कनहल के फूल kanahal ke phool कनहल के फूल
फूलों के मौसम में फिर फिर
आ जाते कनहल के फूल।
रंग-रंग में नई उमंगें,
भर लाते कनहल के फूल।
धूप-पसीने से लथपथ हो
जब जीवन बोझिल होता
शीत-छाँव बन सुरभि स्नेह की
फैलाते कनहल के फूल।
इन फूलों से शोभित होती
घर घर पूजा की थाली
प्रभु चरणों की शोभा बनकर
इतराते कनहल के फूल।
नन्हें हाथ पकड़ डाली जब
इनको हसरत से छूते
बाहों भरकर उन हाथों को
सहलाते कनहल के फूल।
रातों की मृदु लोरी बनते
प्रातः की पुलकित पुरवा
बन बहार तपती दुपहर को
महकाते कनहल के फूल।
धन्य समझता माली खुद को
सींच पेड़ निज हाथों से
हर्षित होता जब गुच्छों में
लहराते कनहल के फूल।
पन्नों पर ये शब्द-चित्र बन
भाव भरे नगमें गाते
भीगे-भीगे हर कवि मन को
हुलसाते कनहल के फूल।
फूल नहीं ये देवदूत हैं
प्राणवायु मिलती इनसे
हर प्राणी को सौख्य सौंप दुख
अपनाते कनहल के फूल।
मानवता के इन मित्रों ने
लंबी उम्र नहीं पाई
मगर “कल्पना” सदा मनस में
बस जाते कनहल के फूल।
phoolon ke mausam men phir phir
aa jaate kanahal ke phool
rang-rang men naee umangen,
bhar laate kanahal ke phool
dhoop-paseene se lathapath ho
jab jeewan bojhil hotaa
sheet-chaanv ban surabhi sneh kee
phailaate kanahal ke phool
in phoolon se shobhit hotee
ghar ghar poojaa kee thaalee
prabhu charanon kee shobhaa banakar
itaraate kanahal ke phool
nanhen haath pakad daalee jab
inako hasarat se choote
baahon bharakar un haathon ko
sahalaate kanahal ke phool
raaton kee mriidu loree banate
praatah kee pulakit purawaa
ban bahaar tapatee dupahar ko
mahakaate kanahal ke phool
dhany samajhataa maalee khud ko
seench ped nij haathon se
harshit hotaa jab guchchon men
laharaate kanahal ke phool
pannon par ye shabd-chitr ban
bhaaw bhare nagamen gaate
bheege-bheege har kawi man ko
hulasaate kanahal ke phool
phool naheen ye dewadoot hain
praanawaayu milatee inase
har praanee ko saukhy saunp dukh
apanaate kanahal ke phool
maanawataa ke in mitron ne
lanbee umr naheen paaee
magar “kalpanaa” sadaa manas men
bas jaate kanahal ke phool
फूलों के मौसम में फिर फिर
आ जाते कनहल के फूल।
रंग-रंग में नई उमंगें,
भर लाते कनहल के फूल।
धूप-पसीने से लथपथ हो
जब जीवन बोझिल होता
शीत-छाँव बन सुरभि स्नेह की
फैलाते कनहल के फूल।
इन फूलों से शोभित होती
घर घर पूजा की थाली
प्रभु चरणों की शोभा बनकर
इतराते कनहल के फूल।
नन्हें हाथ पकड़ डाली जब
इनको हसरत से छूते
बाहों भरकर उन हाथों को
सहलाते कनहल के फूल।
रातों की मृदु लोरी बनते
प्रातः की पुलकित पुरवा
बन बहार तपती दुपहर को
महकाते कनहल के फूल।
धन्य समझता माली खुद को
सींच पेड़ निज हाथों से
हर्षित होता जब गुच्छों में
लहराते कनहल के फूल।
पन्नों पर ये शब्द-चित्र बन
भाव भरे नगमें गाते
भीगे-भीगे हर कवि मन को
हुलसाते कनहल के फूल।
फूल नहीं ये देवदूत हैं
प्राणवायु मिलती इनसे
हर प्राणी को सौख्य सौंप दुख
अपनाते कनहल के फूल।
मानवता के इन मित्रों ने
लंबी उम्र नहीं पाई
मगर “कल्पना” सदा मनस में
बस जाते कनहल के फूल।