कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १७६ / २०४ № 176 of 204 रचना १७६ / २०४
२० नवम्बर २०१९ 20 November 2019 २० नवम्बर २०१९

नसीब naseeb नसीब

छीन सकता है भला

कोई किसी का क्या नसीब?

आज तक वैसा हुआ

जैसा कि जिसका था नसीब।

माँ तो होती है सभी की

जो जगत के जीव हैं

मातृ सुख किसको मिलेगा

ये मगर लिखता नसीब।

कर दे राजा को भिखारी

और राजा रंक को

अर्श से भी फर्श पर

लाकर बिठा देता नसीब।

बिन बहाए स्वेद

पा लेता है कोई चंद्रमा

तो कभी मेहनत को भी

होता नहीं दाना नसीब।

दोष हो जाते बरी

निर्दोष बन जाते सज़ा

छटपटाते मीन बन

जिनका हुआ काला नसीब।

दीप जल सबके लिए

पाता है केवल कालिमा

पर जलाते जो उसे

पाते उजालों का नसीब।

‘कल्पना’ फिर द्वेष कैसा

दूसरों के भाग्य से

क्यों न शुभ कर्मों से लिक्खें

हम स्वयं अपना नसीब।

cheen sakataa hai bhalaa

koee kisee kaa kyaa naseeb?

aaj tak waisaa huaa

jaisaa ki jisakaa thaa naseeb

·

maan to hotee hai sabhee kee

jo jagat ke jeew hain

maatrii sukh kisako milegaa

ye magar likhataa naseeb

·

kar de raajaa ko bhikhaaree

aur raajaa rank ko

arsh se bhee pharsh par

laakar bithaa detaa naseeb

·

bin bahaae sved

paa letaa hai koee chandramaa

to kabhee mehanat ko bhee

hotaa naheen daanaa naseeb

·

dosh ho jaate baree

nirdosh ban jaate sazaa

chatapataate meen ban

jinakaa huaa kaalaa naseeb

·

deep jal sabake lie

paataa hai kewal kaalimaa

par jalaate jo use

paate ujaalon kaa naseeb

·

‘kalpanaa’ phir dvesh kaisaa

doosaron ke bhaagy se

kyon n shubh karmon se likkhen

ham svayan apanaa naseeb

छीन सकता है भला

कोई किसी का क्या नसीब?

आज तक वैसा हुआ

जैसा कि जिसका था नसीब।

माँ तो होती है सभी की

जो जगत के जीव हैं

मातृ सुख किसको मिलेगा

ये मगर लिखता नसीब।

कर दे राजा को भिखारी

और राजा रंक को

अर्श से भी फर्श पर

लाकर बिठा देता नसीब।

बिन बहाए स्वेद

पा लेता है कोई चंद्रमा

तो कभी मेहनत को भी

होता नहीं दाना नसीब।

दोष हो जाते बरी

निर्दोष बन जाते सज़ा

छटपटाते मीन बन

जिनका हुआ काला नसीब।

दीप जल सबके लिए

पाता है केवल कालिमा

पर जलाते जो उसे

पाते उजालों का नसीब।

‘कल्पना’ फिर द्वेष कैसा

दूसरों के भाग्य से

क्यों न शुभ कर्मों से लिक्खें

हम स्वयं अपना नसीब।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗