कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १७३ / २०४ № 173 of 204 रचना १७३ / २०४
१८ नवम्बर २०१९ 18 November 2019 १८ नवम्बर २०१९

कनहल के फूल kanahal ke phool कनहल के फूल

फूलों के मौसम में फिर फिर

आ जाते कनहल के फूल।

रंग-रंग में नई उमंगें,

भर लाते कनहल के फूल।

धूप-पसीने से लथपथ हो

जब जीवन बोझिल होता

शीत-छाँव बन सुरभि स्नेह की

फैलाते कनहल के फूल।

इन फूलों से शोभित होती

घर घर पूजा की थाली

प्रभु चरणों की शोभा बनकर

इतराते कनहल के फूल।

नन्हें हाथ पकड़ डाली जब

इनको हसरत से छूते

बाहों भरकर उन हाथों को

सहलाते कनहल के फूल।

रातों की मृदु लोरी बनते

प्रातः की पुलकित पुरवा

बन बहार तपती दुपहर को

महकाते कनहल के फूल।

धन्य समझता माली खुद को

सींच पेड़ निज हाथों से

हर्षित होता जब गुच्छों में

लहराते कनहल के फूल।

पन्नों पर ये शब्द-चित्र बन

भाव भरे नगमें गाते

भीगे-भीगे हर कवि मन को

हुलसाते कनहल के फूल।

फूल नहीं ये देवदूत हैं

प्राणवायु मिलती इनसे

हर प्राणी को सौख्य सौंप दुख

अपनाते कनहल के फूल।

मानवता के इन मित्रों ने

लंबी उम्र नहीं पाई

मगर “कल्पना” सदा मनस में

बस जाते कनहल के फूल।

phoolon ke mausam men phir phir

aa jaate kanahal ke phool

rang-rang men naee umangen,

bhar laate kanahal ke phool

·

dhoop-paseene se lathapath ho

jab jeewan bojhil hotaa

sheet-chaanv ban surabhi sneh kee

phailaate kanahal ke phool

·

in phoolon se shobhit hotee

ghar ghar poojaa kee thaalee

prabhu charanon kee shobhaa banakar

itaraate kanahal ke phool

·

nanhen haath pakad daalee jab

inako hasarat se choote

baahon bharakar un haathon ko

sahalaate kanahal ke phool

·

raaton kee mriidu loree banate

praatah kee pulakit purawaa

ban bahaar tapatee dupahar ko

mahakaate kanahal ke phool

·

dhany samajhataa maalee khud ko

seench ped nij haathon se

harshit hotaa jab guchchon men

laharaate kanahal ke phool

·

pannon par ye shabd-chitr ban

bhaaw bhare nagamen gaate

bheege-bheege har kawi man ko

hulasaate kanahal ke phool

·

phool naheen ye dewadoot hain

praanawaayu milatee inase

har praanee ko saukhy saunp dukh

apanaate kanahal ke phool

·

maanawataa ke in mitron ne

lanbee umr naheen paaee

magar “kalpanaa” sadaa manas men

bas jaate kanahal ke phool

फूलों के मौसम में फिर फिर

आ जाते कनहल के फूल।

रंग-रंग में नई उमंगें,

भर लाते कनहल के फूल।

धूप-पसीने से लथपथ हो

जब जीवन बोझिल होता

शीत-छाँव बन सुरभि स्नेह की

फैलाते कनहल के फूल।

इन फूलों से शोभित होती

घर घर पूजा की थाली

प्रभु चरणों की शोभा बनकर

इतराते कनहल के फूल।

नन्हें हाथ पकड़ डाली जब

इनको हसरत से छूते

बाहों भरकर उन हाथों को

सहलाते कनहल के फूल।

रातों की मृदु लोरी बनते

प्रातः की पुलकित पुरवा

बन बहार तपती दुपहर को

महकाते कनहल के फूल।

धन्य समझता माली खुद को

सींच पेड़ निज हाथों से

हर्षित होता जब गुच्छों में

लहराते कनहल के फूल।

पन्नों पर ये शब्द-चित्र बन

भाव भरे नगमें गाते

भीगे-भीगे हर कवि मन को

हुलसाते कनहल के फूल।

फूल नहीं ये देवदूत हैं

प्राणवायु मिलती इनसे

हर प्राणी को सौख्य सौंप दुख

अपनाते कनहल के फूल।

मानवता के इन मित्रों ने

लंबी उम्र नहीं पाई

मगर “कल्पना” सदा मनस में

बस जाते कनहल के फूल।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗