कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ११४ / ११४ № 114 of 114 रचना ११४ / ११४
२८ अप्रैल २०२१ 28 April 2021 २८ अप्रैल २०२१

हरे भरे रिश्ते hare bhare rishte हरे भरे रिश्ते

अरे शालू दीदी, आप! विनी की शादी के बाद तो शक्ल ही नहीं दिखाई, माँ आपको बहुत याद करती है” खुशी से भरकर जब अमन ने शालिनी का स्वागत किया तो उसकी आँखें भीगे बिना न रह सकीं।

“शिक्षण कार्य में ही समय कट जाता है अमन, दो दिन विद्यालय की छुट्टी थी और मेले के अंतिम दिन भी, तो सोचा इस बार तुम लोगों के साथ ही मेला घूम लूँगी, सबसे मिलना भी हो जाएगा”। हँसते हुई शालिनी बोली।

शालिनी तलाक़शुदा थी और २० वर्षों से उसी शहर में शिक्षण कार्य करके बेटी की परवरिश में अपना जीवन खपा दिया था। मायके कम ही आती थी, क्योंकि उसका मानना था कि एक ही शहर में होने से मायके से जितनी दूरी बनाकर रखी जाए, उतना ही वहाँ सम्मान बना रहता है।

“बहुत अच्छा किया दीदी, आप माँ से बातें कीजिये, हमें थोड़ा बाजार का काम है, फिर आकर कल का कार्यक्रम बनाते हैं” कहते हुए वो तैयार खड़ी अपनी पत्नी और बिटिया को साथ लेकर बाहर निकल गया।

शालिनी काफी देर तक माँ से बातें करती रही फिर कुछ देर टहलने के लिए कहकर बाहर निकली तो सामने ही उसका अपनी पुरानी दो सहेलियों से सामना हो गया। कुछ देर वे उत्साह से एक दूसरे का हालचाल पूछती रहीं फिर उन्होंने बताया कि वे मेला घूमने जा रही हैं और शालिनी को भी साथ चलने के लिए कहा। मेला परिसर घर के पास में ही था, शालिनी ने कल के कार्यक्रम का ज़िक्र करते हुए कहा कि- “मैं केवल झूला खाकर वापस आ जाऊँगी।”

तीनों ने सिकी हुई मूँगफली खरीदी और झूले के लिए टिकट की लाइन में लग गईं। झूले की गति कम हो गई थी और पुराने लोग उतर रहे थे तथा नए बैठते जा रहे थे। तभी सहसा शालिनी की नज़र झूले से उतरते हुए भैया-भाभी और गुड़िया पर पड़ी। देखकर उसका दिमाग सुन्न हो गया, मूँगफली का पैकेट हाथ से छूट गया और वो आगे खड़ी अपनी सहेलियों से पेट दर्द का बहाना बनाकर

सीधी घर पहुँच गई। माँ से मेले की घटना का ज़िक्र करके बोली-

“माँ, मैं तो रिश्तों को सींचने चली आई थी, नहीं जानती थी कि यह बाग अब इस तरह मेरा बंजर हो चुका है। अब कल तक मेरा रुकना व्यर्थ है।” उसने अपना बैग उठाया और पैर पटकती हुई तेज़ी से बाहर निकल गई।

अभी टैक्सी आधी दूर ही पहुँची, कि मोबाइल बज उठा। लेकिन भाभी का नंबर देखकर उसने फोन काट दिया। अगले ही क्षण मैसेज आ गया- “शालू दीदी! हमें माँ ने सब बता दिया है, आप अपने भैया को क्या इतना ही जानती हैं? हम तो वापस ही आ रह थे, देरी हो जाने से खाना भी बाहर से पैक करवा लिया था, लेकिन घर के पास ही गुड़िया ने झूला खाने की ज़िद पकड़ ली। कवरेज एरिया होने से फोन पर संपर्क भी नहीं हो पाया। अब अगर आप तत्काल वापस नहीं आईं तो यहाँ कोई भी न तो भोजन करेगा और न ही कल हम मेला घूमने जाएँगे”।

ओह यह तो मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई...सोचते हुए शालिनी की आँखें खुशी से नम हो गईं, उसे रिश्तों का बाग पुनः लहलहाता हुआ दिखने लगा। उसने ड्राइवर से टैक्सी पलटाकर वापस उसी जगह ले चलने के लिए कहा। ड्राइवर ने क्षण भर उसे अचरज से घूरा और टैक्सी मोड़ दी।

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

are shaaloo deedee, aap! winee kee shaadee ke baad to shakl hee naheen dikhaaee, maan aapako bahut yaad karatee hai” khushee se bharakar jab aman ne shaalinee kaa svaagat kiyaa to usakee aankhen bheege binaa n rah sakeen

“shikshan kaary men hee samay kat jaataa hai aman, do din widyaalay kee chuttee thee aur mele ke antim din bhee, to sochaa is baar tum logon ke saath hee melaa ghoom loongee, sabase milanaa bhee ho jaaegaa” hansate huee shaalinee bolee

shaalinee talaaqashudaa thee aur 20 warshon se usee shahar men shikshan kaary karake betee kee parawarish men apanaa jeewan khapaa diyaa thaa maayake kam hee aatee thee, kyonki usakaa maananaa thaa ki ek hee shahar men hone se maayake se jitanee dooree banaakar rakhee jaae, utanaa hee wahaan sammaan banaa rahataa hai

“bahut achchaa kiyaa deedee, aap maan se baaten keejiye, hamen thodaa baajaar kaa kaam hai, phir aakar kal kaa kaaryakram banaate hain” kahate hue wo taiyaar khadee apanee patnee aur bitiyaa ko saath lekar baahar nikal gayaa

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seedhee ghar pahunch gaee maan se mele kee ghatanaa kaa zikr karake bolee-

“maan, main to rishton ko seenchane chalee aaee thee, naheen jaanatee thee ki yah baag ab is tarah meraa banjar ho chukaa hai ab kal tak meraa rukanaa wyarth hai” usane apanaa baig uthaayaa aur pair patakatee huee tezee se baahar nikal gaee

abhee taiksee aadhee door hee pahunchee, ki mobaail baj uthaa lekin bhaabhee kaa nanbar dekhakar usane phon kaat diyaa agale hee kshan maisej aa gayaa- “shaaloo deedee! hamen maan ne sab bataa diyaa hai, aap apane bhaiyaa ko kyaa itanaa hee jaanatee hain? ham to waapas hee aa rah the, deree ho jaane se khaanaa bhee baahar se paik karawaa liyaa thaa, lekin ghar ke paas hee gudiyaa ne jhoolaa khaane kee zid pakad lee kawarej eriyaa hone se phon par sanpark bhee naheen ho paayaa ab agar aap tatkaal waapas naheen aaeen to yahaan koee bhee n to bhojan karegaa aur n hee kal ham melaa ghoomane jaaenge”

oh yah to mujhase bahut badee galatee ho gaeeshochate hue shaalinee kee aankhen khushee se nam ho gaeen, use rishton kaa baag punah lahalahaataa huaa dikhane lagaa usane draaiwar se taiksee palataakar waapas usee jagah le chalane ke lie kahaa draaiwar ne kshan bhar use acharaj se ghooraa aur taiksee mod dee

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-kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

अरे शालू दीदी, आप! विनी की शादी के बाद तो शक्ल ही नहीं दिखाई, माँ आपको बहुत याद करती है” खुशी से भरकर जब अमन ने शालिनी का स्वागत किया तो उसकी आँखें भीगे बिना न रह सकीं।

“शिक्षण कार्य में ही समय कट जाता है अमन, दो दिन विद्यालय की छुट्टी थी और मेले के अंतिम दिन भी, तो सोचा इस बार तुम लोगों के साथ ही मेला घूम लूँगी, सबसे मिलना भी हो जाएगा”। हँसते हुई शालिनी बोली।

शालिनी तलाक़शुदा थी और २० वर्षों से उसी शहर में शिक्षण कार्य करके बेटी की परवरिश में अपना जीवन खपा दिया था। मायके कम ही आती थी, क्योंकि उसका मानना था कि एक ही शहर में होने से मायके से जितनी दूरी बनाकर रखी जाए, उतना ही वहाँ सम्मान बना रहता है।

“बहुत अच्छा किया दीदी, आप माँ से बातें कीजिये, हमें थोड़ा बाजार का काम है, फिर आकर कल का कार्यक्रम बनाते हैं” कहते हुए वो तैयार खड़ी अपनी पत्नी और बिटिया को साथ लेकर बाहर निकल गया।

शालिनी काफी देर तक माँ से बातें करती रही फिर कुछ देर टहलने के लिए कहकर बाहर निकली तो सामने ही उसका अपनी पुरानी दो सहेलियों से सामना हो गया। कुछ देर वे उत्साह से एक दूसरे का हालचाल पूछती रहीं फिर उन्होंने बताया कि वे मेला घूमने जा रही हैं और शालिनी को भी साथ चलने के लिए कहा। मेला परिसर घर के पास में ही था, शालिनी ने कल के कार्यक्रम का ज़िक्र करते हुए कहा कि- “मैं केवल झूला खाकर वापस आ जाऊँगी।”

तीनों ने सिकी हुई मूँगफली खरीदी और झूले के लिए टिकट की लाइन में लग गईं। झूले की गति कम हो गई थी और पुराने लोग उतर रहे थे तथा नए बैठते जा रहे थे। तभी सहसा शालिनी की नज़र झूले से उतरते हुए भैया-भाभी और गुड़िया पर पड़ी। देखकर उसका दिमाग सुन्न हो गया, मूँगफली का पैकेट हाथ से छूट गया और वो आगे खड़ी अपनी सहेलियों से पेट दर्द का बहाना बनाकर

सीधी घर पहुँच गई। माँ से मेले की घटना का ज़िक्र करके बोली-

“माँ, मैं तो रिश्तों को सींचने चली आई थी, नहीं जानती थी कि यह बाग अब इस तरह मेरा बंजर हो चुका है। अब कल तक मेरा रुकना व्यर्थ है।” उसने अपना बैग उठाया और पैर पटकती हुई तेज़ी से बाहर निकल गई।

अभी टैक्सी आधी दूर ही पहुँची, कि मोबाइल बज उठा। लेकिन भाभी का नंबर देखकर उसने फोन काट दिया। अगले ही क्षण मैसेज आ गया- “शालू दीदी! हमें माँ ने सब बता दिया है, आप अपने भैया को क्या इतना ही जानती हैं? हम तो वापस ही आ रह थे, देरी हो जाने से खाना भी बाहर से पैक करवा लिया था, लेकिन घर के पास ही गुड़िया ने झूला खाने की ज़िद पकड़ ली। कवरेज एरिया होने से फोन पर संपर्क भी नहीं हो पाया। अब अगर आप तत्काल वापस नहीं आईं तो यहाँ कोई भी न तो भोजन करेगा और न ही कल हम मेला घूमने जाएँगे”।

ओह यह तो मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई...सोचते हुए शालिनी की आँखें खुशी से नम हो गईं, उसे रिश्तों का बाग पुनः लहलहाता हुआ दिखने लगा। उसने ड्राइवर से टैक्सी पलटाकर वापस उसी जगह ले चलने के लिए कहा। ड्राइवर ने क्षण भर उसे अचरज से घूरा और टैक्सी मोड़ दी।

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗