कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८६ / २०५ № 186 of 205 रचना १८६ / २०५
१२ जनवरी २०२० 12 January 2020 १२ जनवरी २०२०

नेताजी कुछ कहो netaajee kuch kaho नेताजी कुछ कहो

हर दिन दूने रात चौगुने

भूख-प्यास के दाम हुए।

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे

नारे क्यों नाकाम हुए।

॥

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का

जन से मरहम माँग रहे

तने हुए थे कल खजूर बन

कैसे नमते आम हुए।

॥

रंग बदलते देख तुम्हें अब

होते हैं हम दंग नहीं

चल पैदल गलियों में आए

क्यों भिक्षुक  हे राम! हुए।

॥

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं

घूस और घोटाले सब

तिजोरियों में छाँव छिपाकर

जनता के हित घाम हुए।

॥

कल उसकी थी  अब इसकी है

बार-बार टोपी बदली

लेकिन नमक हलाली के दिन

किस टोपी के नाम हुए?

॥

वोट माँगने नोट बने हो

बन जाओगे चोट मगर

कसमें सारी भूल-भुलाकर

अगर ढोल के चाम हुए।

॥

आश्वासन की फेंट मलाई

वादों का घृत बाँटा खूब

मगर हमारे नेताजी! अब

हम भी सजग तमाम हुए।

॥

-कल्पना रामानी/ नवी  मुंबई

har din doone raat chaugune

bhookh-pyaas ke daam hue

netaajee! kuch kaho tumhaare

naare kyon naakaam hue

·

til-til dard bढ़aakar jan kaa

jan se maraham maang rahe

tane hue the kal khajoor ban

kaise namate aam hue

·

rang badalate dekh tumhen ab

hote hain ham dang naheen

chal paidal galiyon men aae

kyon bhikshuk he raam! hue

·

naam tumhaaraa jaap rahe hain

ghoos aur ghotaale sab

tijoriyon men chaanv chipaakar

janataa ke hit ghaam hue

·

kal usakee thee ab isakee hai

baar-baar topee badalee

lekin namak halaalee ke din

kis topee ke naam hue?

·

wot maangane not bane ho

ban jaaoge chot magar

kasamen saaree bhool-bhulaakar

agar dhol ke chaam hue

·

aashvaasan kee phent malaaee

waadon kaa ghriit baantaa khoob

magar hamaare netaajee! ab

ham bhee sajag tamaam hue

·

-kalpanaa raamaanee/ nawee munbaee

हर दिन दूने रात चौगुने

भूख-प्यास के दाम हुए।

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे

नारे क्यों नाकाम हुए।

॥

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का

जन से मरहम माँग रहे

तने हुए थे कल खजूर बन

कैसे नमते आम हुए।

॥

रंग बदलते देख तुम्हें अब

होते हैं हम दंग नहीं

चल पैदल गलियों में आए

क्यों भिक्षुक  हे राम! हुए।

॥

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं

घूस और घोटाले सब

तिजोरियों में छाँव छिपाकर

जनता के हित घाम हुए।

॥

कल उसकी थी  अब इसकी है

बार-बार टोपी बदली

लेकिन नमक हलाली के दिन

किस टोपी के नाम हुए?

॥

वोट माँगने नोट बने हो

बन जाओगे चोट मगर

कसमें सारी भूल-भुलाकर

अगर ढोल के चाम हुए।

॥

आश्वासन की फेंट मलाई

वादों का घृत बाँटा खूब

मगर हमारे नेताजी! अब

हम भी सजग तमाम हुए।

॥

-कल्पना रामानी/ नवी  मुंबई

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मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗