कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ४७ / २०४ № 47 of 204 रचना ४७ / २०४
२३ जून २०१४ 23 June 2014 २३ जून २०१४

किताबें कहती हैं kitaaben kahatee hain किताबें कहती हैं

हमसे रखो न खार,

किताबें कहती हैं।

हम भी चाहें प्यार,

किताबें कहती हैं।

घर के अंदर घर हो एक हमारा भी।

भव्य भाव संसार,

किताबें कहती हैं।

बतियाएगा मित्र हमारा नित तुमसे,

हँसकर हर किरदार,

किताबें कहती हैं।

खरीदकर ही साथ सहेजो,

जीवन भर,

लेना नहीं उधार,

किताबें कहती हैं।

धूल, नमी, दीमक से डर लगता हमको,

रखो स्वच्छ आगार,

किताबें कहती हैं।

कभी न भूलो जो संदेश मिले हमसे,

ऐसा हो इकरार,

किताबें कहती हैं।

सजावटी ही नहीं सिर्फ हमसे हर दिन,

करो विमर्श विचार,

किताबें कहती हैं।

सैर करो कोने कोने की खोल हमें,

चाहे जितनी बार,

किताबें कहती हैं।

रखो ‘कल्पना’ हर-पल हमें विचारों में

उपजेंगे सुविचार किताबें कहती हैं।

- कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

hamase rakho n khaar,

kitaaben kahatee hain

·

ham bhee chaahen pyaar,

kitaaben kahatee hain

·

ghar ke andar ghar ho ek hamaaraa bhee

·

bhavy bhaaw sansaar,

kitaaben kahatee hain

·

batiyaaegaa mitr hamaaraa nit tumase,

·

hansakar har kiradaar,

kitaaben kahatee hain

·

khareedakar hee saath sahejo,

jeewan bhar,

·

lenaa naheen udhaar,

kitaaben kahatee hain

·

dhool, namee, deemak se dar lagataa hamako,

·

rakho svachch aagaar,

kitaaben kahatee hain

·

kabhee n bhoolo jo sandesh mile hamase,

·

aisaa ho ikaraar,

kitaaben kahatee hain

·

sajaawatee hee naheen sirph hamase har din,

·

karo wimarsh wichaar,

kitaaben kahatee hain

·

sair karo kone kone kee khol hamen,

·

chaahe jitanee baar,

kitaaben kahatee hain

·

rakho ‘kalpanaa’ har-pal hamen wichaaron men

·

upajenge suwichaar kitaaben kahatee hain

·

- kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हमसे रखो न खार,

किताबें कहती हैं।

हम भी चाहें प्यार,

किताबें कहती हैं।

घर के अंदर घर हो एक हमारा भी।

भव्य भाव संसार,

किताबें कहती हैं।

बतियाएगा मित्र हमारा नित तुमसे,

हँसकर हर किरदार,

किताबें कहती हैं।

खरीदकर ही साथ सहेजो,

जीवन भर,

लेना नहीं उधार,

किताबें कहती हैं।

धूल, नमी, दीमक से डर लगता हमको,

रखो स्वच्छ आगार,

किताबें कहती हैं।

कभी न भूलो जो संदेश मिले हमसे,

ऐसा हो इकरार,

किताबें कहती हैं।

सजावटी ही नहीं सिर्फ हमसे हर दिन,

करो विमर्श विचार,

किताबें कहती हैं।

सैर करो कोने कोने की खोल हमें,

चाहे जितनी बार,

किताबें कहती हैं।

रखो ‘कल्पना’ हर-पल हमें विचारों में

उपजेंगे सुविचार किताबें कहती हैं।

- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗