कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना ६५ / ६५ № 65 of 65 रचना ६५ / ६५
२३ दिसम्बर २०१९ 23 December 2019 २३ दिसम्बर २०१९

पुनः जन्म लो कृष्ण जी punah janm lo kriishn jee पुनः जन्म लो कृष्ण जी

पुनः जन्म लो कृष्ण जी, देखो कलियुग घोर

नाम तुम्हारा ओढ़ते, भाँति-भाँति के चोर।

कंस बली हैं आज के, तुम्हें न देंगे ताज।

ताज पहन यदि आ गए, झपट पड़ेंगे बाज।

दधि-माखन से खेलते, वे दिन जाना भूल।

शीत-गृहों में रक्ष है, अब नवनीत अमूल।

कुदरत से खिलवाड़ कर, मद में है मनु चूर।

तर होते पनघट नहीं, और न यमुना पूर।

उस युग में तुम बो गए, रिश्तों में सद्भाव।

अब है रिश्ता एक ही, अपनों से अलगाव।

आना तो होगा तुम्हें, हरने भव का रोग।

वृन्दावन में आज भी, राह देखते लोग।

गोकुल को तुमने दिया, अमर प्रेम का रंग।

राधा अब भी चाहती, श्याम सखा का संग।

आओ प्यारे कृष्ण जी, लिए मुरलिया हाथ

झूला आकर झूलना, अपनी राधा साथ।

आज तुम्हारा जन्म दिन, मना रहा है देश।

कैसे भूलें ‘कल्पना’, गीता के उपदेश।

punah janm lo kriishn jee, dekho kaliyug ghor

naam tumhaaraa oढ़te, bhaanti-bhaanti ke chor

·

kans balee hain aaj ke, tumhen n denge taaj

taaj pahan yadi aa gae, jhapat padenge baaj

·

dadhi-maakhan se khelate, we din jaanaa bhool

sheet-griihon men raksh hai, ab nawaneet amool

·

kudarat se khilawaad kar, mad men hai manu choor

tar hote panaghat naheen, aur n yamunaa poor

·

us yug men tum bo gae, rishton men sadbhaaw

ab hai rishtaa ek hee, apanon se alagaaw

·

aanaa to hogaa tumhen, harane bhaw kaa rog

wriindaawan men aaj bhee, raah dekhate log

·

gokul ko tumane diyaa, amar prem kaa rang

raadhaa ab bhee chaahatee, shyaam sakhaa kaa sang

·

aao pyaare kriishn jee, lie muraliyaa haath

jhoolaa aakar jhoolanaa, apanee raadhaa saath

·

aaj tumhaaraa janm din, manaa rahaa hai desh

kaise bhoolen ‘kalpanaa’, geetaa ke upadesh

पुनः जन्म लो कृष्ण जी, देखो कलियुग घोर

नाम तुम्हारा ओढ़ते, भाँति-भाँति के चोर।

कंस बली हैं आज के, तुम्हें न देंगे ताज।

ताज पहन यदि आ गए, झपट पड़ेंगे बाज।

दधि-माखन से खेलते, वे दिन जाना भूल।

शीत-गृहों में रक्ष है, अब नवनीत अमूल।

कुदरत से खिलवाड़ कर, मद में है मनु चूर।

तर होते पनघट नहीं, और न यमुना पूर।

उस युग में तुम बो गए, रिश्तों में सद्भाव।

अब है रिश्ता एक ही, अपनों से अलगाव।

आना तो होगा तुम्हें, हरने भव का रोग।

वृन्दावन में आज भी, राह देखते लोग।

गोकुल को तुमने दिया, अमर प्रेम का रंग।

राधा अब भी चाहती, श्याम सखा का संग।

आओ प्यारे कृष्ण जी, लिए मुरलिया हाथ

झूला आकर झूलना, अपनी राधा साथ।

आज तुम्हारा जन्म दिन, मना रहा है देश।

कैसे भूलें ‘कल्पना’, गीता के उपदेश।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗