कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २०२ / २०४ № 202 of 204 रचना २०२ / २०४
५ मई २०२१ 5 May 2021 ५ मई २०२१

पसीने से जब जब paseene se jab jab पसीने से जब जब

पसीने से जब-जब नहाती है गर्मी

हवाओं से हमको मिलाती है गर्मी

उगे-भोर, चिड़िया बनी चहचहाती

चमन की तरफ लेके जाती है गर्मी

पकड़ हाथ चलती है फुलवारियों में

झकोरों से झूला झुलाती है गर्मी

छतों पर सितारों की छाया में शब भर

सरस रागिनी गा सुलाती है गर्मी

विजन वन में पेड़ों की बन छाँव सुखकर

महक के गलीचे बिछाती है गर्मी

अगम झील में, ताल में, नाव खेकर

धवल धार-जल में घुमाती है गर्मी

पहाड़ों पे, फूलों-भरी वादियों में

हमें देके न्यौता बुलाती है गर्मी

पिला जूस, लस्सी या नींबू शिकंजी

तपन की चुभन से बचाती है गर्मी

डरें ‘कल्पना’ क्यों भला गर्मियों से

कि राहत भी लेकर ही आती है गर्मी

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

paseene se jab-jab nahaatee hai garmee

hawaaon se hamako milaatee hai garmee

·

uge-bhor, chidiyaa banee chahachahaatee

chaman kee taraph leke jaatee hai garmee

·

pakad haath chalatee hai phulawaariyon men

jhakoron se jhoolaa jhulaatee hai garmee

·

chaton par sitaaron kee chaayaa men shab bhar

saras raaginee gaa sulaatee hai garmee

·

wijan wan men pedon kee ban chaanv sukhakar

mahak ke galeeche bichaatee hai garmee

·

agam jheel men, taal men, naaw khekar

dhawal dhaar-jal men ghumaatee hai garmee

·

pahaadon pe, phoolon-bharee waadiyon men

hamen deke nyautaa bulaatee hai garmee

·

pilaa joos, lassee yaa neenboo shikanjee

tapan kee chubhan se bachaatee hai garmee

·

daren ‘kalpanaa’ kyon bhalaa garmiyon se

ki raahat bhee lekar hee aatee hai garmee

·

-kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

पसीने से जब-जब नहाती है गर्मी

हवाओं से हमको मिलाती है गर्मी

उगे-भोर, चिड़िया बनी चहचहाती

चमन की तरफ लेके जाती है गर्मी

पकड़ हाथ चलती है फुलवारियों में

झकोरों से झूला झुलाती है गर्मी

छतों पर सितारों की छाया में शब भर

सरस रागिनी गा सुलाती है गर्मी

विजन वन में पेड़ों की बन छाँव सुखकर

महक के गलीचे बिछाती है गर्मी

अगम झील में, ताल में, नाव खेकर

धवल धार-जल में घुमाती है गर्मी

पहाड़ों पे, फूलों-भरी वादियों में

हमें देके न्यौता बुलाती है गर्मी

पिला जूस, लस्सी या नींबू शिकंजी

तपन की चुभन से बचाती है गर्मी

डरें ‘कल्पना’ क्यों भला गर्मियों से

कि राहत भी लेकर ही आती है गर्मी

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗