कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८७ / २०५ № 187 of 205 रचना १८७ / २०५
१४ जनवरी २०२० 14 January 2020 १४ जनवरी २०२०

मन पतंगों संग man patangon sang मन पतंगों संग

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।

लग रहा मौसम बदलना चाहता है।

बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का

धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।

चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा  को

सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।

काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर

भोर को वो गुल निरखना चाहता है।

नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर

डाली-डाली पर विचरना चाहता है।

हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम

हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।

ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन

प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।

- कल्पना रामानी-नवी मुम्बई

man patangon sang udanaa chaahataa hai

lag rahaa mausam badalanaa chaahataa hai

·

bढ़ chale din, kad huaa kam, sheet riitu kaa

dheere-dheere tan pighalanaa chaahataa hai

·

chalate-chalate rukh badal uttar dishaa ko

soory ban-than kar tahalanaa chaahataa hai

·

kaanpataa thaa barph baarish men jo shab bhar

bhor ko wo gul nirakhanaa chaahataa hai

·

need men dubakaa pakheroo mukt hokar

daalee-daalee par wicharanaa chaahataa hai

·

ho chalaa shonit taral, jeewan saralatam

har kadam aage ko bढ़naa chaahataa hai

·

jyon ghule gud-til, mile dil, mugdh jan-jan

prem-ras kaa svaad chakhanaa chaahataa hai

·

- kalpanaa raamaanee-nawee mumbaee

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।

लग रहा मौसम बदलना चाहता है।

बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का

धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।

चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा  को

सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।

काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर

भोर को वो गुल निरखना चाहता है।

नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर

डाली-डाली पर विचरना चाहता है।

हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम

हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।

ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन

प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।

- कल्पना रामानी-नवी मुम्बई

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗