कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १ / ११४ № 1 of 114 रचना १ / ११४

कल की नारी kal kee naaree कल की नारी

शाम को चाय का कप लेकर दक्षा लॉन में बैठी ही थी कि डोर-बेल बजी। कप रखकर उसने दरवाजा खोला तो बेटी तान्या के साथ आई हुई महिलाओं को देखकर सवालिया नज़रों से तान्या की ओर देखा-

"माँ, ये सब महिला-मुक्ति अभियान दल की सदस्य हैं, आपकी समस्या पर विमर्श के लिए मैंने इन्हें बुलाया है। आप इन सबकी आपबीती और मुक्ति के लिए संघर्ष की कथा सुनेंगी तो जान जाएँगी कि आज की नारी अबला या अशक्त नहीं रही जो पति का बेवजह अत्याचार सहन करती रहे।"

आज फिर माँ-पिता के कमरे से कहासुनी की ऊँची आवाज़ें आने के बाद पिता को बाहर जाते और माँ को गीले नैन पोंछते हुए उनकी युवा बेटी तान्या ने देख लिया था।

दक्षा ने सबको आदर से अंदर बिठाकर तान्या को चाय बनाने के लिए अंदर भेजा फिर महिलाओं की ओर मुखातिब होकर संयत स्वर में बोली -

"आप सभी बहनों का विमर्श-वार्ता के लिए हार्दिक स्वागत है लेकिन पहले मैं अपनी दो बातें आपके समक्ष रखूँगी। पहली यह कि मैं आज की नहीं कल की नारी हूँ जो हर हाल में घर-परिवार तोड़ने नहीं जोड़ने में विश्वास और परिस्थितियों को अपने हौसलों से बस में करने की क्षमता रखती है। दूसरी यह कि अगर आप सब अपने मौजादा हालात से पूरी तरह संतुष्ट हैं तो मैं भी आपके इस अभियान में शामिल हो जाऊँगी।"

shaam ko chaay kaa kap lekar dakshaa lon men baithee hee thee ki dor-bel bajee. kap rakhakar usane darawaazaa kholaa to betee taanyaa ke saath aaee huee mahilaaon ko dekhakar sawaaliyaa nazaron se taanyaa kee or dekhaa -

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"maan, ye sab mahilaa-mukti abhiyaan dal kee sadasy hain, aapakee samasyaa par wimarsh ke lie mainne inhen bulaayaa hai. aap in sabakee aapabeetee aur mukti ke lie sangharsh kee kathaa sunengee to jaan jaaengee ki aaj kee naaree abalaa yaa ashakt naheen rahee jo pati kaa bewajah atyaachaar sahan karatee rahe."

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aaj phir maan-pitaa ke kamare se kahaasunee kee oonchee aawaazen aane ke baad pitaa ko baahar jaate aur maan ko geele nain ponchhate hue unakee yuwaa betee taanyaa ne dekh liyaa thaa.

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dakshaa ne sabako aadar se andar bithaakar taanyaa ko chaay banaane ke lie andar bhejaa phir mahilaaon kee or mukhaatib hokar sanyat swar men bolee -

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"aap sabhee bahanon kaa wimarsh-waartaa ke lie haardik swaagat hai lekin pahale main apanee do baaten aapake samaksh rakhoongee. pahalee yah ki main aaj kee naheen kal kee naaree hoon jo har haal men ghar-pariwaar todane naheen jodane men wishwaas aur paristhitiyon ko apane hauslon se bas men karane kee kshamataa rakhatee hai. doosaree yah ki agar aap sab apane maujadaa haalaat se pooree tarah santusht hain to main bhee aapake is abhiyaan men shaamil ho jaaoongee."

शाम को चाय का कप लेकर दक्षा लॉन में बैठी ही थी कि डोर-बेल बजी। कप रखकर उसने दरवाजा खोला तो बेटी तान्या के साथ आई हुई महिलाओं को देखकर सवालिया नज़रों से तान्या की ओर देखा-

"माँ, ये सब महिला-मुक्ति अभियान दल की सदस्य हैं, आपकी समस्या पर विमर्श के लिए मैंने इन्हें बुलाया है। आप इन सबकी आपबीती और मुक्ति के लिए संघर्ष की कथा सुनेंगी तो जान जाएँगी कि आज की नारी अबला या अशक्त नहीं रही जो पति का बेवजह अत्याचार सहन करती रहे।"

आज फिर माँ-पिता के कमरे से कहासुनी की ऊँची आवाज़ें आने के बाद पिता को बाहर जाते और माँ को गीले नैन पोंछते हुए उनकी युवा बेटी तान्या ने देख लिया था।

दक्षा ने सबको आदर से अंदर बिठाकर तान्या को चाय बनाने के लिए अंदर भेजा फिर महिलाओं की ओर मुखातिब होकर संयत स्वर में बोली -

"आप सभी बहनों का विमर्श-वार्ता के लिए हार्दिक स्वागत है लेकिन पहले मैं अपनी दो बातें आपके समक्ष रखूँगी। पहली यह कि मैं आज की नहीं कल की नारी हूँ जो हर हाल में घर-परिवार तोड़ने नहीं जोड़ने में विश्वास और परिस्थितियों को अपने हौसलों से बस में करने की क्षमता रखती है। दूसरी यह कि अगर आप सब अपने मौजादा हालात से पूरी तरह संतुष्ट हैं तो मैं भी आपके इस अभियान में शामिल हो जाऊँगी।"

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗