कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ५८ / ६३ № 58 of 63 रचना ५८ / ६३
३० नवम्बर २०१९ 30 November 2019 ३० नवम्बर २०१९

नर-नारी दो चक्र हैं nar-naaree do chakr hain नर-नारी दो चक्र हैं

नर-नारी दो चक्र हैं, जीवन रथ की शान।

बना रहेगा संतुलन, गति हो अगर समान।

गतिहो अगर समान, नहीं पथ होगा बाधित

गृह-गुलशन गुलदान, रहेगा सदा सुवासित।

हर मुश्किल आसान, करेगी सोच हमारी।

बढ़ें हाथ से हाथ, मिलाकर यदि नर-नारी।

घर बाहर के बोझ से,  नारी है बेचैन।

हक़ तो उसने पा लिए, मगर खो दिया चैन।

मगर खो दिया चैन,  बढ़ाया बोझा अपना।

किसे सुनाए दर्द,  स्वयं ही बोया सपना।

करें स्वजन सहयोग, अगर अब आगे रहकर

बँट जाएगा बोझ, रहे बाहर या फिर घर।

nar-naaree do chakr hain, jeewan rath kee shaan

banaa rahegaa santulan, gati ho agar samaan

gatiho agar samaan, naheen path hogaa baadhit

griih-gulashan guladaan, rahegaa sadaa suwaasit

har mushkil aasaan, karegee soch hamaaree

bढ़en haath se haath, milaakar yadi nar-naaree

·

ghar baahar ke bojh se, naaree hai bechain

haq to usane paa lie, magar kho diyaa chain

magar kho diyaa chain, bढ़aayaa bojhaa apanaa

kise sunaae dard, svayan hee boyaa sapanaa

karen svajan sahayog, agar ab aage rahakar

bant jaaegaa bojh, rahe baahar yaa phir ghar

नर-नारी दो चक्र हैं, जीवन रथ की शान।

बना रहेगा संतुलन, गति हो अगर समान।

गतिहो अगर समान, नहीं पथ होगा बाधित

गृह-गुलशन गुलदान, रहेगा सदा सुवासित।

हर मुश्किल आसान, करेगी सोच हमारी।

बढ़ें हाथ से हाथ, मिलाकर यदि नर-नारी।

घर बाहर के बोझ से,  नारी है बेचैन।

हक़ तो उसने पा लिए, मगर खो दिया चैन।

मगर खो दिया चैन,  बढ़ाया बोझा अपना।

किसे सुनाए दर्द,  स्वयं ही बोया सपना।

करें स्वजन सहयोग, अगर अब आगे रहकर

बँट जाएगा बोझ, रहे बाहर या फिर घर।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗