कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २०३ / २०४ № 203 of 204 रचना २०३ / २०४
१० जून २०२२ 10 June 2022 १० जून २०२२

खुदा से खुशी की khudaa se khushee kee खुदा से खुशी की

खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।

कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।

अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं

उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।

जो लाए नए रंग जीवन में सबके

वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।

जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन

परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।

है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं

इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।

करे कातिलों के, क़तल काफिले जो

वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।

दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके

हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।

बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से

कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।

करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर

हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।

खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।

कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।

अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं

उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।

जो लाए नए रंग जीवन में सबके

वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।

जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन

परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।

है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं

इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।

करे कातिलों के, क़तल काफिले जो

वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।

दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके

हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।

बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से

कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।

करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर

हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।

khudaa se khushee kee lahar maangatee hoon

ki bekhauph har ek ghar maangatee hoon

·

andheron ne hee jinase nazaren milaaeen

ujaalon kee unapar nazar maangatee hoon

·

jo laae nae rang jeewan men sabake

we din, raat, pal, har pahar maangatee hoon

·

jo pinjadon men saiyyaad, ke kaid hain, un

parindon ke aazaad, par maangatee hoon

·

hai paralok kyaa ye, naheen jaanatee main

isee lok kee sukh-sahar maangatee hoon

·

kare kaatilon ke, qatal kaaphile jo

wo kaanoon hokar, nidar maangatee hoon

·

dilon ko milaakar, mile jan se jaake

harik gaanv men, wo shahar maangatee hoon

·

bahe ras kee dhaaraa, meree har gazal se

kuch aisee kalam se, bahar maangatee hoon

·

karoon jan kee sewaa, jioon jag kee khaatir

he rab! ‘kalpanaa’ wo hunar maangatee hoon

·

khudaa se khushee kee lahar maangatee hoon

ki bekhauph har ek ghar maangatee hoon

·

andheron ne hee jinase nazaren milaaeen

ujaalon kee unapar nazar maangatee hoon

·

jo laae nae rang jeewan men sabake

we din, raat, pal, har pahar maangatee hoon

·

jo pinjadon men saiyyaad, ke kaid hain, un

parindon ke aazaad, par maangatee hoon

·

hai paralok kyaa ye, naheen jaanatee main

isee lok kee sukh-sahar maangatee hoon

·

kare kaatilon ke, qatal kaaphile jo

wo kaanoon hokar, nidar maangatee hoon

·

dilon ko milaakar, mile jan se jaake

harik gaanv men, wo shahar maangatee hoon

·

bahe ras kee dhaaraa, meree har gazal se

kuch aisee kalam se, bahar maangatee hoon

·

karoon jan kee sewaa, jioon jag kee khaatir

he rab! ‘kalpanaa’ wo hunar maangatee hoon

खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।

कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।

अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं

उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।

जो लाए नए रंग जीवन में सबके

वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।

जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन

परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।

है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं

इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।

करे कातिलों के, क़तल काफिले जो

वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।

दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके

हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।

बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से

कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।

करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर

हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।

खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ।

कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।

अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं

उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।

जो लाए नए रंग जीवन में सबके

वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।

जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन

परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।

है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं

इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।

करे कातिलों के, क़तल काफिले जो

वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।

दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके

हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।

बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से

कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।

करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर

हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗