किताबें कहती हैं kitaaben kahatee hain किताबें कहती हैं
हमसे रखो न खार,
किताबें कहती हैं।
हम भी चाहें प्यार,
किताबें कहती हैं।
घर के अंदर घर हो एक हमारा भी।
भव्य भाव संसार,
किताबें कहती हैं।
बतियाएगा मित्र हमारा नित तुमसे,
हँसकर हर किरदार,
किताबें कहती हैं।
खरीदकर ही साथ सहेजो,
जीवन भर,
लेना नहीं उधार,
किताबें कहती हैं।
धूल, नमी, दीमक से डर लगता हमको,
रखो स्वच्छ आगार,
किताबें कहती हैं।
कभी न भूलो जो संदेश मिले हमसे,
ऐसा हो इकरार,
किताबें कहती हैं।
सजावटी ही नहीं सिर्फ हमसे हर दिन,
करो विमर्श विचार,
किताबें कहती हैं।
सैर करो कोने कोने की खोल हमें,
चाहे जितनी बार,
किताबें कहती हैं।
रखो ‘कल्पना’ हर-पल हमें विचारों में
उपजेंगे सुविचार किताबें कहती हैं।
- कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
hamase rakho n khaar,
kitaaben kahatee hain
ham bhee chaahen pyaar,
kitaaben kahatee hain
ghar ke andar ghar ho ek hamaaraa bhee
bhavy bhaaw sansaar,
kitaaben kahatee hain
batiyaaegaa mitr hamaaraa nit tumase,
hansakar har kiradaar,
kitaaben kahatee hain
khareedakar hee saath sahejo,
jeewan bhar,
lenaa naheen udhaar,
kitaaben kahatee hain
dhool, namee, deemak se dar lagataa hamako,
rakho svachch aagaar,
kitaaben kahatee hain
kabhee n bhoolo jo sandesh mile hamase,
aisaa ho ikaraar,
kitaaben kahatee hain
sajaawatee hee naheen sirph hamase har din,
karo wimarsh wichaar,
kitaaben kahatee hain
sair karo kone kone kee khol hamen,
chaahe jitanee baar,
kitaaben kahatee hain
rakho ‘kalpanaa’ har-pal hamen wichaaron men
upajenge suwichaar kitaaben kahatee hain
- kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
हमसे रखो न खार,
किताबें कहती हैं।
हम भी चाहें प्यार,
किताबें कहती हैं।
घर के अंदर घर हो एक हमारा भी।
भव्य भाव संसार,
किताबें कहती हैं।
बतियाएगा मित्र हमारा नित तुमसे,
हँसकर हर किरदार,
किताबें कहती हैं।
खरीदकर ही साथ सहेजो,
जीवन भर,
लेना नहीं उधार,
किताबें कहती हैं।
धूल, नमी, दीमक से डर लगता हमको,
रखो स्वच्छ आगार,
किताबें कहती हैं।
कभी न भूलो जो संदेश मिले हमसे,
ऐसा हो इकरार,
किताबें कहती हैं।
सजावटी ही नहीं सिर्फ हमसे हर दिन,
करो विमर्श विचार,
किताबें कहती हैं।
सैर करो कोने कोने की खोल हमें,
चाहे जितनी बार,
किताबें कहती हैं।
रखो ‘कल्पना’ हर-पल हमें विचारों में
उपजेंगे सुविचार किताबें कहती हैं।
- कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी