नेताजी कुछ कहो netaajee kuch kaho नेताजी कुछ कहो
हर दिन दूने रात चौगुने
भूख-प्यास के दाम हुए।
नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे
नारे क्यों नाकाम हुए।
तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का
जन से मरहम माँग रहे
तने हुए थे कल खजूर बन
कैसे नमते आम हुए।
रंग बदलते देख तुम्हें अब
होते हैं हम दंग नहीं
चल पैदल गलियों में आए
क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।
नाम तुम्हारा जाप रहे हैं
घूस और घोटाले सब
तिजोरियों में छाँव छिपाकर
जनता के हित घाम हुए।
कल उसकी थी अब इसकी है
बार-बार टोपी बदली
लेकिन नमक हलाली के दिन
किस टोपी के नाम हुए?
वोट माँगने नोट बने हो
बन जाओगे चोट मगर
कसमें सारी भूल-भुलाकर
अगर ढोल के चाम हुए।
आश्वासन की फेंट मलाई
वादों का घृत बाँटा खूब
मगर हमारे नेताजी! अब
हम भी सजग तमाम हुए।
-कल्पना रामानी/ नवी मुंबई
har din doone raat chaugune
bhookh-pyaas ke daam hue
netaajee! kuch kaho tumhaare
naare kyon naakaam hue
til-til dard bढ़aakar jan kaa
jan se maraham maang rahe
tane hue the kal khajoor ban
kaise namate aam hue
rang badalate dekh tumhen ab
hote hain ham dang naheen
chal paidal galiyon men aae
kyon bhikshuk he raam! hue
naam tumhaaraa jaap rahe hain
ghoos aur ghotaale sab
tijoriyon men chaanv chipaakar
janataa ke hit ghaam hue
kal usakee thee ab isakee hai
baar-baar topee badalee
lekin namak halaalee ke din
kis topee ke naam hue?
wot maangane not bane ho
ban jaaoge chot magar
kasamen saaree bhool-bhulaakar
agar dhol ke chaam hue
aashvaasan kee phent malaaee
waadon kaa ghriit baantaa khoob
magar hamaare netaajee! ab
ham bhee sajag tamaam hue
-kalpanaa raamaanee/ nawee munbaee
हर दिन दूने रात चौगुने
भूख-प्यास के दाम हुए।
नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे
नारे क्यों नाकाम हुए।
तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का
जन से मरहम माँग रहे
तने हुए थे कल खजूर बन
कैसे नमते आम हुए।
रंग बदलते देख तुम्हें अब
होते हैं हम दंग नहीं
चल पैदल गलियों में आए
क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।
नाम तुम्हारा जाप रहे हैं
घूस और घोटाले सब
तिजोरियों में छाँव छिपाकर
जनता के हित घाम हुए।
कल उसकी थी अब इसकी है
बार-बार टोपी बदली
लेकिन नमक हलाली के दिन
किस टोपी के नाम हुए?
वोट माँगने नोट बने हो
बन जाओगे चोट मगर
कसमें सारी भूल-भुलाकर
अगर ढोल के चाम हुए।
आश्वासन की फेंट मलाई
वादों का घृत बाँटा खूब
मगर हमारे नेताजी! अब
हम भी सजग तमाम हुए।
-कल्पना रामानी/ नवी मुंबई