कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २० / २०४ № 20 of 204 रचना २० / २०४
१९ अक्तूबर २०१३ 19 October 2013 १९ अक्तूबर २०१३

रामजी भारत की भू पर raamajee bhaarat kee bhoo par रामजी भारत की भू पर

रामजी, भारत की भू पर, फिर से आओ एक बार।

रोग दोषों को पुनः, जड़ से मिटाओ एक बार।

फन उठाए फिर रहे हैं, नाग विषधर देश में

विष बने अमृत कुछ ऐसा, शर चलाओ एक बार।

जो मुखौटे ओढ़ फिरते हैं, तुम्हारे नाम के

मन में उनके ‘राम’ अंकित, कर दिखाओ एक बार

पापियों के पाप से, मैली हुई मन्दाकिनी

धनुर्धारी! धार सलिला, की बचाओ एक बार।

भूल बैठीं, त्याग तप को, आजकल की नारियाँ

याद सीता की उन्हें, फिर से दिलाओ एक बार।

सुत हुए साहब विदेशी ,घर में वनवासी पिता

सर्व व्यापी, फिर चमन, वन को बनाओ एक बार।

वेद की गूँजें ऋचाएँ, यज्ञ हों पावन जहाँ

वो अयोध्या सत्य की, फिर से बसाओ एक बार।

-कल्पना रामानीप्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

raamajee, bhaarat kee bhoo par, phir se aao ek baar

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rog doshon ko punah, jad se mitaao ek baar

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phan uthaae phir rahe hain, naag wishadhar desh men

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wish bane amriit kuch aisaa, shar chalaao ek baar

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jo mukhaute oढ़ phirate hain, tumhaare naam ke

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man men unake ‘raam’ ankit, kar dikhaao ek baar

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paapiyon ke paap se, mailee huee mandaakinee

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dhanurdhaaree! dhaar salilaa, kee bachaao ek baar

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bhool baitheen, tyaag tap ko, aajakal kee naariyaan

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yaad seetaa kee unhen, phir se dilaao ek baar

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sut hue saahab wideshee ,ghar men wanawaasee pitaa

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sarv wyaapee, phir chaman, wan ko banaao ek baar

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wed kee goonjen riichaaen, yajn hon paawan jahaan

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wo ayodhyaa saty kee, phir se basaao ek baar

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-kalpanaa raamaaneeprotsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

रामजी, भारत की भू पर, फिर से आओ एक बार।

रोग दोषों को पुनः, जड़ से मिटाओ एक बार।

फन उठाए फिर रहे हैं, नाग विषधर देश में

विष बने अमृत कुछ ऐसा, शर चलाओ एक बार।

जो मुखौटे ओढ़ फिरते हैं, तुम्हारे नाम के

मन में उनके ‘राम’ अंकित, कर दिखाओ एक बार

पापियों के पाप से, मैली हुई मन्दाकिनी

धनुर्धारी! धार सलिला, की बचाओ एक बार।

भूल बैठीं, त्याग तप को, आजकल की नारियाँ

याद सीता की उन्हें, फिर से दिलाओ एक बार।

सुत हुए साहब विदेशी ,घर में वनवासी पिता

सर्व व्यापी, फिर चमन, वन को बनाओ एक बार।

वेद की गूँजें ऋचाएँ, यज्ञ हों पावन जहाँ

वो अयोध्या सत्य की, फिर से बसाओ एक बार।

-कल्पना रामानीप्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗