कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८५ / २०४ № 185 of 204 रचना १८५ / २०४
१२ जनवरी २०२० 12 January 2020 १२ जनवरी २०२०

नेताजी कुछ कहो netaajee kuch kaho नेताजी कुछ कहो

हर दिन दूने रात चौगुने

भूख-प्यास के दाम हुए।

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे

नारे क्यों नाकाम हुए।

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का

जन से मरहम माँग रहे

तने हुए थे कल खजूर बन

कैसे नमते आम हुए।

रंग बदलते देख तुम्हें अब

होते हैं हम दंग नहीं

चल पैदल गलियों में आए

क्यों भिक्षुक  हे राम! हुए।

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं

घूस और घोटाले सब

तिजोरियों में छाँव छिपाकर

जनता के हित घाम हुए।

कल उसकी थी  अब इसकी है

बार-बार टोपी बदली

लेकिन नमक हलाली के दिन

किस टोपी के नाम हुए?

वोट माँगने नोट बने हो

बन जाओगे चोट मगर

कसमें सारी भूल-भुलाकर

अगर ढोल के चाम हुए।

आश्वासन की फेंट मलाई

वादों का घृत बाँटा खूब

मगर हमारे नेताजी! अब

हम भी सजग तमाम हुए।

-कल्पना रामानी/ नवी  मुंबई

har din doone raat chaugune

bhookh-pyaas ke daam hue

netaajee! kuch kaho tumhaare

naare kyon naakaam hue

·

til-til dard bढ़aakar jan kaa

jan se maraham maang rahe

tane hue the kal khajoor ban

kaise namate aam hue

·

rang badalate dekh tumhen ab

hote hain ham dang naheen

chal paidal galiyon men aae

kyon bhikshuk he raam! hue

·

naam tumhaaraa jaap rahe hain

ghoos aur ghotaale sab

tijoriyon men chaanv chipaakar

janataa ke hit ghaam hue

·

kal usakee thee ab isakee hai

baar-baar topee badalee

lekin namak halaalee ke din

kis topee ke naam hue?

·

wot maangane not bane ho

ban jaaoge chot magar

kasamen saaree bhool-bhulaakar

agar dhol ke chaam hue

·

aashvaasan kee phent malaaee

waadon kaa ghriit baantaa khoob

magar hamaare netaajee! ab

ham bhee sajag tamaam hue

·

-kalpanaa raamaanee/ nawee munbaee

हर दिन दूने रात चौगुने

भूख-प्यास के दाम हुए।

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे

नारे क्यों नाकाम हुए।

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का

जन से मरहम माँग रहे

तने हुए थे कल खजूर बन

कैसे नमते आम हुए।

रंग बदलते देख तुम्हें अब

होते हैं हम दंग नहीं

चल पैदल गलियों में आए

क्यों भिक्षुक  हे राम! हुए।

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं

घूस और घोटाले सब

तिजोरियों में छाँव छिपाकर

जनता के हित घाम हुए।

कल उसकी थी  अब इसकी है

बार-बार टोपी बदली

लेकिन नमक हलाली के दिन

किस टोपी के नाम हुए?

वोट माँगने नोट बने हो

बन जाओगे चोट मगर

कसमें सारी भूल-भुलाकर

अगर ढोल के चाम हुए।

आश्वासन की फेंट मलाई

वादों का घृत बाँटा खूब

मगर हमारे नेताजी! अब

हम भी सजग तमाम हुए।

-कल्पना रामानी/ नवी  मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗