कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ५८ / ११४ № 58 of 114 रचना ५८ / ११४
२५ जुलाई २०१७ 25 July 2017 २५ जुलाई २०१७

अपना खून apanaa khoon अपना खून

“किसका फोन था सोनल? अरे, यह तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है, क्या हुआ?” अखबार समेटकर रखते हुए विशाल ने पत्नी की ओर देखते हुए पूछा।

- पिताजी का फोन था विशु… भैया-भाभी उनको बहुत परेशान करने लगे हैं। उनकी किसी बात की वे परवा नहीं करते। माँ के बाद तो वे वैसे भी कितने अकेले हो गए हैं न, और अब...भाभी तो ठीक है, पराए घर की है लेकिन भैया को तो उनका खयाल रखना चाहिए न, वो तो उनका अपना खून है...रुआँसी आवाज़ में सोनल ने बताया।

“तुम बिलकुल सच कह रही हो सोनल, मैंने भी व्यर्थ पिताजी को तुम्हारे कहने में आकर वृद्धाश्रम पहुँचा दिया, आज ही उनको घर लेकर आता हूँ...” विशाल जैसे गहरी निद्रा से जागते हुए बोल उठा।

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“kisakaa phon thaa sonal? are, yah tumhaaraa cheharaa kyon utaraa huaa hai, kyaa huaa?” akhabaar sametakar rakhate hue wishaal ne patnee kee or dekhate hue poochaa

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- pitaajee kaa phon thaa wishu… bhaiyaa-bhaabhee unako bahut pareshaan karane lage hain unakee kisee baat kee we parawaa naheen karate maan ke baad to we waise bhee kitane akele ho gae hain n, aur abbhaabhee to theek hai, paraae ghar kee hai lekin bhaiyaa ko to unakaa khayaal rakhanaa chaahie n, wo to unakaa apanaa khoon hairiuaansee aawaaz men sonal ne bataayaa

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“tum bilakul sach kah rahee ho sonal, mainne bhee wyarth pitaajee ko tumhaare kahane men aakar wriiddhaashram pahunchaa diyaa, aaj hee unako ghar lekar aataa hoon” wishaal jaise gaharee nidraa se jaagate hue bol uthaa

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“किसका फोन था सोनल? अरे, यह तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है, क्या हुआ?” अखबार समेटकर रखते हुए विशाल ने पत्नी की ओर देखते हुए पूछा।

- पिताजी का फोन था विशु… भैया-भाभी उनको बहुत परेशान करने लगे हैं। उनकी किसी बात की वे परवा नहीं करते। माँ के बाद तो वे वैसे भी कितने अकेले हो गए हैं न, और अब...भाभी तो ठीक है, पराए घर की है लेकिन भैया को तो उनका खयाल रखना चाहिए न, वो तो उनका अपना खून है...रुआँसी आवाज़ में सोनल ने बताया।

“तुम बिलकुल सच कह रही हो सोनल, मैंने भी व्यर्थ पिताजी को तुम्हारे कहने में आकर वृद्धाश्रम पहुँचा दिया, आज ही उनको घर लेकर आता हूँ...” विशाल जैसे गहरी निद्रा से जागते हुए बोल उठा।

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗