खुदा से खुशी की khudaa se khushee kee खुदा से खुशी की
खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।
कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।
अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं
उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।
जो लाए नए रंग जीवन में सबके
वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।
जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन
परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।
है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं
इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।
करे कातिलों के, क़तल काफिले जो
वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।
दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके
हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।
बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से
कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।
करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर
हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।
खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।
कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।
अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं
उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।
जो लाए नए रंग जीवन में सबके
वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।
जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन
परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।
है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं
इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।
करे कातिलों के, क़तल काफिले जो
वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।
दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके
हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।
बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से
कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।
करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर
हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।
khudaa se khushee kee lahar maangatee hoon
ki bekhauph har ek ghar maangatee hoon
andheron ne hee jinase nazaren milaaeen
ujaalon kee unapar nazar maangatee hoon
jo laae nae rang jeewan men sabake
we din, raat, pal, har pahar maangatee hoon
jo pinjadon men saiyyaad, ke kaid hain, un
parindon ke aazaad, par maangatee hoon
hai paralok kyaa ye, naheen jaanatee main
isee lok kee sukh-sahar maangatee hoon
kare kaatilon ke, qatal kaaphile jo
wo kaanoon hokar, nidar maangatee hoon
dilon ko milaakar, mile jan se jaake
harik gaanv men, wo shahar maangatee hoon
bahe ras kee dhaaraa, meree har gazal se
kuch aisee kalam se, bahar maangatee hoon
karoon jan kee sewaa, jioon jag kee khaatir
he rab! ‘kalpanaa’ wo hunar maangatee hoon
khudaa se khushee kee lahar maangatee hoon
ki bekhauph har ek ghar maangatee hoon
andheron ne hee jinase nazaren milaaeen
ujaalon kee unapar nazar maangatee hoon
jo laae nae rang jeewan men sabake
we din, raat, pal, har pahar maangatee hoon
jo pinjadon men saiyyaad, ke kaid hain, un
parindon ke aazaad, par maangatee hoon
hai paralok kyaa ye, naheen jaanatee main
isee lok kee sukh-sahar maangatee hoon
kare kaatilon ke, qatal kaaphile jo
wo kaanoon hokar, nidar maangatee hoon
dilon ko milaakar, mile jan se jaake
harik gaanv men, wo shahar maangatee hoon
bahe ras kee dhaaraa, meree har gazal se
kuch aisee kalam se, bahar maangatee hoon
karoon jan kee sewaa, jioon jag kee khaatir
he rab! ‘kalpanaa’ wo hunar maangatee hoon
खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।
कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।
अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं
उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।
जो लाए नए रंग जीवन में सबके
वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।
जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन
परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।
है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं
इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।
करे कातिलों के, क़तल काफिले जो
वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।
दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके
हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।
बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से
कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।
करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर
हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।
खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।
कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।
अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं
उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।
जो लाए नए रंग जीवन में सबके
वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।
जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन
परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।
है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं
इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।
करे कातिलों के, क़तल काफिले जो
वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।
दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके
हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।
बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से
कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।
करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर
हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।