कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १७९ / २०४ № 179 of 204 रचना १७९ / २०४
३० नवम्बर २०१९ 30 November 2019 ३० नवम्बर २०१९

खिल उठे प्यारे शिरीष khil uthe pyaare shireesh खिल उठे प्यारे शिरीष

रंग बिखरे, बाग निखरे

खिल उठे प्यारे शिरीष।

गाँव तक चलकर शहर

सब देखने निकले शिरीष।

खुशनसीबी है कि हैं

परिजन मेरे भी गाँव में

देके न्यौता ग्रीष्म में

मुझको बुला लेते शिरीष।

ताप का संताप देता

जेठ जब हर जीव को

तब बहा देते चमन में

सुरभि के झरने शिरीष।

डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी

पर इरादे वज्र से

नाजनीनों को झुलाते

झूल बन, भोले शिरीष।

जल जलाशय दें न दें

परवा इन्हें होती नहीं

बल्कि अपने दम पे मौसम

नम बना देते शिरीष।

लख अतुल सौन्दर्य इनका

दौड़ती हर लेखनी

और कविताओं में गुंथते

काव्य के गहने शिरीष।

मन नहीं होता कि वापस

छोड़ इन्हें जाऊँ शहर

कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये

आज के बिछड़े शिरीष।

rang bikhare, baag nikhare

khil uthe pyaare shireesh

gaanv tak chalakar shahar

sab dekhane nikale shireesh

·

khushanaseebee hai ki hain

parijan mere bhee gaanv men

deke nyautaa greeshm men

mujhako bulaa lete shireesh

·

taap kaa santaap detaa

jeth jab har jeew ko

tab bahaa dete chaman men

surabhi ke jharane shireesh

·

daaliyaan naazuk hain inakee

par iraade wajr se

naajaneenon ko jhulaate

jhool ban, bhole shireesh

·

jal jalaashay den n den

parawaa inhen hotee naheen

balki apane dam pe mausam

nam banaa dete shireesh

·

lakh atul saundary inakaa

daudatee har lekhanee

aur kawitaaon men gunthate

kaavy ke gahane shireesh

·

man naheen hotaa ki waapas

chod inhen jaaoon shahar

kab milen phir ‘kalpanaa’ ye

aaj ke bichade shireesh

रंग बिखरे, बाग निखरे

खिल उठे प्यारे शिरीष।

गाँव तक चलकर शहर

सब देखने निकले शिरीष।

खुशनसीबी है कि हैं

परिजन मेरे भी गाँव में

देके न्यौता ग्रीष्म में

मुझको बुला लेते शिरीष।

ताप का संताप देता

जेठ जब हर जीव को

तब बहा देते चमन में

सुरभि के झरने शिरीष।

डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी

पर इरादे वज्र से

नाजनीनों को झुलाते

झूल बन, भोले शिरीष।

जल जलाशय दें न दें

परवा इन्हें होती नहीं

बल्कि अपने दम पे मौसम

नम बना देते शिरीष।

लख अतुल सौन्दर्य इनका

दौड़ती हर लेखनी

और कविताओं में गुंथते

काव्य के गहने शिरीष।

मन नहीं होता कि वापस

छोड़ इन्हें जाऊँ शहर

कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये

आज के बिछड़े शिरीष।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗