कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २०४ / २०४ № 204 of 204 रचना २०४ / २०४
१० नवम्बर २०२३ 10 November 2023 १० नवम्बर २०२३

ढलने लगी है ज़िन्दगी dhalane lagee hai zindagee ढलने लगी है ज़िन्दगी

सांध्य-सूरज की तरह, ढलने लगी है ज़िंदगी।

थाम वैसाखी, सफर करने लगी है

ज़िंदगी।

हर कदम हर वक्त, जो रफ्तार के रथ पर चली

उम्र की इस शाम में, थमने लगी है ज़िंदगी।

फूल बन खिलती रही, बाली उमर के बाग में

शूल बनकर अब वही, चुभने लगी है ज़िंदगी।

जो ठहाकों से हिलाती थी दरो दीवार को

मूक हो सदियों से यों, लगने लगी है ज़िंदगी।

कल धधकती ज्वाल थी, अब शेष हैं चिंगारियाँ

धीरे-धीरे राख बन, बुझने लगी है ज़िंदगी।

ख्वाब बन आती रही, रातों को गहरी नींद में

लेकिन अब ख्वाबों से ही, मिटने लगी है

ज़िंदगी।

जो अडिग चट्टान थी, टुकड़े हुई अब टूटकर

'कल्पना' अब मौत से, डरने लगी है ज़िंदगी।

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

saandhy-sooraj kee tarah, dhalane lagee hai zindagee

·

thaam waisaakhee, saphar karane lagee hai

zindagee

·

har kadam har wakt, jo raphtaar ke rath par chalee

·

umr kee is shaam men, thamane lagee hai zindagee

·

phool ban khilatee rahee, baalee umar ke baag men

·

shool banakar ab wahee, chubhane lagee hai zindagee

·

jo thahaakon se hilaatee thee daro deewaar ko

·

mook ho sadiyon se yon, lagane lagee hai zindagee

·

kal dhadhakatee jvaal thee, ab shesh hain chingaariyaan

·

dheere-dheere raakh ban, bujhane lagee hai zindagee

·

khvaab ban aatee rahee, raaton ko gaharee neend men

·

lekin ab khvaabon se hee, mitane lagee hai

zindagee

·

jo adig chattaan thee, tukade huee ab tootakar

·

'kalpanaa' ab maut se, darane lagee hai zindagee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सांध्य-सूरज की तरह, ढलने लगी है ज़िंदगी।

थाम वैसाखी, सफर करने लगी है

ज़िंदगी।

हर कदम हर वक्त, जो रफ्तार के रथ पर चली

उम्र की इस शाम में, थमने लगी है ज़िंदगी।

फूल बन खिलती रही, बाली उमर के बाग में

शूल बनकर अब वही, चुभने लगी है ज़िंदगी।

जो ठहाकों से हिलाती थी दरो दीवार को

मूक हो सदियों से यों, लगने लगी है ज़िंदगी।

कल धधकती ज्वाल थी, अब शेष हैं चिंगारियाँ

धीरे-धीरे राख बन, बुझने लगी है ज़िंदगी।

ख्वाब बन आती रही, रातों को गहरी नींद में

लेकिन अब ख्वाबों से ही, मिटने लगी है

ज़िंदगी।

जो अडिग चट्टान थी, टुकड़े हुई अब टूटकर

'कल्पना' अब मौत से, डरने लगी है ज़िंदगी।

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗