टेप-रिकार्डर और उसके साथ का कैसेट बॉक्स निकालकर टेबल पर रख दिया था जिसे विनोद ने एक नज़र देखते ही पहचान लिया. दोनों तरफ के एहसास मौन थे मगर बेजान उपकरण उनकी जान-पहचान की गवाही दे रहे थे. विनोद ने वो टेप-रिकार्डर उठाकर बजते हुए रेडियो के साथ रख दिया और माहौल को हल्का करने के लिए अपने कर्मचारी को नीचे सबके लिए चाय बनवाने के लिए भेजा.

चाय आने तक इधर उधर की बातें होने लगीं. विनोद ने बताया-

“यह भवन मेरे पिताजी का बनवाया हुआ है. मैं उनका इकलौता पुत्र हूँ. पहले जब यह रेडियो की दुकान हुआ करती थी, लोग एक्स्चेंज ऑफर में नया खरीदकर पुराना दे जाते थे और निम्न वर्ग के शौकीन लोगों को पुराने उपकरण सस्ते में उपलब्ध हो जाते थे. फिर जब हम घर-परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त हुए और हमारे इकलौते पुत्र और पुत्री विवाह के बाद विदेश जाकर बस गए तो माता-पिता के परलोक वासी होने के बाद हम दो प्राणी ही इस घर में रह गए. अतः बढ़ती उम्र और घटती आवश्यकताओं को देखते हुए  हमने धीरे-धीरे नई खरीदी-बिक्री का कार्य बंद करके एकत्र हो चुके पुराने नमूनों को सहेजना आरम्भ कर दिया.”

चाय के साथ नाश्ता भी आ गया था. चाय नाश्ते का दौर समाप्त होने पर  विनोद उन्हें अंदरूनी हिस्से में बने अपने हाल में स्थापित संग्रहालय तक ले गया और बोला-

“देवराज जी, यही मेरा छोटा सा घरेलू संग्रहालय है. यहाँ आपको बीती सदी के चौथे दशक से लेकर अब तक के सभी मॉडल देखने को मिलेंगे.”

देवराज ने चारों तरफ नज़र घुमाई. हाल के सामने का प्रवेश द्वार वाला हिस्सा छोड़कर तीन तरफ काउंटर नुमा लम्बे और लगभग २० इंच चौड़े प्लेटफोर्म की उंचाई में चार पंक्तियाँ थीं. बीचोंबीच भी लम्बा प्लेटफोर्म था. नीचे की दो पंक्तियों और बीच के प्लेटफोर्म पर लगातार रेडियो, ट्रांजिस्टर और रेडियो-कम टेप-रिकार्डर करीने से रखे हुए थे.

सुप्रिया और देवराज हर मॉडल को निकट से ध्यान पूर्वक देखने लगे. हर उपकरण के साथ एक कार्ड लटका हुआ था जिसपर उसके दानदाता का नाम उसके शहर के नाम के साथ अंकित था.

विनोद उनके साथ रहकर रुचिपूर्वक हर मॉडल के साथ जुड़ी कहानी भी सुनाता रहा. आधे घंटे में ही वे वापस अपने स्थान तक आ गए.

विनोद ने उनके उपकरण के लिए उनका और शहर का नाम लिखकर देने को कहा, तभी देवराज का ध्यान अपने उपकरण के साथ रखे हुए उस छोटे से रेडियो की तरफ चला गया. उन्होंने उसपर कोई लेबल न देखकर विनोद से इसका कारण पूछा तो विनोद ने ठहाका लगाते हुए कहा-

“मित्र, यह रेडियो किशोर वय में मेरे साथ हुए एक एक्सीडेंट की निशानी है और तब से मेरे नितांत निजी पलों का साथी है.”

सुप्रिया के तो प्राण हलक में थे ही, देवराज भी हैरान हुए बिना नहीं रह सका, वो बोला-

“ऐसा कैसे विनोद जी, रेडियो और एक्सीडेंट में तो कोई समानता ही नहीं...”

विनोद फिर हँसते हुए बोला-

"देवराज जी, वो कोई ऐसा वैसा सामान्य एक्सीडेंट नहीं था. एक बार बारिश के पानी में फंसी हुई एक सहपाठी  लड़की की सहायता करते हुए उसके हाथ के स्पर्श मात्र से हमारे दिल टकरा गए थे फिर परिस्थितियों वश मिलने से पहले ही विपरीत दिशाओं में मुड़ गए और उसके जाते-जाते इत्तफाक से उसकी निशानी यानी यह रेडियो मेरे पास रह गया.

इत्तफाक इसलिए कि वो एक बार हमारी शॉप पर अपने पिता के साथ आई थी और एक्सचेंज ऑफर के तहत मेरे पिताजी से मेरे सामने ही इसके बदले उस समय के टेप रिकार्डर का नया मॉडल ले गई थी. सच कहूँ तो यह संग्रहालय बनाने की प्रेरणा इसी रेडियो से ही मिली. उस घटना का जिक्र मैने आज तक अपनी पत्नी से भी नहीं किया।"

“क्यों, क्या यह आपका अपनी पत्नी के साथ अन्याय नहीं?”

“नहीं मित्र, यह अन्याय नहीं. दुनिया बहुत छोटी है,  हो सकता है, जैसे आप इस संग्रहालय का नाम सुनकर यहाँ आए हैं, कभी वो लड़की भी अपने पति के साथ या उसकी नई पौध कभी यहाँ तक आ पहुंचे और नाम के टैग से कोई उसके अतीत की परतें उधेड़ने लगे।

मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण यह रेडियो उसकी रुसवाई का कारण बने. इस पुरुष-प्रधान समाज में तब भी और अब भी मर्द स्वयं चाहे कितनी ही लड़कियों के साथ फ्लर्ट करे, पत्नी के साथ अपनी करतूत चटखारे लेकर साझा करेगा, और पत्नी अपने पति को तनाव-मुक्त रखने के लिए सहनशील रुख भी अपनाएगी मगर वो यदि जान जाए कि उसकी पत्नी को विवाह पूर्व किसी ने हाथ भी लगाया है तो उसके मन में उसके प्रति शक का बीज अंकुरित होने लगेगा.”

सुप्रिया बुत बनी विनोद की बातों को सुनती और मन ही मन उसके विचारों को सराहती रही. आज दोनों अपने परिवर्तित भौतिक और मानसिक रूप के साथ आमने-सामने थे. आज के उजाले में अतीत की परछाइयाँ विलुप्त हो चुकी थीं, दोनों अपने वर्तमान में सुखी और संतुष्ट थे, उसे विश्वास था कि आज के बाद विनोद भी अपने बीते हुए अहसासों को उसकी तरह समाधिस्थ कर देगा.

देवराज ने घड़ी देखी, अब शहर देखने की गुंजाइश नहीं थी.  चर्चा समाप्त करके विनोद से जाने की इज़ाज़त लेकर सुप्रिया के साथ बाहर का रुख कर लिया

कल्पना रामानी, नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗