कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २०३ / २०५ № 203 of 205 रचना २०३ / २०५
५ मई २०२१ 5 May 2021 ५ मई २०२१

पसीने से जब जब paseene se jab jab पसीने से जब जब

पसीने से जब-जब नहाती है गर्मी

हवाओं से हमको मिलाती है गर्मी

॥

उगे-भोर, चिड़िया बनी चहचहाती

चमन की तरफ लेके जाती है गर्मी

॥

पकड़ हाथ चलती है फुलवारियों में

झकोरों से झूला झुलाती है गर्मी

॥

छतों पर सितारों की छाया में शब भर

सरस रागिनी गा सुलाती है गर्मी

॥

विजन वन में पेड़ों की बन छाँव सुखकर

महक के गलीचे बिछाती है गर्मी

॥

अगम झील में, ताल में, नाव खेकर

धवल धार-जल में घुमाती है गर्मी

॥

पहाड़ों पे, फूलों-भरी वादियों में

हमें देके न्यौता बुलाती है गर्मी

॥

पिला जूस, लस्सी या नींबू शिकंजी

तपन की चुभन से बचाती है गर्मी

॥

डरें ‘कल्पना’ क्यों भला गर्मियों से

कि राहत भी लेकर ही आती है गर्मी

॥

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

paseene se jab-jab nahaatee hai garmee

hawaaon se hamako milaatee hai garmee

·

uge-bhor, chidiyaa banee chahachahaatee

chaman kee taraph leke jaatee hai garmee

·

pakad haath chalatee hai phulawaariyon men

jhakoron se jhoolaa jhulaatee hai garmee

·

chaton par sitaaron kee chaayaa men shab bhar

saras raaginee gaa sulaatee hai garmee

·

wijan wan men pedon kee ban chaanv sukhakar

mahak ke galeeche bichaatee hai garmee

·

agam jheel men, taal men, naaw khekar

dhawal dhaar-jal men ghumaatee hai garmee

·

pahaadon pe, phoolon-bharee waadiyon men

hamen deke nyautaa bulaatee hai garmee

·

pilaa joos, lassee yaa neenboo shikanjee

tapan kee chubhan se bachaatee hai garmee

·

daren ‘kalpanaa’ kyon bhalaa garmiyon se

ki raahat bhee lekar hee aatee hai garmee

·

-kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

पसीने से जब-जब नहाती है गर्मी

हवाओं से हमको मिलाती है गर्मी

॥

उगे-भोर, चिड़िया बनी चहचहाती

चमन की तरफ लेके जाती है गर्मी

॥

पकड़ हाथ चलती है फुलवारियों में

झकोरों से झूला झुलाती है गर्मी

॥

छतों पर सितारों की छाया में शब भर

सरस रागिनी गा सुलाती है गर्मी

॥

विजन वन में पेड़ों की बन छाँव सुखकर

महक के गलीचे बिछाती है गर्मी

॥

अगम झील में, ताल में, नाव खेकर

धवल धार-जल में घुमाती है गर्मी

॥

पहाड़ों पे, फूलों-भरी वादियों में

हमें देके न्यौता बुलाती है गर्मी

॥

पिला जूस, लस्सी या नींबू शिकंजी

तपन की चुभन से बचाती है गर्मी

॥

डरें ‘कल्पना’ क्यों भला गर्मियों से

कि राहत भी लेकर ही आती है गर्मी

॥

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗