कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९८ / २०४ № 98 of 204 रचना ९८ / २०४
२२ जुलाई २०१५ 22 July 2015 २२ जुलाई २०१५

जिनके मन में सच की सरिता बहती है jinake man men sach kee saritaa bahatee hai जिनके मन में सच की सरिता बहती है

जिनके

मन में सच की सरिता बहती है

उनकी

कुदरत भी होती हमजोली है

जब-जब

बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस

तब-तब

कविता मुखरित होकर बोली है

शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई

गुण, भावों की

होती कभी न चोरी है

होते

वे ही जलील जहाँ के तानों से

बेच

ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है

खोदें

खल बुनियाद लाख अच्छाई की

इस

ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है

बनी

कौन सी सुई? सिये जो सच के होंठ

किए

जिन्होंने जतन, मात ही खाई है

पानी

मरता देख कुटिल बेशर्मों का

माँ

धरती भी हुई शर्म से पानी है

कलम

‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी

रचना

उसकी खुद विज्ञापन होती है

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

jinake

man men sach kee saritaa bahatee hai

·

unakee

kudarat bhee hotee hamajolee hai

·

jab-jab

bढ़te lobh, paap, santraas, tamas

·

tab-tab

kawitaa mukharit hokar bolee hai

·

shabd, ibaarat, kaagaz chaahe churaae koee

·

gun, bhaawon kee

hotee kabhee n choree hai

·

hote

we hee jaleel jahaan ke taanon se

·

bech

zameer jinhonne ‘waah’ batoree hai

·

khoden

khal buniyaad laakh achchaaee kee

·

is

zameen men bandhu! bahut bal baakee hai

·

banee

kaun see suee? siye jo sach ke honth

·

kie

jinhonne jatan, maat hee khaaee hai

·

paanee

marataa dekh kutil besharmon kaa

·

maan

dharatee bhee huee sharm se paanee hai

·

kalam

‘kalpanaa’ hai nirdosh rasit jisakee

·

rachanaa

usakee khud wijnaapan hotee hai

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

जिनके

मन में सच की सरिता बहती है

उनकी

कुदरत भी होती हमजोली है

जब-जब

बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस

तब-तब

कविता मुखरित होकर बोली है

शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई

गुण, भावों की

होती कभी न चोरी है

होते

वे ही जलील जहाँ के तानों से

बेच

ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है

खोदें

खल बुनियाद लाख अच्छाई की

इस

ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है

बनी

कौन सी सुई? सिये जो सच के होंठ

किए

जिन्होंने जतन, मात ही खाई है

पानी

मरता देख कुटिल बेशर्मों का

माँ

धरती भी हुई शर्म से पानी है

कलम

‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी

रचना

उसकी खुद विज्ञापन होती है

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗