मन पतंगों संग man patangon sang मन पतंगों संग
मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।
लग रहा मौसम बदलना चाहता है।
बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का
धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।
चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा को
सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।
काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर
भोर को वो गुल निरखना चाहता है।
नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर
डाली-डाली पर विचरना चाहता है।
हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम
हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।
ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन
प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।
- कल्पना रामानी-नवी मुम्बई
man patangon sang udanaa chaahataa hai
lag rahaa mausam badalanaa chaahataa hai
bढ़ chale din, kad huaa kam, sheet riitu kaa
dheere-dheere tan pighalanaa chaahataa hai
chalate-chalate rukh badal uttar dishaa ko
soory ban-than kar tahalanaa chaahataa hai
kaanpataa thaa barph baarish men jo shab bhar
bhor ko wo gul nirakhanaa chaahataa hai
need men dubakaa pakheroo mukt hokar
daalee-daalee par wicharanaa chaahataa hai
ho chalaa shonit taral, jeewan saralatam
har kadam aage ko bढ़naa chaahataa hai
jyon ghule gud-til, mile dil, mugdh jan-jan
prem-ras kaa svaad chakhanaa chaahataa hai
- kalpanaa raamaanee-nawee mumbaee
मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।
लग रहा मौसम बदलना चाहता है।
बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का
धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।
चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा को
सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।
काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर
भोर को वो गुल निरखना चाहता है।
नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर
डाली-डाली पर विचरना चाहता है।
हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम
हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।
ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन
प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।
- कल्पना रामानी-नवी मुम्बई