एक रात का साथ ek raat kaa saath एक रात का साथ
मित्रो, उम्मीद करती हूं आपको यह कहानी अवश्य पसंद आएगी
एक रात का साथ
यामिनी लंबे लंबे डग भरती हांफती हुई झाड़ झंखाड़ फलांगती दो किलोमीटर का पक्का रास्ता छोड़कर कच्ची पगडंडी से 10 मिनिट में नंदा के घर पहुंच गई।
आज शुक्रवार था और उसके मंगेतर चंदन का दुबई से फोन आने वाला था।
निश्चित समय पर पहुंचना ही था, वरना एक बार फोन कट जाने के बाद उसे अगले शुक्रवार तक इंतजार करना पड़ता।
यामिनी एक गरीब किसान माता पिता की सबसे बड़ी बेटी थी। गाँव के स्कूल से 11 वीं कक्षा पिछले साल ही उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। उससे दो छोटी बचनें क्रमशः 10 वीं और नौवीं कक्षा में पढ़ाई कर रही थीं।
पिता दुर्गाप्रसाद ने उनकी प्रतिभा और पढ़ने की लगन देखकर उन्हें 11 वीं तक पढ़ाने का निर्णय लिया था ताकि उनके लिए शहर में किसी खाते पीते घर के कमाऊ लड़के आसानी से मिल सकें। तीनों बेटियाँ सुंदर तो थीं ही, घर और कृषि कार्य में भी माता पिता के सान्निध्य में निपुण हो चुकी थीं। अतः सीमित आमदनी में दहेज जुटाने की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती थी।
दुर्गाप्रसाद की सोच गलत नहीं थी, शीघ्र ही यामिनी के लिए गाँव के ही एक लड़के चंदन का रिश्ता आ गया। चंदन ने शहर से बी ए तक पढ़ाई पूरी कर ली थी और उसे दुबई में अच्छी तनखा वाले जॉब का ऑफर आ चुका था।
चंदन के पिता रतनलाल और दुर्गाप्रसाद के खेत आसपास होने से उनके बीच राम राम होती रहती थी और उसकी बेटियों से भी आते जाते जान पहचान हो चुकी थी।
यामिनी ने जैसे ही नंदा के घर के द्वार पर
दस्तक दी, सामने एक युवक को देखकर हड़बड़ाहट में दो कदम पीछे हट गई।
युवक ने उसकी मनोदशा भांपकर माँ को बुला लिया और स्वयं अंदर जाने लगा।
नंदा की मां ने उसे देखते ही मुस्कुराकर अंदर बुलाया और बोली-
"आओ यामिनी बेटी, नंदा तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। उसे मैंने पड़ोस में काम से भेजा है, वो आती ही होगी। तुम बैठो, मैं ज़रा जल्दी में हूँ, आकाश को दोस्तों से मिलने जाना है, मैं उसके लिए नाश्ता बना रही हूँ।"
यामिनी ने बैठक में नज़र घुमाई तो उस युवक को लैंड लाइन फोन के निकट वाले सोफे पर ही बैठे देखकर सोचा-
"यही नंदा का भाई आकाश होगा, नंदा ने बताया तो था कि उसका भाई मुम्बई से 15 दिन की छुट्टी में घर आ रहा है और इस बार उसका रिश्ता तय करके ही वापस भेजेंगे। 4 साल तक मामा के पास रहकर कॉलेज की पढ़ाई की है। अब उसकी नौकरी लग गई है तो उसने एक फ्लैट भी किराए पर ले लिया है।"
उधर आकाश तो यामिनी को एक नज़र देखते ही उसपर दिलोजान से मर मिटा था और उसके मन में यह सोचकर लड्डू फूट रहे थे कि हो न हो, इसे नंदा ने मुझसे मिलवाने के लिए ही बुलाया है।
यामिनी उसे देखकर संकोचवश खड़ी ही रही। उसकी निगाहें फोन और सामने लगी हुई घड़ी के कांटों पर टिकी हुई थी और आकाश को लग रहा था, वो उसी की तरफ देख रही है।
दोनों एक दूसरे की मनोदशा से बेखबर
थे।
तभी यामिनी को खड़ी देखकर आकाश को अपनी गलती का आभास हुआ उसने यामिनी को संबोधित करते हुए कहा-
"आप खड़ी क्यों हैं यामिनी जी, बैठिए न..."
तभी नंदा ने अंदर प्रवेश करते हुए कहा-
"अक्की, तुम इधर इस सोफे पर आ जाओ। यामी का फोन आने वाला है, वो इसीलिए सुबह सुबह यहाँ आई है।"
"ओह! फिर तो मैं अंदर ही चला जाता हूँ..." फिर माँ को आवाज़ लगाकर बोला
"माँ मेरा नाश्ता कमरे में ही भेज देना।"
उसके जाते ही यामिनी की जान में जान आई। वो अभी बैठी ही थी कि चंदन का फोन आ गया। यामिनी के रिसीवर उठाते ही नंदा ने कहा-
"यामी, तुम आराम से बात कर लो, मैं तब तक भैया को नाश्ता पहुँचाकर आती हूँ, फिर हम दोनों एक साथ नाश्ता करेंगी।"
और वो बैठक का दरवाजा उड़काकर चली गई।
नंदा आकाश का नाश्ता उसके कमरे में ले गई तो उसने प्लेट एक तरफ रखकर बहन को बैठने का इशारा किया और धड़कते दिल से पूछ लिया-
"नंदी, क्या यह लड़की वही यामिनी है, जिसके साथ रिश्ता जोड़ने के लिए तुम पिछले साल से मेरे पीछे पड़ी थी, अगर हाँ, तो मुझे यामिनी पसंद है। अब इसके अलावा कोई और चित्र दिखाकर मुझे भ्रमित मत करना... उसके सौंदर्य, मधुर मुस्कान, बातचीत के अंदाज़, चेहरे की मासूमियत .ने मेरा दिल जीत लिया है..और...और...अधिक प्रशंसा नहीं कर पा रहा, क्योंकि मैं कवि तो हूँ नहीं, एक यथार्थवादी कहानी लेखक के पास उपमाओं का बोध कहाँ से आए..."
"बस करो महाशय, बहुत गुणगान हो चुका। बिना मुझे अवसर दिए एक तरफा बोले ही जा रहे हो, यामिनी अब तुम्हारी पहुँच के बाहर है। उस समय तो तुम्हें मेरी बात सुनना भी गवारा नहीं था तो उसे मैं किस अधिकार से रोके रखती... उसकी सगाई पिछले साल ही हो चुकी है और उसका मंगेतर चंदन दुबई में नौकरी कर रहा है। कुछ ही दिनों में वो आने वाला है और अब शादी करके उसे अपने साथ ले जाएगा।"
"ओह! लेकिन नंदी, तुम ज़बानी ही तो उसका गुणगान करती रहती थी न, मैंने अगर एक बार भी उसकी झलक देख ली होती तो कसम से कभी दूसरी लड़की की तरफ देखता भी नहीं..."
"पर अब इसके सपने देखना छोड़ दो अक्की... मैं अपने साथ 11 वीं तक पढ़ चुकी 6 में से 5 के संपर्क में अभी भी हूँ। सबका चित्र और बायोडाटा भी उपलब्ध है। तुम्हें उनमें से कोई पसंद आए तो ठीक, वरना या तो किसी मुम्बइया लड़की या फिर इसी गाँव की कमपढ़ लड़की के साथ ही फेरे लेने पड़ेंगे।"
"अरे नंदी यार, मैंने इनकार ही कब किया जो इतना सुना रही हो। घर तो बसाना ही है, मगर दिल को जो चोट लगी है, उसके ठीक होने में समय ज़रूर लगेगा। सारे चित्र लेकर आओ, मैं आराम से उनका बायोडाटा देखकर अपनी पसंद बता दूँगा, बस खुश..."
नंदा चित्र लेने दौड़ पड़ी और आकाश मन ही मन आह भरकर देवदास की मुद्रा में किसी पुरानी फ़िल्म का गीत गुनगुनाने लगा-
"ले लेके हार फूलों के, आई तो थी बहार
नसरें उठाके हमने ही देखा न एक बार आंखों से अब ये परदे हटाए तो क्या किया...
सब कुछ लुटाके होश में आए तो क्या किया..."
नंदा ने चित्र और बायोडाटा पेपर वहाँ रखे और आकाश को जल्दी से नाश्ता करने को बोलकर बैठक का दरवाजा खुला देखकर उस तरफ चली गई।
मगर यह क्या! यामिनी के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और आंखों से आँसू बह रहे थे। वो बच्चों जैसे सुबक सुबककर
रो रही थी।
"अरे, क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो यामी, सब कुशल तो है न, चुप हो जाओ प्लीज़ और मुझे बताओ क्या बात हो गई जो इस तरह ..."
"नंदी, चंदन अब तीन साल बाद आने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस नौकरी में तनखा इतनी कम है कि विवाह के बाद परिवार बसाना सम्भव नहीं। वे लोग तनखा बढ़ाने को तैयार नहीं थे तो दूसरी कंपनी में ज्वाइन कर लिया है।
वहाँ तनखा अच्छी है लेकिन 3 साल से पहले यहाँ आ नहीं सकेंगे। कह रहे कि मेरा कोई ऐसा मित्र भी इस गाँव में नहीं, जिसे पासपोर्ट बनवाकर तुम्हें दुबई भेजने की जवाबदारी देता। हम सब एक साथ दुबई आ गए हैं।
नंदी, उनके पिताजी ने मेरे पिताजी को पिछले शुक्रवार यह सब बताकर कह दिया कि वे अब उनके बेटे का रास्ता न देखकर यामिनी का विवाह कहीं और कर दें। पिताजी ने यह सुनकर मेरे ऊपर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि मैं उसे भूल जाऊं। मगर तुम्हीं बताओ सखी, क्या यह संभव है? मैं उनके अंगूठी पहनाते हुए हाथ के दबाव से उत्पन्न सिहरन, उनकी तन मन को रोमांचित करती हुई मुस्कान, अंतर घट में समाती हुई गहरी प्रेमिल निगाहें कैसे भूल सकती हूँ।
मैं तो जीवन भर उनका इंतजार कर सकती हूँ लेकिन मेरे माँ पिता बिल्कुल तैयार नहीं, मेरी शादी की तैयारियां बड़ी मुश्किल से पूरी हुई हैं और अब गीतू नीतू के भी रिश्ते आने लगे हैं तो मुझे इतना समय घर नहीं बिठा सकते।
मैं एक बार स्वयं उनसे बात करना चाहती थी। ससुराल वाले हर शुक्रवार मुझे भी बुलाकर उनसे बात करवाते हैं। मगर सबके सामने मन की बात कर नहीं सकती, मगर उन्होंने भी यही कहा। अब तुम्हीं बताओ सखी, मैं क्या करूँ। जिसे एक बार अपना मान लिया, उसके सिवा किसी और से शादी करके एक ज़िंदा लाश की तरह मैं ज़िंदगी बसर नहीं कर सकूँगी।"
यामिनी की बात सुनकर नंदा भी सोच में पड़ गई। अचानक उसके मन में बिजली सी कौंधी और वो चुटकी बजाते हुए यामिनी से बोली-
"रुको यामी, तुम ज़रा अंदर बैठो, में अभी आई... " और वो तीर की तरह अंदर आकाश के कमरे में पहुंच गई।
आकाश नाश्ता समाप्त करके बैठा ही था कि नंदा उसके सामने आकर बैठ गई और यामिनी से हुई पूरी बातचीत और उसकी समस्या बताकर पूछा-
"अक्की, मैं यह जानती हूँ कि तुम्हारी छुट्टियाँ सीमित हैं।मगर यामिनी की समस्या अहम है। में चाहती हूँ कि तुम उसकी दुबई पहुँचने में सहायता करो।"
आकाश कुछ देर सोचता रहा। उसके मन में क्षणमात्र को यह विचार भी आया कि वो अगर अपने माता पिता की बात मानकर उससे शादी कर ले तो शायद वो उसका दिल जीतने में सफल भी हो जाए मगर यह उसके प्रति सरासर अन्याय होगा। उसे निःस्वार्थ रहकर यामिनी की सहायता करनी चाहिए।
उसने बहन से कहा-
"नंदी, अगर उसे आपत्ति न हो तो मैं उससे रूबरू विस्तृत बात करना चाहता हूँ।"
"यह कोई बड़ी बात नहीं अक्की, चलो मैं तुम दोनों का परिचय करवा देती हूँ।"
उन दोनों को बैठक में एक साथ देखकर यामिनी ने उम्मीद भरी नजरों से उन्हें निहारा।
नंदा ने उसे आकाश से मिलवाते हुए कहा-
"यामी, मां और बाबूजी खेत पर जा चुके हैं और अब मुझे दिन का खाना बनाकर वहाँ पहुंचाना है। अगर तुम्हें मेरे भाई से मन की बात साझा करने में कोई ऐतराज न हो तो भैया शायद तुम्हारी सहायता कर सकेंगे।"
यामिनी को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी, उसे तो मन की मुराद ही मिल गई थी। तुरंत बोली-
"इसमें आपत्ति की तो कोई बात ही नहीं..."
नंदा उन्हें छोड़कर रसोई में चली गई तो आकाश ने यामिनी का मन टटोलते हुए चर्चा आरम्भ की।
"यामिनी जी, नंद मुझे आपकी समस्या बता दी है, आपके दृढ़ निश्चय से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। नंदा ने आपको मेरे यहाँ आने का उद्देश्य तो बताया ही होगा मगर आपकी सहायता के लिए अपनी बहन की बात को प्राथमिकता देना अपना फर्ज समझता हूँ। मगर आपस में बेहिचक बात करने के लिए
आपको पहले मेरी मित्रता स्वीकार करनी होगी।"
कहते हुए आकाश ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया, मगर यामिनी ने हाथ मिलाने के बजाय मुस्कुराकर हाथ जोड़ते हुए जवाब दिया-
"आप जैसा सुसंस्कृत मित्र मिलना मेरा सौभाग्य है आकाश जी... "
आकाश तुरंत अपना हाथ वापस खींचते हुए बोला-
"यामिनी जी, आपने दुबई जाने का मन बना ही लिया है तो मैं आपकी सहायता अवश्य करूँगा।
अब हम मित्र बन चुके हैं तो मैं अपने मन की बात भी बिना लाग लपेट के आपसे साझा करूँगा।"
"जी..." यामिनी ने संक्षिप्त जवाब दिया
"मेरी छुट्टियां केवल 15 दिन की हैं, मैं अपना सारा कार्यक्रम स्थगित करके आपके लिए इतने कम समय में दुबई यात्रा के लिए सारी औपचारिकताएं पूर्ण करने से लेकर आपको एयरपोर्ट तक पहुंचाने की जवाबदारी अपने ऊपर ले रहा हूँ।
मगर... कभी कभी दोस्ती भी त्याग के एवज में कुछ प्रतिदान माँगती है और मेरा त्याग भी आपसे कुछ प्रतिदान चाहता है..." आकाश ने रसोई की तरफ देखते हुए कुछ धीमी आवाज़ में कहा
आकाश की बदले हुए लहजे में बात सुनकर पहले तो यामिनी एकबारगी काँप गई कि न जाने वो क्या कहना चाहता है फिर नंदा की उपस्थिति से उसे आश्वस्ति हुई और उसने दृढ़ शब्दों में कहा-
"मैं कुछ समझी नहीं आकाश जी, कृपया स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कहिये।"
"देखिए, पहले तो वादा कीजिये कि मेरी बात पूरी होने तक आप कुछ नहीं बोलेंगी।"
"चलिए मान लिया... अब बताइए आप बदले में मुझसे क्या चाहते हैं..."
"टिकट कन्फर्म होने के बाद , एयरपोर्ट छोड़ने से पहले आपका सिर्फ एक रात का साथ..."
आकाश के ये शब्द सुनते ही यामिनी को लगा जैसे आकाश ने उसे भरी सभा में निर्वस्त्र कर दिया हो, तड़पकर जवाब देने को मुँह खोलने को हुई तो आकाश ने अपने होठों पर उंगली रखकर रसोई की तरफ इशारा करके चुप रहने का संकेत किया और बोला-
"कृपया आप पूरी बात सुन लीजिए, आपने वादा किया है...मेरी तरफ से कोई ज़बरदस्ती नहीं है, अगर आप चंदन तक पहुँचने के लिए इतना त्याग कर सकती हैं तो मेरी बात पर आराम से विचार करके जवाब दीजिए। मैं दस मिनिट बाद वापस आता हूँ।"
आकाश के बाहर जाते ही यामिनी ने उसे अविश्वसनीय नज़रों से ताकते हुए निढाल होकर अपनी पीठ सोफे से लगा ली। उसके जेहन में अथाह पीड़ा का स्रोत उमड़ पड़ा था। वो आंखें मूँदकर गहरी सोच में डूब गई।
"तो यही इनकी चारित्रिक विशेषता और संस्कार हैं। यह शालीन व्यवहार और सदाशयता केवल दिखावा है। नंदा क्या अपने भाई के इसी चरित्र की स्तुति करने नहीं थकती थी?
शायद सभी पुरुष ऐसे ही होते होंगे। उनके लिए औरत केवल भोग की वस्तु है। मगर नहीं, उसका चंदन ऐसा बिल्कुल नहीं मगर अब वो करे तो क्या करे। अपना दर्द किसी से बाँट भी नहीं सकती, अगर इनकार करती है तो माँ बाबूजी के दबाव के चलते चंदन को हमेशा के लिए खो देगी। उचित यही होगा कि वो परिस्थिति को स्वीकार करके आकाश की शर्त मान ले फिर इसे एक दुर्घटना समझकर भूल जाए। चंदन नहीं मिला तो यही तन सदा के लिए किसी अनचाहे पुरुष को सौंपना ही होगा।
तन तो माटी का है, मिटना ही है, मगर मन से चंदन की खुशबू कोई नहीं मिटा सकता।"
तभी मन के किसी कोने से आवाज़ आई-
"यामिनी, क्या तुम्हारे यह निर्णय चंदन के साथ धोखा नहीं..."
"नहीं, बिल्कुल नहीं ...धोखा तो तब होता जब यह कृत्य जानबूझकर किया जाता। यह तो अपना प्रेम पाने के लिए एक मजबूर नारी का बलिदान ही कहा जाएगा।"
उसने निर्णय कर लिया और आकाश के वापस आने पर नज़रें झुकाकर मरी हुई आवाज़ में कहा-
"मुझे आपकी शर्त स्वीकार है।"
फिर यामिनी उठकर घर जाने के लिए नंदा से अनुमति लेने के लिये रसोई की ओर बढ़ गई तो आकाश भी वहाँ पहुँच गया और बोला-
"यामिनी जी, अब आप भोजन करके ही घर जाइयेगा, मैं शाम को ही नंदा के साथ आपके घर आकर आपके माता पिता को सारी बात समझाकर संभावित खर्च का ब्यौरा बता दूँगा।"
यामिनी ने देर होने की बात कहकर भोजन के लिए क्षमा मांग ली और आकाश की घिनौनी शर्त पर उसे मन ही मन दुष्ट, पापी, चरित्रहीन आदि विभूषणों से नवाजती हुई अपने घर आ गई।
यामिनी की ज़िद और दृढ़ निश्चय देखकर उसके पिता को यामिनी को दुबई जाने की अनुमति दे दी और यामिनी की ही शादी के लिए बनवाए हुए गहने गिरवी रखकर आकाश द्वारा बताई हुई रकम जुटा ली।
में
आकाश ने यामिनी को नंदा के साथ ले जाकर एक मोबाइल खरीद दिया और बाकी रकम बैंक में खाता खुलवाकर
जमा करवा दी। शेष सारी औपचारिकताएं पूरी करने में चार दिन बीत गए। तत्काल में हवाई टिकट कन्फर्म होने के बाद आकाश के पास अब केवल एक सप्ताह बाकी था। अब चूँकि कुछ औपचारिकताएं मुम्बई दूतावास पर जाकर पूरी होनी थीं अतः उसने मुम्बई के लिए हवाई यात्रा से एक दिन पहले के टिकट करवाकर यामिनी को तैयार रहने के लिए कह दिया।
एक दिन उन्हें मुम्बई में ही रुकना था।
निर्धारित तिथि पर यामिनी अपने माता पिता , बहनों और ससुराल वालों से विदा लेकर आकाश के साथ सफर पर चल दी।
इस सारी प्रक्रिया के दौरान आकाश ने उसके साथ कभी किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार नहीं किया, न ही उससे कभी अकेले में मिलने का प्रयास किया।
आकाश के व्यवहार और उसकी घिनौनी शर्त में असमानता से स्तब्ध यामिनी मुम्बई पहुँचने तक विचारों के ज्वार भाटे में डूबती उतराती ही रही।
वे सुबह 12 बजे तक मुम्बई सेंट्रल पहुँच गए। रुकने के लिए आकाश ने एयरपोर्ट के पास पड़ने वाले होटल में एक रूम बुक करवा लिया था।
वहां पहुंचकर सामान व्यवस्थित करके फ्रेश होकर भोजन करके वे दूतावास के लिए निकल गए।
यामिनी ने होटल में एक बात नोट की कि
उनका कमरा दो सिंगल बेड वाला था।
न जाने अब यह कयामत की रात किस रूप में आने वाली है, इसी सोच में वो जैसे तैसे चंदन को याद करती हुई समय काटती रही।
काम हो जाने के बाद होटल पहुंचते पहुंचते डूबते सूरज के साथ साथ यामिनी का दिल भी डूबने लगा था। थकावट तो आकाश के चेहरे पर भी साफ झलक रही थी मगर यामिनी की उपस्थिति के कारण शांति से समय काटने के लिए उसने यामिनी को आराम करने के लिए कहकर अपने बैग से एक कॉपी पेन निकाली और पलंग के साथ लगे हुए सोफे पर बैठकर कुछ लिखने लगा।
यामिनी ने भी अपने बैग से एक किताब निकाली और यों ही पढ़ने का उपक्रम करती हुई आने वाले तूफान का सामना करने की हिम्मत जुटाने लगी।
आकाश ने भोजन का ऑर्डर दे दिया था। कुछ देर बाद ही बैरा भोजन लेकर आ गया ।
आकाश ने सोफे के साथ रखी हुई टी टेबल पर भोजन परोसकर यामिनी को
आने का इशारा किया। मगर यामिनी पर आने वाले पल का डर इस कदर हावी हो चुका था कि उसकी भूख ही मर गई थी।
उसने टूटी हुई आवाज़ में कहा-
"आकाश जी, मुझे भूख नहीं है, आप भोजन कर लीजिए।"
"ऐसा कैसे हो सकता है यामिनी जी, आपने दिन में भी ठीक से कुछ नहीं खाया।"
मगर यामिनी पलंग से नहीं हिली। आखिर आकाश उठकर उसके निकट आया और बोला-
"यामिनी जी, मैं आपकी मनोदशा भली भाँति समझ सकता हूँ, मगर आप जो सोच रही हैं, वो कुछ नहीं होने वाला, मैं इतना गिरा हुआ इंसान नहीं हूँ। मेरे लिए हर नारी सम्माननीय है। अपने स्वार्थ के लिए आपके मन को चोट पहुँचाने के अपराध के लिए आपसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगता हूँ। प्रायश्चित तो आपकी सहायता के साथ ही पूरा हो गया है। चलिए भोजन करके आप आराम से सो जाइयेगा।
बात दरअसल यह है कि मैं एक यथार्थवादी कहानी लेखक भी हूँ। हाल में स्त्री के चरित्र पर कहानी लिख रहा हूँ। विषय यही है कि एक नारी अपना प्यार पाने के लिए कितना त्याग कर सकती है। अब मुझे मुम्बई में तो ऐसा किरदार मिलने से रहा जिसे केंद्र में रखकर अपनी कहानी आगे बढ़ाता अतः गाँव में ही मुझे अपने लिए लड़की देखने के साथ ही अपनी कहानी की नायिका की भी तलाश करनी थी जो आपसे मुलाकात के बाद पूरी हो गई। मुझे अपनी कथा नायिका के त्याग का वास्तविक रूप देखना था इसीलिए आपसे एक रात का साथ माँग लिया।
अनजाने में आपसे प्रेम कर बैठा था, आज से पूजा किया करूंगा।
चंदन बहुत खुशनसीब इंसान है जो आप जैसी जीवनसंगिनी उसे मिली। मैंने उनका फोन नंबर अपने लैंडलाइन से नोट कर लिया था। उनसे बात कर ली है, वे आपको एयरपोर्ट पर लेने आ जाएंगे।"
यामिनी दम साधे आकाश की बात सुनती रही। फिर उठते हुए हाथ जोड़कर भरे गले से बोली-
"आकाश जी, माफी तो मुझे आपसे मांगनी चाहिए। मैंने मन ही मन आपको न जाने कितने अपशब्द सुनाए। आपका मन आपके नाम के अनुरूप विशाल और सुंदर है। मेरा कोई भाई नहीं है, आज से मैं आपको बड़े भाई का दर्जा दे रही हूं, आप मेरे लिए अब पूजनीय हैं।"
कहते हुए यामिनी ने आकाश के पैर छू लिए।
।। समाप्त।।
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
mitro, ummeed karatee hoon aapako yah kahaanee awashy pasand aaegee
ek raat kaa saath
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"aap khadee kyon hain yaaminee jee, baithie n"
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"akkee, tum idhar is sophe par aa jaao yaamee kaa phon aane waalaa hai, wo iseelie subah subah yahaan aaee hai"
"oh! phir to main andar hee chalaa jaataa hoon" phir maan ko aawaaz lagaakar bolaa
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"bas karo mahaashay, bahut gunagaan ho chukaa binaa mujhe awasar die ek taraphaa bole hee jaa rahe ho, yaaminee ab tumhaaree pahunch ke baahar hai us samay to tumhen meree baat sunanaa bhee gawaaraa naheen thaa to use main kis adhikaar se roke rakhatee usakee sagaaee pichale saal hee ho chukee hai aur usakaa mangetar chandan dubaee men naukaree kar rahaa hai kuch hee dinon men wo aane waalaa hai aur ab shaadee karake use apane saath le jaaegaa"
"oh! lekin nandee, tum zabaanee hee to usakaa gunagaan karatee rahatee thee n, mainne agar ek baar bhee usakee jhalak dekh lee hotee to kasam se kabhee doosaree ladakee kee taraph dekhataa bhee naheen"
"par ab isake sapane dekhanaa chod do akkee main apane saath 11 ween tak pढ़ chukee 6 men se 5 ke sanpark men abhee bhee hoon sabakaa chitr aur baayodaataa bhee upalabdh hai tumhen unamen se koee pasand aae to theek, waranaa yaa to kisee mumbaiyaa ladakee yaa phir isee gaanv kee kamapढ़ ladakee ke saath hee phere lene padenge"
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"le leke haar phoolon ke, aaee to thee bahaar
nasaren uthaake hamane hee dekhaa n ek baar aankhon se ab ye parade hataae to kyaa kiyaa
sab kuch lutaake hosh men aae to kyaa kiyaa"
nandaa ne chitr aur baayodaataa pepar wahaan rakhe aur aakaash ko jaldee se naashtaa karane ko bolakar baithak kaa darawaajaa khulaa dekhakar us taraph chalee gaee
magar yah kyaa! yaaminee ke chehare kaa rang udaa huaa thaa aur aankhon se aansoo bah rahe the wo bachchon jaise subak subakakar
ro rahee thee
"are, kyaa huaa? tum ro kyon rahee ho yaamee, sab kushal to hai n, chup ho jaao pleez aur mujhe bataao kyaa baat ho gaee jo is tarah "
"nandee, chandan ab teen saal baad aane kee baat kar rahe hain unakaa kahanaa hai ki is naukaree men tanakhaa itanee kam hai ki wiwaah ke baad pariwaar basaanaa sambhaw naheen we log tanakhaa bढ़aane ko taiyaar naheen the to doosaree kanpanee men jvaain kar liyaa hai
wahaan tanakhaa achchee hai lekin 3 saal se pahale yahaan aa naheen sakenge kah rahe ki meraa koee aisaa mitr bhee is gaanv men naheen, jise paasaport banawaakar tumhen dubaee bhejane kee jawaabadaaree detaa ham sab ek saath dubaee aa gae hain
nandee, unake pitaajee ne mere pitaajee ko pichale shukrawaar yah sab bataakar kah diyaa ki we ab unake bete kaa raastaa n dekhakar yaaminee kaa wiwaah kaheen aur kar den pitaajee ne yah sunakar mere oopar dabaaw banaanaa shuroo kar diyaa hai ki main use bhool jaaoon magar tumheen bataao sakhee, kyaa yah sanbhaw hai? main unake angoothee pahanaate hue haath ke dabaaw se utpann siharan, unakee tan man ko romaanchit karatee huee muskaan, antar ghat men samaatee huee gaharee premil nigaahen kaise bhool sakatee hoon
main to jeewan bhar unakaa intajaar kar sakatee hoon lekin mere maan pitaa bilkul taiyaar naheen, meree shaadee kee taiyaariyaan badee mushkil se pooree huee hain aur ab geetoo neetoo ke bhee rishte aane lage hain to mujhe itanaa samay ghar naheen bithaa sakate
main ek baar svayan unase baat karanaa chaahatee thee sasuraal waale har shukrawaar mujhe bhee bulaakar unase baat karawaate hain magar sabake saamane man kee baat kar naheen sakatee, magar unhonne bhee yahee kahaa ab tumheen bataao sakhee, main kyaa karoon jise ek baar apanaa maan liyaa, usake siwaa kisee aur se shaadee karake ek zindaa laash kee tarah main zindagee basar naheen kar sakoongee"
yaaminee kee baat sunakar nandaa bhee soch men pad gaee achaanak usake man men bijalee see kaundhee aur wo chutakee bajaate hue yaaminee se bolee-
"ruko yaamee, tum zaraa andar baitho, men abhee aaee " aur wo teer kee tarah andar aakaash ke kamare men pahunch gaee
aakaash naashtaa samaapt karake baithaa hee thaa ki nandaa usake saamane aakar baith gaee aur yaaminee se huee pooree baatacheet aur usakee samasyaa bataakar poochaa-
"akkee, main yah jaanatee hoon ki tumhaaree chuttiyaan seemit hainmagar yaaminee kee samasyaa aham hai men chaahatee hoon ki tum usakee dubaee pahunchane men sahaayataa karo"
aakaash kuch der sochataa rahaa usake man men kshanamaatr ko yah wichaar bhee aayaa ki wo agar apane maataa pitaa kee baat maanakar usase shaadee kar le to shaayad wo usakaa dil jeetane men saphal bhee ho jaae magar yah usake prati saraasar anyaay hogaa use nihsvaarth rahakar yaaminee kee sahaayataa karanee chaahie
usane bahan se kahaa-
"nandee, agar use aapatti n ho to main usase roobaroo wistriit baat karanaa chaahataa hoon"
"yah koee badee baat naheen akkee, chalo main tum donon kaa parichay karawaa detee hoon"
un donon ko baithak men ek saath dekhakar yaaminee ne ummeed bharee najaron se unhen nihaaraa
nandaa ne use aakaash se milawaate hue kahaa-
"yaamee, maan aur baaboojee khet par jaa chuke hain aur ab mujhe din kaa khaanaa banaakar wahaan pahunchaanaa hai agar tumhen mere bhaaee se man kee baat saajhaa karane men koee aitaraaj n ho to bhaiyaa shaayad tumhaaree sahaayataa kar sakenge"
yaaminee ko bhalaa isamen kyaa aapatti ho sakatee thee, use to man kee muraad hee mil gaee thee turant bolee-
"isamen aapatti kee to koee baat hee naheen"
nandaa unhen chodakar rasoee men chalee gaee to aakaash ne yaaminee kaa man tatolate hue charchaa aarambh kee
"yaaminee jee, nand mujhe aapakee samasyaa bataa dee hai, aapake driiढ़ nishchay se main bahut prabhaawit huaa hoon nandaa ne aapako mere yahaan aane kaa uddeshy to bataayaa hee hogaa magar aapakee sahaayataa ke lie apanee bahan kee baat ko praathamikataa denaa apanaa pharj samajhataa hoon magar aapas men behichak baat karane ke lie
aapako pahale meree mitrataa sveekaar karanee hogee"
kahate hue aakaash ne apanaa haath aage bढ़aa diyaa, magar yaaminee ne haath milaane ke bajaay muskuraakar haath jodate hue jawaab diyaa-
"aap jaisaa susanskriit mitr milanaa meraa saubhaagy hai aakaash jee "
aakaash turant apanaa haath waapas kheenchate hue bolaa-
"yaaminee jee, aapane dubaee jaane kaa man banaa hee liyaa hai to main aapakee sahaayataa awashy karoongaa
ab ham mitr ban chuke hain to main apane man kee baat bhee binaa laag lapet ke aapase saajhaa karoongaa"
"jee" yaaminee ne sankshipt jawaab diyaa
"meree chuttiyaan kewal 15 din kee hain, main apanaa saaraa kaaryakram sthagit karake aapake lie itane kam samay men dubaee yaatraa ke lie saaree aupachaarikataaen poorn karane se lekar aapako eyaraport tak pahunchaane kee jawaabadaaree apane oopar le rahaa hoon
magar kabhee kabhee dostee bhee tyaag ke ewaj men kuch pratidaan maangatee hai aur meraa tyaag bhee aapase kuch pratidaan chaahataa hai" aakaash ne rasoee kee taraph dekhate hue kuch dheemee aawaaz men kahaa
aakaash kee badale hue lahaje men baat sunakar pahale to yaaminee ekabaaragee kaanp gaee ki n jaane wo kyaa kahanaa chaahataa hai phir nandaa kee upasthiti se use aashvasti huee aur usane driiढ़ shabdon men kahaa-
"main kuch samajhee naheen aakaash jee, kriipayaa spasht shabdon men apanee baat kahiye"
"dekhie, pahale to waadaa keejiye ki meree baat pooree hone tak aap kuch naheen bolengee"
"chalie maan liyaa ab bataaie aap badale men mujhase kyaa chaahate hain"
"tikat kanpharm hone ke baad , eyaraport chodane se pahale aapakaa sirph ek raat kaa saath"
aakaash ke ye shabd sunate hee yaaminee ko lagaa jaise aakaash ne use bharee sabhaa men nirvastr kar diyaa ho, tadapakar jawaab dene ko munh kholane ko huee to aakaash ne apane hothon par ungalee rakhakar rasoee kee taraph ishaaraa karake chup rahane kaa sanket kiyaa aur bolaa-
"kriipayaa aap pooree baat sun leejie, aapane waadaa kiyaa haimeree taraph se koee zabaradastee naheen hai, agar aap chandan tak pahunchane ke lie itanaa tyaag kar sakatee hain to meree baat par aaraam se wichaar karake jawaab deejie main das minit baad waapas aataa hoon"
aakaash ke baahar jaate hee yaaminee ne use awishvasaneey nazaron se taakate hue nidhaal hokar apanee peeth sophe se lagaa lee usake jehan men athaah peedaa kaa srot umad padaa thaa wo aankhen moondakar gaharee soch men doob gaee
"to yahee inakee chaaritrik wisheshataa aur sanskaar hain yah shaaleen wyawahaar aur sadaashayataa kewal dikhaawaa hai nandaa kyaa apane bhaaee ke isee charitr kee stuti karane naheen thakatee thee?
shaayad sabhee purush aise hee hote honge unake lie aurat kewal bhog kee wastu hai magar naheen, usakaa chandan aisaa bilkul naheen magar ab wo kare to kyaa kare apanaa dard kisee se baant bhee naheen sakatee, agar inakaar karatee hai to maan baaboojee ke dabaaw ke chalate chandan ko hameshaa ke lie kho degee uchit yahee hogaa ki wo paristhiti ko sveekaar karake aakaash kee shart maan le phir ise ek durghatanaa samajhakar bhool jaae chandan naheen milaa to yahee tan sadaa ke lie kisee anachaahe purush ko saunpanaa hee hogaa
tan to maatee kaa hai, mitanaa hee hai, magar man se chandan kee khushaboo koee naheen mitaa sakataa"
tabhee man ke kisee kone se aawaaz aaee-
"yaaminee, kyaa tumhaare yah nirnay chandan ke saath dhokhaa naheen"
"naheen, bilkul naheen dhokhaa to tab hotaa jab yah kriity jaanaboojhakar kiyaa jaataa yah to apanaa prem paane ke lie ek majaboor naaree kaa balidaan hee kahaa jaaegaa"
usane nirnay kar liyaa aur aakaash ke waapas aane par nazaren jhukaakar maree huee aawaaz men kahaa-
"mujhe aapakee shart sveekaar hai"
phir yaaminee uthakar ghar jaane ke lie nandaa se anumati lene ke liye rasoee kee or bढ़ gaee to aakaash bhee wahaan pahunch gayaa aur bolaa-
"yaaminee jee, ab aap bhojan karake hee ghar jaaiyegaa, main shaam ko hee nandaa ke saath aapake ghar aakar aapake maataa pitaa ko saaree baat samajhaakar sanbhaawit kharch kaa byauraa bataa doongaa"
yaaminee ne der hone kee baat kahakar bhojan ke lie kshamaa maang lee aur aakaash kee ghinaunee shart par use man hee man dusht, paapee, charitraheen aadi wibhooshanon se nawaajatee huee apane ghar aa gaee
yaaminee kee zid aur driiढ़ nishchay dekhakar usake pitaa ko yaaminee ko dubaee jaane kee anumati de dee aur yaaminee kee hee shaadee ke lie banawaae hue gahane girawee rakhakar aakaash dvaaraa bataaee huee rakam jutaa lee
men
aakaash ne yaaminee ko nandaa ke saath le jaakar ek mobaail khareed diyaa aur baakee rakam baink men khaataa khulawaakar
jamaa karawaa dee shesh saaree aupachaarikataaen pooree karane men chaar din beet gae tatkaal men hawaaee tikat kanpharm hone ke baad aakaash ke paas ab kewal ek saptaah baakee thaa ab choonki kuch aupachaarikataaen mumbaee dootaawaas par jaakar pooree honee theen atah usane mumbaee ke lie hawaaee yaatraa se ek din pahale ke tikat karawaakar yaaminee ko taiyaar rahane ke lie kah diyaa
ek din unhen mumbaee men hee rukanaa thaa
nirdhaarit tithi par yaaminee apane maataa pitaa , bahanon aur sasuraal waalon se widaa lekar aakaash ke saath saphar par chal dee
is saaree prakriyaa ke dauraan aakaash ne usake saath kabhee kisee prakaar kaa abhadr wyawahaar naheen kiyaa, n hee usase kabhee akele men milane kaa prayaas kiyaa
aakaash ke wyawahaar aur usakee ghinaunee shart men asamaanataa se stabdh yaaminee mumbaee pahunchane tak wichaaron ke jvaar bhaate men doobatee utaraatee hee rahee
we subah 12 baje tak mumbaee sentral pahunch gae rukane ke lie aakaash ne eyaraport ke paas padane waale hotal men ek room buk karawaa liyaa thaa
wahaan pahunchakar saamaan wyawasthit karake phresh hokar bhojan karake we dootaawaas ke lie nikal gae
yaaminee ne hotal men ek baat not kee ki
unakaa kamaraa do singal bed waalaa thaa
n jaane ab yah kayaamat kee raat kis roop men aane waalee hai, isee soch men wo jaise taise chandan ko yaad karatee huee samay kaatatee rahee
kaam ho jaane ke baad hotal pahunchate pahunchate doobate sooraj ke saath saath yaaminee kaa dil bhee doobane lagaa thaa thakaawat to aakaash ke chehare par bhee saaph jhalak rahee thee magar yaaminee kee upasthiti ke kaaran shaanti se samay kaatane ke lie usane yaaminee ko aaraam karane ke lie kahakar apane baig se ek kॉpee pen nikaalee aur palang ke saath lage hue sophe par baithakar kuch likhane lagaa
yaaminee ne bhee apane baig se ek kitaab nikaalee aur yon hee pढ़ne kaa upakram karatee huee aane waale toophaan kaa saamanaa karane kee himmat jutaane lagee
aakaash ne bhojan kaa ऑrdar de diyaa thaa kuch der baad hee bairaa bhojan lekar aa gayaa
aakaash ne sophe ke saath rakhee huee tee tebal par bhojan parosakar yaaminee ko
aane kaa ishaaraa kiyaa magar yaaminee par aane waale pal kaa dar is kadar haawee ho chukaa thaa ki usakee bhookh hee mar gaee thee
usane tootee huee aawaaz men kahaa-
"aakaash jee, mujhe bhookh naheen hai, aap bhojan kar leejie"
"aisaa kaise ho sakataa hai yaaminee jee, aapane din men bhee theek se kuch naheen khaayaa"
magar yaaminee palang se naheen hilee aakhir aakaash uthakar usake nikat aayaa aur bolaa-
"yaaminee jee, main aapakee manodashaa bhalee bhaanti samajh sakataa hoon, magar aap jo soch rahee hain, wo kuch naheen hone waalaa, main itanaa giraa huaa insaan naheen hoon mere lie har naaree sammaananeey hai apane svaarth ke lie aapake man ko chot pahunchaane ke aparaadh ke lie aapase haath jodakar kshamaa maangataa hoon praayashchit to aapakee sahaayataa ke saath hee pooraa ho gayaa hai chalie bhojan karake aap aaraam se so jaaiyegaa
baat daraasal yah hai ki main ek yathaarthawaadee kahaanee lekhak bhee hoon haal men stree ke charitr par kahaanee likh rahaa hoon wishay yahee hai ki ek naaree apanaa pyaar paane ke lie kitanaa tyaag kar sakatee hai ab mujhe mumbaee men to aisaa kiradaar milane se rahaa jise kendr men rakhakar apanee kahaanee aage bढ़aataa atah gaanv men hee mujhe apane lie ladakee dekhane ke saath hee apanee kahaanee kee naayikaa kee bhee talaash karanee thee jo aapase mulaakaat ke baad pooree ho gaee mujhe apanee kathaa naayikaa ke tyaag kaa waastawik roop dekhanaa thaa iseelie aapase ek raat kaa saath maang liyaa
anajaane men aapase prem kar baithaa thaa, aaj se poojaa kiyaa karoongaa
chandan bahut khushanaseeb insaan hai jo aap jaisee jeewanasanginee use milee mainne unakaa phon nanbar apane laindalaain se not kar liyaa thaa unase baat kar lee hai, we aapako eyaraport par lene aa jaaenge"
yaaminee dam saadhe aakaash kee baat sunatee rahee phir uthate hue haath jod़kar bhare gale se bolee-
"aakaash jee, maaphee to mujhe aapase maanganee chaahie mainne man hee man aapako n jaane kitane apashabd sunaae aapakaa man aapake naam ke anuroop wishaal aur sundar hai meraa koee bhaaee naheen hai, aaj se main aapako bad़e bhaaee kaa darjaa de rahee hoon, aap mere lie ab poojaneey hain"
kahate hue yaaminee ne aakaash ke pair choo lie
samaapt
kalpanaa raamaanee
nawee munbaee
मित्रो, उम्मीद करती हूं आपको यह कहानी अवश्य पसंद आएगी
एक रात का साथ
यामिनी लंबे लंबे डग भरती हांफती हुई झाड़ झंखाड़ फलांगती दो किलोमीटर का पक्का रास्ता छोड़कर कच्ची पगडंडी से 10 मिनिट में नंदा के घर पहुंच गई।
आज शुक्रवार था और उसके मंगेतर चंदन का दुबई से फोन आने वाला था।
निश्चित समय पर पहुंचना ही था, वरना एक बार फोन कट जाने के बाद उसे अगले शुक्रवार तक इंतजार करना पड़ता।
यामिनी एक गरीब किसान माता पिता की सबसे बड़ी बेटी थी। गाँव के स्कूल से 11 वीं कक्षा पिछले साल ही उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। उससे दो छोटी बचनें क्रमशः 10 वीं और नौवीं कक्षा में पढ़ाई कर रही थीं।
पिता दुर्गाप्रसाद ने उनकी प्रतिभा और पढ़ने की लगन देखकर उन्हें 11 वीं तक पढ़ाने का निर्णय लिया था ताकि उनके लिए शहर में किसी खाते पीते घर के कमाऊ लड़के आसानी से मिल सकें। तीनों बेटियाँ सुंदर तो थीं ही, घर और कृषि कार्य में भी माता पिता के सान्निध्य में निपुण हो चुकी थीं। अतः सीमित आमदनी में दहेज जुटाने की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती थी।
दुर्गाप्रसाद की सोच गलत नहीं थी, शीघ्र ही यामिनी के लिए गाँव के ही एक लड़के चंदन का रिश्ता आ गया। चंदन ने शहर से बी ए तक पढ़ाई पूरी कर ली थी और उसे दुबई में अच्छी तनखा वाले जॉब का ऑफर आ चुका था।
चंदन के पिता रतनलाल और दुर्गाप्रसाद के खेत आसपास होने से उनके बीच राम राम होती रहती थी और उसकी बेटियों से भी आते जाते जान पहचान हो चुकी थी।
यामिनी ने जैसे ही नंदा के घर के द्वार पर
दस्तक दी, सामने एक युवक को देखकर हड़बड़ाहट में दो कदम पीछे हट गई।
युवक ने उसकी मनोदशा भांपकर माँ को बुला लिया और स्वयं अंदर जाने लगा।
नंदा की मां ने उसे देखते ही मुस्कुराकर अंदर बुलाया और बोली-
"आओ यामिनी बेटी, नंदा तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। उसे मैंने पड़ोस में काम से भेजा है, वो आती ही होगी। तुम बैठो, मैं ज़रा जल्दी में हूँ, आकाश को दोस्तों से मिलने जाना है, मैं उसके लिए नाश्ता बना रही हूँ।"
यामिनी ने बैठक में नज़र घुमाई तो उस युवक को लैंड लाइन फोन के निकट वाले सोफे पर ही बैठे देखकर सोचा-
"यही नंदा का भाई आकाश होगा, नंदा ने बताया तो था कि उसका भाई मुम्बई से 15 दिन की छुट्टी में घर आ रहा है और इस बार उसका रिश्ता तय करके ही वापस भेजेंगे। 4 साल तक मामा के पास रहकर कॉलेज की पढ़ाई की है। अब उसकी नौकरी लग गई है तो उसने एक फ्लैट भी किराए पर ले लिया है।"
उधर आकाश तो यामिनी को एक नज़र देखते ही उसपर दिलोजान से मर मिटा था और उसके मन में यह सोचकर लड्डू फूट रहे थे कि हो न हो, इसे नंदा ने मुझसे मिलवाने के लिए ही बुलाया है।
यामिनी उसे देखकर संकोचवश खड़ी ही रही। उसकी निगाहें फोन और सामने लगी हुई घड़ी के कांटों पर टिकी हुई थी और आकाश को लग रहा था, वो उसी की तरफ देख रही है।
दोनों एक दूसरे की मनोदशा से बेखबर
थे।
तभी यामिनी को खड़ी देखकर आकाश को अपनी गलती का आभास हुआ उसने यामिनी को संबोधित करते हुए कहा-
"आप खड़ी क्यों हैं यामिनी जी, बैठिए न..."
तभी नंदा ने अंदर प्रवेश करते हुए कहा-
"अक्की, तुम इधर इस सोफे पर आ जाओ। यामी का फोन आने वाला है, वो इसीलिए सुबह सुबह यहाँ आई है।"
"ओह! फिर तो मैं अंदर ही चला जाता हूँ..." फिर माँ को आवाज़ लगाकर बोला
"माँ मेरा नाश्ता कमरे में ही भेज देना।"
उसके जाते ही यामिनी की जान में जान आई। वो अभी बैठी ही थी कि चंदन का फोन आ गया। यामिनी के रिसीवर उठाते ही नंदा ने कहा-
"यामी, तुम आराम से बात कर लो, मैं तब तक भैया को नाश्ता पहुँचाकर आती हूँ, फिर हम दोनों एक साथ नाश्ता करेंगी।"
और वो बैठक का दरवाजा उड़काकर चली गई।
नंदा आकाश का नाश्ता उसके कमरे में ले गई तो उसने प्लेट एक तरफ रखकर बहन को बैठने का इशारा किया और धड़कते दिल से पूछ लिया-
"नंदी, क्या यह लड़की वही यामिनी है, जिसके साथ रिश्ता जोड़ने के लिए तुम पिछले साल से मेरे पीछे पड़ी थी, अगर हाँ, तो मुझे यामिनी पसंद है। अब इसके अलावा कोई और चित्र दिखाकर मुझे भ्रमित मत करना... उसके सौंदर्य, मधुर मुस्कान, बातचीत के अंदाज़, चेहरे की मासूमियत .ने मेरा दिल जीत लिया है..और...और...अधिक प्रशंसा नहीं कर पा रहा, क्योंकि मैं कवि तो हूँ नहीं, एक यथार्थवादी कहानी लेखक के पास उपमाओं का बोध कहाँ से आए..."
"बस करो महाशय, बहुत गुणगान हो चुका। बिना मुझे अवसर दिए एक तरफा बोले ही जा रहे हो, यामिनी अब तुम्हारी पहुँच के बाहर है। उस समय तो तुम्हें मेरी बात सुनना भी गवारा नहीं था तो उसे मैं किस अधिकार से रोके रखती... उसकी सगाई पिछले साल ही हो चुकी है और उसका मंगेतर चंदन दुबई में नौकरी कर रहा है। कुछ ही दिनों में वो आने वाला है और अब शादी करके उसे अपने साथ ले जाएगा।"
"ओह! लेकिन नंदी, तुम ज़बानी ही तो उसका गुणगान करती रहती थी न, मैंने अगर एक बार भी उसकी झलक देख ली होती तो कसम से कभी दूसरी लड़की की तरफ देखता भी नहीं..."
"पर अब इसके सपने देखना छोड़ दो अक्की... मैं अपने साथ 11 वीं तक पढ़ चुकी 6 में से 5 के संपर्क में अभी भी हूँ। सबका चित्र और बायोडाटा भी उपलब्ध है। तुम्हें उनमें से कोई पसंद आए तो ठीक, वरना या तो किसी मुम्बइया लड़की या फिर इसी गाँव की कमपढ़ लड़की के साथ ही फेरे लेने पड़ेंगे।"
"अरे नंदी यार, मैंने इनकार ही कब किया जो इतना सुना रही हो। घर तो बसाना ही है, मगर दिल को जो चोट लगी है, उसके ठीक होने में समय ज़रूर लगेगा। सारे चित्र लेकर आओ, मैं आराम से उनका बायोडाटा देखकर अपनी पसंद बता दूँगा, बस खुश..."
नंदा चित्र लेने दौड़ पड़ी और आकाश मन ही मन आह भरकर देवदास की मुद्रा में किसी पुरानी फ़िल्म का गीत गुनगुनाने लगा-
"ले लेके हार फूलों के, आई तो थी बहार
नसरें उठाके हमने ही देखा न एक बार आंखों से अब ये परदे हटाए तो क्या किया...
सब कुछ लुटाके होश में आए तो क्या किया..."
नंदा ने चित्र और बायोडाटा पेपर वहाँ रखे और आकाश को जल्दी से नाश्ता करने को बोलकर बैठक का दरवाजा खुला देखकर उस तरफ चली गई।
मगर यह क्या! यामिनी के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और आंखों से आँसू बह रहे थे। वो बच्चों जैसे सुबक सुबककर
रो रही थी।
"अरे, क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो यामी, सब कुशल तो है न, चुप हो जाओ प्लीज़ और मुझे बताओ क्या बात हो गई जो इस तरह ..."
"नंदी, चंदन अब तीन साल बाद आने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस नौकरी में तनखा इतनी कम है कि विवाह के बाद परिवार बसाना सम्भव नहीं। वे लोग तनखा बढ़ाने को तैयार नहीं थे तो दूसरी कंपनी में ज्वाइन कर लिया है।
वहाँ तनखा अच्छी है लेकिन 3 साल से पहले यहाँ आ नहीं सकेंगे। कह रहे कि मेरा कोई ऐसा मित्र भी इस गाँव में नहीं, जिसे पासपोर्ट बनवाकर तुम्हें दुबई भेजने की जवाबदारी देता। हम सब एक साथ दुबई आ गए हैं।
नंदी, उनके पिताजी ने मेरे पिताजी को पिछले शुक्रवार यह सब बताकर कह दिया कि वे अब उनके बेटे का रास्ता न देखकर यामिनी का विवाह कहीं और कर दें। पिताजी ने यह सुनकर मेरे ऊपर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि मैं उसे भूल जाऊं। मगर तुम्हीं बताओ सखी, क्या यह संभव है? मैं उनके अंगूठी पहनाते हुए हाथ के दबाव से उत्पन्न सिहरन, उनकी तन मन को रोमांचित करती हुई मुस्कान, अंतर घट में समाती हुई गहरी प्रेमिल निगाहें कैसे भूल सकती हूँ।
मैं तो जीवन भर उनका इंतजार कर सकती हूँ लेकिन मेरे माँ पिता बिल्कुल तैयार नहीं, मेरी शादी की तैयारियां बड़ी मुश्किल से पूरी हुई हैं और अब गीतू नीतू के भी रिश्ते आने लगे हैं तो मुझे इतना समय घर नहीं बिठा सकते।
मैं एक बार स्वयं उनसे बात करना चाहती थी। ससुराल वाले हर शुक्रवार मुझे भी बुलाकर उनसे बात करवाते हैं। मगर सबके सामने मन की बात कर नहीं सकती, मगर उन्होंने भी यही कहा। अब तुम्हीं बताओ सखी, मैं क्या करूँ। जिसे एक बार अपना मान लिया, उसके सिवा किसी और से शादी करके एक ज़िंदा लाश की तरह मैं ज़िंदगी बसर नहीं कर सकूँगी।"
यामिनी की बात सुनकर नंदा भी सोच में पड़ गई। अचानक उसके मन में बिजली सी कौंधी और वो चुटकी बजाते हुए यामिनी से बोली-
"रुको यामी, तुम ज़रा अंदर बैठो, में अभी आई... " और वो तीर की तरह अंदर आकाश के कमरे में पहुंच गई।
आकाश नाश्ता समाप्त करके बैठा ही था कि नंदा उसके सामने आकर बैठ गई और यामिनी से हुई पूरी बातचीत और उसकी समस्या बताकर पूछा-
"अक्की, मैं यह जानती हूँ कि तुम्हारी छुट्टियाँ सीमित हैं।मगर यामिनी की समस्या अहम है। में चाहती हूँ कि तुम उसकी दुबई पहुँचने में सहायता करो।"
आकाश कुछ देर सोचता रहा। उसके मन में क्षणमात्र को यह विचार भी आया कि वो अगर अपने माता पिता की बात मानकर उससे शादी कर ले तो शायद वो उसका दिल जीतने में सफल भी हो जाए मगर यह उसके प्रति सरासर अन्याय होगा। उसे निःस्वार्थ रहकर यामिनी की सहायता करनी चाहिए।
उसने बहन से कहा-
"नंदी, अगर उसे आपत्ति न हो तो मैं उससे रूबरू विस्तृत बात करना चाहता हूँ।"
"यह कोई बड़ी बात नहीं अक्की, चलो मैं तुम दोनों का परिचय करवा देती हूँ।"
उन दोनों को बैठक में एक साथ देखकर यामिनी ने उम्मीद भरी नजरों से उन्हें निहारा।
नंदा ने उसे आकाश से मिलवाते हुए कहा-
"यामी, मां और बाबूजी खेत पर जा चुके हैं और अब मुझे दिन का खाना बनाकर वहाँ पहुंचाना है। अगर तुम्हें मेरे भाई से मन की बात साझा करने में कोई ऐतराज न हो तो भैया शायद तुम्हारी सहायता कर सकेंगे।"
यामिनी को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी, उसे तो मन की मुराद ही मिल गई थी। तुरंत बोली-
"इसमें आपत्ति की तो कोई बात ही नहीं..."
नंदा उन्हें छोड़कर रसोई में चली गई तो आकाश ने यामिनी का मन टटोलते हुए चर्चा आरम्भ की।
"यामिनी जी, नंद मुझे आपकी समस्या बता दी है, आपके दृढ़ निश्चय से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। नंदा ने आपको मेरे यहाँ आने का उद्देश्य तो बताया ही होगा मगर आपकी सहायता के लिए अपनी बहन की बात को प्राथमिकता देना अपना फर्ज समझता हूँ। मगर आपस में बेहिचक बात करने के लिए
आपको पहले मेरी मित्रता स्वीकार करनी होगी।"
कहते हुए आकाश ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया, मगर यामिनी ने हाथ मिलाने के बजाय मुस्कुराकर हाथ जोड़ते हुए जवाब दिया-
"आप जैसा सुसंस्कृत मित्र मिलना मेरा सौभाग्य है आकाश जी... "
आकाश तुरंत अपना हाथ वापस खींचते हुए बोला-
"यामिनी जी, आपने दुबई जाने का मन बना ही लिया है तो मैं आपकी सहायता अवश्य करूँगा।
अब हम मित्र बन चुके हैं तो मैं अपने मन की बात भी बिना लाग लपेट के आपसे साझा करूँगा।"
"जी..." यामिनी ने संक्षिप्त जवाब दिया
"मेरी छुट्टियां केवल 15 दिन की हैं, मैं अपना सारा कार्यक्रम स्थगित करके आपके लिए इतने कम समय में दुबई यात्रा के लिए सारी औपचारिकताएं पूर्ण करने से लेकर आपको एयरपोर्ट तक पहुंचाने की जवाबदारी अपने ऊपर ले रहा हूँ।
मगर... कभी कभी दोस्ती भी त्याग के एवज में कुछ प्रतिदान माँगती है और मेरा त्याग भी आपसे कुछ प्रतिदान चाहता है..." आकाश ने रसोई की तरफ देखते हुए कुछ धीमी आवाज़ में कहा
आकाश की बदले हुए लहजे में बात सुनकर पहले तो यामिनी एकबारगी काँप गई कि न जाने वो क्या कहना चाहता है फिर नंदा की उपस्थिति से उसे आश्वस्ति हुई और उसने दृढ़ शब्दों में कहा-
"मैं कुछ समझी नहीं आकाश जी, कृपया स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कहिये।"
"देखिए, पहले तो वादा कीजिये कि मेरी बात पूरी होने तक आप कुछ नहीं बोलेंगी।"
"चलिए मान लिया... अब बताइए आप बदले में मुझसे क्या चाहते हैं..."
"टिकट कन्फर्म होने के बाद , एयरपोर्ट छोड़ने से पहले आपका सिर्फ एक रात का साथ..."
आकाश के ये शब्द सुनते ही यामिनी को लगा जैसे आकाश ने उसे भरी सभा में निर्वस्त्र कर दिया हो, तड़पकर जवाब देने को मुँह खोलने को हुई तो आकाश ने अपने होठों पर उंगली रखकर रसोई की तरफ इशारा करके चुप रहने का संकेत किया और बोला-
"कृपया आप पूरी बात सुन लीजिए, आपने वादा किया है...मेरी तरफ से कोई ज़बरदस्ती नहीं है, अगर आप चंदन तक पहुँचने के लिए इतना त्याग कर सकती हैं तो मेरी बात पर आराम से विचार करके जवाब दीजिए। मैं दस मिनिट बाद वापस आता हूँ।"
आकाश के बाहर जाते ही यामिनी ने उसे अविश्वसनीय नज़रों से ताकते हुए निढाल होकर अपनी पीठ सोफे से लगा ली। उसके जेहन में अथाह पीड़ा का स्रोत उमड़ पड़ा था। वो आंखें मूँदकर गहरी सोच में डूब गई।
"तो यही इनकी चारित्रिक विशेषता और संस्कार हैं। यह शालीन व्यवहार और सदाशयता केवल दिखावा है। नंदा क्या अपने भाई के इसी चरित्र की स्तुति करने नहीं थकती थी?
शायद सभी पुरुष ऐसे ही होते होंगे। उनके लिए औरत केवल भोग की वस्तु है। मगर नहीं, उसका चंदन ऐसा बिल्कुल नहीं मगर अब वो करे तो क्या करे। अपना दर्द किसी से बाँट भी नहीं सकती, अगर इनकार करती है तो माँ बाबूजी के दबाव के चलते चंदन को हमेशा के लिए खो देगी। उचित यही होगा कि वो परिस्थिति को स्वीकार करके आकाश की शर्त मान ले फिर इसे एक दुर्घटना समझकर भूल जाए। चंदन नहीं मिला तो यही तन सदा के लिए किसी अनचाहे पुरुष को सौंपना ही होगा।
तन तो माटी का है, मिटना ही है, मगर मन से चंदन की खुशबू कोई नहीं मिटा सकता।"
तभी मन के किसी कोने से आवाज़ आई-
"यामिनी, क्या तुम्हारे यह निर्णय चंदन के साथ धोखा नहीं..."
"नहीं, बिल्कुल नहीं ...धोखा तो तब होता जब यह कृत्य जानबूझकर किया जाता। यह तो अपना प्रेम पाने के लिए एक मजबूर नारी का बलिदान ही कहा जाएगा।"
उसने निर्णय कर लिया और आकाश के वापस आने पर नज़रें झुकाकर मरी हुई आवाज़ में कहा-
"मुझे आपकी शर्त स्वीकार है।"
फिर यामिनी उठकर घर जाने के लिए नंदा से अनुमति लेने के लिये रसोई की ओर बढ़ गई तो आकाश भी वहाँ पहुँच गया और बोला-
"यामिनी जी, अब आप भोजन करके ही घर जाइयेगा, मैं शाम को ही नंदा के साथ आपके घर आकर आपके माता पिता को सारी बात समझाकर संभावित खर्च का ब्यौरा बता दूँगा।"
यामिनी ने देर होने की बात कहकर भोजन के लिए क्षमा मांग ली और आकाश की घिनौनी शर्त पर उसे मन ही मन दुष्ट, पापी, चरित्रहीन आदि विभूषणों से नवाजती हुई अपने घर आ गई।
यामिनी की ज़िद और दृढ़ निश्चय देखकर उसके पिता को यामिनी को दुबई जाने की अनुमति दे दी और यामिनी की ही शादी के लिए बनवाए हुए गहने गिरवी रखकर आकाश द्वारा बताई हुई रकम जुटा ली।
में
आकाश ने यामिनी को नंदा के साथ ले जाकर एक मोबाइल खरीद दिया और बाकी रकम बैंक में खाता खुलवाकर
जमा करवा दी। शेष सारी औपचारिकताएं पूरी करने में चार दिन बीत गए। तत्काल में हवाई टिकट कन्फर्म होने के बाद आकाश के पास अब केवल एक सप्ताह बाकी था। अब चूँकि कुछ औपचारिकताएं मुम्बई दूतावास पर जाकर पूरी होनी थीं अतः उसने मुम्बई के लिए हवाई यात्रा से एक दिन पहले के टिकट करवाकर यामिनी को तैयार रहने के लिए कह दिया।
एक दिन उन्हें मुम्बई में ही रुकना था।
निर्धारित तिथि पर यामिनी अपने माता पिता , बहनों और ससुराल वालों से विदा लेकर आकाश के साथ सफर पर चल दी।
इस सारी प्रक्रिया के दौरान आकाश ने उसके साथ कभी किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार नहीं किया, न ही उससे कभी अकेले में मिलने का प्रयास किया।
आकाश के व्यवहार और उसकी घिनौनी शर्त में असमानता से स्तब्ध यामिनी मुम्बई पहुँचने तक विचारों के ज्वार भाटे में डूबती उतराती ही रही।
वे सुबह 12 बजे तक मुम्बई सेंट्रल पहुँच गए। रुकने के लिए आकाश ने एयरपोर्ट के पास पड़ने वाले होटल में एक रूम बुक करवा लिया था।
वहां पहुंचकर सामान व्यवस्थित करके फ्रेश होकर भोजन करके वे दूतावास के लिए निकल गए।
यामिनी ने होटल में एक बात नोट की कि
उनका कमरा दो सिंगल बेड वाला था।
न जाने अब यह कयामत की रात किस रूप में आने वाली है, इसी सोच में वो जैसे तैसे चंदन को याद करती हुई समय काटती रही।
काम हो जाने के बाद होटल पहुंचते पहुंचते डूबते सूरज के साथ साथ यामिनी का दिल भी डूबने लगा था। थकावट तो आकाश के चेहरे पर भी साफ झलक रही थी मगर यामिनी की उपस्थिति के कारण शांति से समय काटने के लिए उसने यामिनी को आराम करने के लिए कहकर अपने बैग से एक कॉपी पेन निकाली और पलंग के साथ लगे हुए सोफे पर बैठकर कुछ लिखने लगा।
यामिनी ने भी अपने बैग से एक किताब निकाली और यों ही पढ़ने का उपक्रम करती हुई आने वाले तूफान का सामना करने की हिम्मत जुटाने लगी।
आकाश ने भोजन का ऑर्डर दे दिया था। कुछ देर बाद ही बैरा भोजन लेकर आ गया ।
आकाश ने सोफे के साथ रखी हुई टी टेबल पर भोजन परोसकर यामिनी को
आने का इशारा किया। मगर यामिनी पर आने वाले पल का डर इस कदर हावी हो चुका था कि उसकी भूख ही मर गई थी।
उसने टूटी हुई आवाज़ में कहा-
"आकाश जी, मुझे भूख नहीं है, आप भोजन कर लीजिए।"
"ऐसा कैसे हो सकता है यामिनी जी, आपने दिन में भी ठीक से कुछ नहीं खाया।"
मगर यामिनी पलंग से नहीं हिली। आखिर आकाश उठकर उसके निकट आया और बोला-
"यामिनी जी, मैं आपकी मनोदशा भली भाँति समझ सकता हूँ, मगर आप जो सोच रही हैं, वो कुछ नहीं होने वाला, मैं इतना गिरा हुआ इंसान नहीं हूँ। मेरे लिए हर नारी सम्माननीय है। अपने स्वार्थ के लिए आपके मन को चोट पहुँचाने के अपराध के लिए आपसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगता हूँ। प्रायश्चित तो आपकी सहायता के साथ ही पूरा हो गया है। चलिए भोजन करके आप आराम से सो जाइयेगा।
बात दरअसल यह है कि मैं एक यथार्थवादी कहानी लेखक भी हूँ। हाल में स्त्री के चरित्र पर कहानी लिख रहा हूँ। विषय यही है कि एक नारी अपना प्यार पाने के लिए कितना त्याग कर सकती है। अब मुझे मुम्बई में तो ऐसा किरदार मिलने से रहा जिसे केंद्र में रखकर अपनी कहानी आगे बढ़ाता अतः गाँव में ही मुझे अपने लिए लड़की देखने के साथ ही अपनी कहानी की नायिका की भी तलाश करनी थी जो आपसे मुलाकात के बाद पूरी हो गई। मुझे अपनी कथा नायिका के त्याग का वास्तविक रूप देखना था इसीलिए आपसे एक रात का साथ माँग लिया।
अनजाने में आपसे प्रेम कर बैठा था, आज से पूजा किया करूंगा।
चंदन बहुत खुशनसीब इंसान है जो आप जैसी जीवनसंगिनी उसे मिली। मैंने उनका फोन नंबर अपने लैंडलाइन से नोट कर लिया था। उनसे बात कर ली है, वे आपको एयरपोर्ट पर लेने आ जाएंगे।"
यामिनी दम साधे आकाश की बात सुनती रही। फिर उठते हुए हाथ जोड़कर भरे गले से बोली-
"आकाश जी, माफी तो मुझे आपसे मांगनी चाहिए। मैंने मन ही मन आपको न जाने कितने अपशब्द सुनाए। आपका मन आपके नाम के अनुरूप विशाल और सुंदर है। मेरा कोई भाई नहीं है, आज से मैं आपको बड़े भाई का दर्जा दे रही हूं, आप मेरे लिए अब पूजनीय हैं।"
कहते हुए यामिनी ने आकाश के पैर छू लिए।
।। समाप्त।।
कल्पना रामानी
नवी मुंबई