कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २०५ / २०५ № 205 of 205 रचना २०५ / २०५
१० नवम्बर २०२३ 10 November 2023 १० नवम्बर २०२३

ढलने लगी है ज़िन्दगी dhalane lagee hai zindagee ढलने लगी है ज़िन्दगी

सांध्य-सूरज की तरह, ढलने लगी है ज़िंदगी।

॥

थाम वैसाखी, सफर करने लगी है

ज़िंदगी।

॥

हर कदम हर वक्त, जो रफ्तार के रथ पर चली

॥

उम्र की इस शाम में, थमने लगी है ज़िंदगी।

॥

फूल बन खिलती रही, बाली उमर के बाग में

॥

शूल बनकर अब वही, चुभने लगी है ज़िंदगी।

॥

जो ठहाकों से हिलाती थी दरो दीवार को

॥

मूक हो सदियों से यों, लगने लगी है ज़िंदगी।

॥

कल धधकती ज्वाल थी, अब शेष हैं चिंगारियाँ

॥

धीरे-धीरे राख बन, बुझने लगी है ज़िंदगी।

॥

ख्वाब बन आती रही, रातों को गहरी नींद में

॥

लेकिन अब ख्वाबों से ही, मिटने लगी है

ज़िंदगी।

॥

जो अडिग चट्टान थी, टुकड़े हुई अब टूटकर

॥

'कल्पना' अब मौत से, डरने लगी है ज़िंदगी।

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

saandhy-sooraj kee tarah, dhalane lagee hai zindagee

·

thaam waisaakhee, saphar karane lagee hai

zindagee

·

har kadam har wakt, jo raphtaar ke rath par chalee

·

umr kee is shaam men, thamane lagee hai zindagee

·

phool ban khilatee rahee, baalee umar ke baag men

·

shool banakar ab wahee, chubhane lagee hai zindagee

·

jo thahaakon se hilaatee thee daro deewaar ko

·

mook ho sadiyon se yon, lagane lagee hai zindagee

·

kal dhadhakatee jvaal thee, ab shesh hain chingaariyaan

·

dheere-dheere raakh ban, bujhane lagee hai zindagee

·

khvaab ban aatee rahee, raaton ko gaharee neend men

·

lekin ab khvaabon se hee, mitane lagee hai

zindagee

·

jo adig chattaan thee, tukade huee ab tootakar

·

'kalpanaa' ab maut se, darane lagee hai zindagee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सांध्य-सूरज की तरह, ढलने लगी है ज़िंदगी।

॥

थाम वैसाखी, सफर करने लगी है

ज़िंदगी।

॥

हर कदम हर वक्त, जो रफ्तार के रथ पर चली

॥

उम्र की इस शाम में, थमने लगी है ज़िंदगी।

॥

फूल बन खिलती रही, बाली उमर के बाग में

॥

शूल बनकर अब वही, चुभने लगी है ज़िंदगी।

॥

जो ठहाकों से हिलाती थी दरो दीवार को

॥

मूक हो सदियों से यों, लगने लगी है ज़िंदगी।

॥

कल धधकती ज्वाल थी, अब शेष हैं चिंगारियाँ

॥

धीरे-धीरे राख बन, बुझने लगी है ज़िंदगी।

॥

ख्वाब बन आती रही, रातों को गहरी नींद में

॥

लेकिन अब ख्वाबों से ही, मिटने लगी है

ज़िंदगी।

॥

जो अडिग चट्टान थी, टुकड़े हुई अब टूटकर

॥

'कल्पना' अब मौत से, डरने लगी है ज़िंदगी।

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗