खिल उठे प्यारे शिरीष khil uthe pyaare shireesh खिल उठे प्यारे शिरीष
रंग बिखरे, बाग निखरे
खिल उठे प्यारे शिरीष।
गाँव तक चलकर शहर
सब देखने निकले शिरीष।
खुशनसीबी है कि हैं
परिजन मेरे भी गाँव में
देके न्यौता ग्रीष्म में
मुझको बुला लेते शिरीष।
ताप का संताप देता
जेठ जब हर जीव को
तब बहा देते चमन में
सुरभि के झरने शिरीष।
डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी
पर इरादे वज्र से
नाजनीनों को झुलाते
झूल बन, भोले शिरीष।
जल जलाशय दें न दें
परवा इन्हें होती नहीं
बल्कि अपने दम पे मौसम
नम बना देते शिरीष।
लख अतुल सौन्दर्य इनका
दौड़ती हर लेखनी
और कविताओं में गुंथते
काव्य के गहने शिरीष।
मन नहीं होता कि वापस
छोड़ इन्हें जाऊँ शहर
कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये
आज के बिछड़े शिरीष।
rang bikhare, baag nikhare
khil uthe pyaare shireesh
gaanv tak chalakar shahar
sab dekhane nikale shireesh
khushanaseebee hai ki hain
parijan mere bhee gaanv men
deke nyautaa greeshm men
mujhako bulaa lete shireesh
taap kaa santaap detaa
jeth jab har jeew ko
tab bahaa dete chaman men
surabhi ke jharane shireesh
daaliyaan naazuk hain inakee
par iraade wajr se
naajaneenon ko jhulaate
jhool ban, bhole shireesh
jal jalaashay den n den
parawaa inhen hotee naheen
balki apane dam pe mausam
nam banaa dete shireesh
lakh atul saundary inakaa
daudatee har lekhanee
aur kawitaaon men gunthate
kaavy ke gahane shireesh
man naheen hotaa ki waapas
chod inhen jaaoon shahar
kab milen phir ‘kalpanaa’ ye
aaj ke bichade shireesh
रंग बिखरे, बाग निखरे
खिल उठे प्यारे शिरीष।
गाँव तक चलकर शहर
सब देखने निकले शिरीष।
खुशनसीबी है कि हैं
परिजन मेरे भी गाँव में
देके न्यौता ग्रीष्म में
मुझको बुला लेते शिरीष।
ताप का संताप देता
जेठ जब हर जीव को
तब बहा देते चमन में
सुरभि के झरने शिरीष।
डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी
पर इरादे वज्र से
नाजनीनों को झुलाते
झूल बन, भोले शिरीष।
जल जलाशय दें न दें
परवा इन्हें होती नहीं
बल्कि अपने दम पे मौसम
नम बना देते शिरीष।
लख अतुल सौन्दर्य इनका
दौड़ती हर लेखनी
और कविताओं में गुंथते
काव्य के गहने शिरीष।
मन नहीं होता कि वापस
छोड़ इन्हें जाऊँ शहर
कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये
आज के बिछड़े शिरीष।