कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १९ / २०४ № 19 of 204 रचना १९ / २०४
१९ अक्तूबर २०१३ 19 October 2013 १९ अक्तूबर २०१३

बुत शहर में बोलते इंसान भी तो हैं! but shahar men bolate insaan bhee to hain! बुत शहर में बोलते इंसान भी तो हैं!

ज़िन्दगी

जीने के कुछ, सामान भी तो हैं!

बुत

शहर में बोलते, इंसान भी तो हैं!

भीड़

से माना कि घर, सिकुड़े, बने पिंजड़े

पिंजड़ों

में फैले हुए, उद्यान भी तो हैं!

और

अधिक के लोभ में, नाता

घरों से तोड़

मूढ़

गाँवों ने किए, प्रस्थान भी तो हैं।

शहर

में आकर मचाते, हैं अकारण भीड़

यूँ

बढ़ाए गाँव ने, व्यवधान भी तो हैं!

क्यों

नहीं हक माँगते, शासन से बढ़कर ये?

जानकर

बनते रहे, नादान भी तो हैं!

हल

चलाते हाथ कोमल हो नहीं सकते

श्रम

से होते रास्ते, आसान भी तो हैं!

माँ-पिता

क्यों दोष देते, पुत्र को ही आज?

मन

में उनके कुछ दबे, अरमान

भी तो हैं।

कोसते केवल

शहर को, क्यों भला सब लोग?

ये

शहर जन के लिए, वरदान भी तो हैं!

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

zindagee

jeene ke kuch, saamaan bhee to hain!

·

but

shahar men bolate, insaan bhee to hain!

·

bheed

se maanaa ki ghar, sikude, bane pinjade

·

pinjadon

men phaile hue, udyaan bhee to hain!

·

aur

adhik ke lobh men, naataa

gharon se tod

·

mooढ़

gaanvon ne kie, prasthaan bhee to hain

·

shahar

men aakar machaate, hain akaaran bheed

·

yoon

bढ़aae gaanv ne, wyawadhaan bhee to hain!

·

kyon

naheen hak maangate, shaasan se bढ़kar ye?

·

jaanakar

banate rahe, naadaan bhee to hain!

·

hal

chalaate haath komal ho naheen sakate

·

shram

se hote raaste, aasaan bhee to hain!

·

maan-pitaa

kyon dosh dete, putr ko hee aaj?

·

man

men unake kuch dabe, aramaan

bhee to hain

·

kosate kewal

shahar ko, kyon bhalaa sab log?

·

ye

shahar jan ke lie, waradaan bhee to hain!

·

- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

ज़िन्दगी

जीने के कुछ, सामान भी तो हैं!

बुत

शहर में बोलते, इंसान भी तो हैं!

भीड़

से माना कि घर, सिकुड़े, बने पिंजड़े

पिंजड़ों

में फैले हुए, उद्यान भी तो हैं!

और

अधिक के लोभ में, नाता

घरों से तोड़

मूढ़

गाँवों ने किए, प्रस्थान भी तो हैं।

शहर

में आकर मचाते, हैं अकारण भीड़

यूँ

बढ़ाए गाँव ने, व्यवधान भी तो हैं!

क्यों

नहीं हक माँगते, शासन से बढ़कर ये?

जानकर

बनते रहे, नादान भी तो हैं!

हल

चलाते हाथ कोमल हो नहीं सकते

श्रम

से होते रास्ते, आसान भी तो हैं!

माँ-पिता

क्यों दोष देते, पुत्र को ही आज?

मन

में उनके कुछ दबे, अरमान

भी तो हैं।

कोसते केवल

शहर को, क्यों भला सब लोग?

ये

शहर जन के लिए, वरदान भी तो हैं!

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗