नसीब naseeb नसीब
छीन सकता है भला
कोई किसी का क्या नसीब?
आज तक वैसा हुआ
जैसा कि जिसका था नसीब।
माँ तो होती है सभी की
जो जगत के जीव हैं
मातृ सुख किसको मिलेगा
ये मगर लिखता नसीब।
कर दे राजा को भिखारी
और राजा रंक को
अर्श से भी फर्श पर
लाकर बिठा देता नसीब।
बिन बहाए स्वेद
पा लेता है कोई चंद्रमा
तो कभी मेहनत को भी
होता नहीं दाना नसीब।
दोष हो जाते बरी
निर्दोष बन जाते सज़ा
छटपटाते मीन बन
जिनका हुआ काला नसीब।
दीप जल सबके लिए
पाता है केवल कालिमा
पर जलाते जो उसे
पाते उजालों का नसीब।
‘कल्पना’ फिर द्वेष कैसा
दूसरों के भाग्य से
क्यों न शुभ कर्मों से लिक्खें
हम स्वयं अपना नसीब।
cheen sakataa hai bhalaa
koee kisee kaa kyaa naseeb?
aaj tak waisaa huaa
jaisaa ki jisakaa thaa naseeb
maan to hotee hai sabhee kee
jo jagat ke jeew hain
maatrii sukh kisako milegaa
ye magar likhataa naseeb
kar de raajaa ko bhikhaaree
aur raajaa rank ko
arsh se bhee pharsh par
laakar bithaa detaa naseeb
bin bahaae sved
paa letaa hai koee chandramaa
to kabhee mehanat ko bhee
hotaa naheen daanaa naseeb
dosh ho jaate baree
nirdosh ban jaate sazaa
chatapataate meen ban
jinakaa huaa kaalaa naseeb
deep jal sabake lie
paataa hai kewal kaalimaa
par jalaate jo use
paate ujaalon kaa naseeb
‘kalpanaa’ phir dvesh kaisaa
doosaron ke bhaagy se
kyon n shubh karmon se likkhen
ham svayan apanaa naseeb
छीन सकता है भला
कोई किसी का क्या नसीब?
आज तक वैसा हुआ
जैसा कि जिसका था नसीब।
माँ तो होती है सभी की
जो जगत के जीव हैं
मातृ सुख किसको मिलेगा
ये मगर लिखता नसीब।
कर दे राजा को भिखारी
और राजा रंक को
अर्श से भी फर्श पर
लाकर बिठा देता नसीब।
बिन बहाए स्वेद
पा लेता है कोई चंद्रमा
तो कभी मेहनत को भी
होता नहीं दाना नसीब।
दोष हो जाते बरी
निर्दोष बन जाते सज़ा
छटपटाते मीन बन
जिनका हुआ काला नसीब।
दीप जल सबके लिए
पाता है केवल कालिमा
पर जलाते जो उसे
पाते उजालों का नसीब।
‘कल्पना’ फिर द्वेष कैसा
दूसरों के भाग्य से
क्यों न शुभ कर्मों से लिक्खें
हम स्वयं अपना नसीब।