कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १७५ / २०५ № 175 of 205 रचना १७५ / २०५
१९ नवम्बर २०१९ 19 November 2019 १९ नवम्बर २०१९

फूल कहता है phool kahataa hai फूल कहता है

डाल से मुझको न तोड़ो, फूल कहता है।

उँगलियों से यूँ न मसलो, फूल कहता है।

॥

देख मुझको क्यारियों में, बाल खुश कितने!

प्रेम से फुलवारी सींचो, फूल कहता है।

॥

बाँधकर जूड़े में हरते, प्राण क्यों मेरे?

छेदकर मत हार गूँथो, फूल कहता है।

॥

रौंदते हो पग तले, निर्दय हो क्यों इतने?

यूँ प्रदूषण मत बढ़ाओ, फूल कहता है।

॥

ईश भी नहीं चाहता, कृति नष्ट हो उसकी।

मंदिरों में दम न घोंटो, फूल कहता है।

॥

देख लो करते सुरक्षा, शूल भी मेरी।

कुछ तो हे इंसान! सोचो, फूल कहता है।

॥

नष्ट तो होना ही है, यह सच है जीवन का।

वक्त से पहले न मारो, फूल कहता है।

॥

मैं तो हूँ पर्यावरण का, एक सेवक ही।

शुद्ध साँसों को सहेजो, फूल कहता है।

॥

सूखकर गुलशन में बिखरूँ, शेष है चाहत।

बीज मेरे फिर से रोपो, फूल कहता है।

daal se mujhako n todo, phool kahataa hai

ungaliyon se yoon n masalo, phool kahataa hai

·

dekh mujhako kyaariyon men, baal khush kitane!

prem se phulawaaree seencho, phool kahataa hai

·

baandhakar joode men harate, praan kyon mere?

chedakar mat haar goontho, phool kahataa hai

·

raundate ho pag tale, nirday ho kyon itane?

yoon pradooshan mat bढ़aao, phool kahataa hai

·

eesh bhee naheen chaahataa, kriiti nasht ho usakee

mandiron men dam n ghonto, phool kahataa hai

·

dekh lo karate surakshaa, shool bhee meree

kuch to he insaan! socho, phool kahataa hai

·

nasht to honaa hee hai, yah sach hai jeewan kaa

wakt se pahale n maaro, phool kahataa hai

·

main to hoon paryaawaran kaa, ek sewak hee

shuddh saanson ko sahejo, phool kahataa hai

·

sookhakar gulashan men bikharoon, shesh hai chaahat

beej mere phir se ropo, phool kahataa hai

डाल से मुझको न तोड़ो, फूल कहता है।

उँगलियों से यूँ न मसलो, फूल कहता है।

॥

देख मुझको क्यारियों में, बाल खुश कितने!

प्रेम से फुलवारी सींचो, फूल कहता है।

॥

बाँधकर जूड़े में हरते, प्राण क्यों मेरे?

छेदकर मत हार गूँथो, फूल कहता है।

॥

रौंदते हो पग तले, निर्दय हो क्यों इतने?

यूँ प्रदूषण मत बढ़ाओ, फूल कहता है।

॥

ईश भी नहीं चाहता, कृति नष्ट हो उसकी।

मंदिरों में दम न घोंटो, फूल कहता है।

॥

देख लो करते सुरक्षा, शूल भी मेरी।

कुछ तो हे इंसान! सोचो, फूल कहता है।

॥

नष्ट तो होना ही है, यह सच है जीवन का।

वक्त से पहले न मारो, फूल कहता है।

॥

मैं तो हूँ पर्यावरण का, एक सेवक ही।

शुद्ध साँसों को सहेजो, फूल कहता है।

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सूखकर गुलशन में बिखरूँ, शेष है चाहत।

बीज मेरे फिर से रोपो, फूल कहता है।

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗