कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ४७ / ११४ № 47 of 114 रचना ४७ / ११४
२ अप्रैल २०१७ 2 April 2017 २ अप्रैल २०१७

निरुत्तर niruttar निरुत्तर

उस घुमावदार गुफानुमा बाजार से तगड़ी खरीदारी करने के बाद पसीने से लथपथ होतीं सुधा और सुरुचि बेहद थक चुकी थीं. प्यास से बेहाल होकर बाहर आकर इधर उधर नज़र दौड़ाई तो आसपास कोई होटल नज़र नहीं आया, न ही उनमें ढूँढने की शक्ति बाकी थी लेकिन सड़क के उस पार छाया में एक कतार में कुछ ठेलागाड़ियाँ देखकर गला तर करने की उम्मीद लिए फुर्ती से उधर पहुँच गईं. नींबू-पानी, जल-जीरा, लस्सी आदि ठन्डे पेय देखते हुए उनकी नज़रें नारियल-पानी के ठेले पर ठहर गईं. नारियल पानी पीते ही उनकी थकान दूर होने के साथ ही भूख प्यास दोनों से राहत मिल गई. पैसे देते-देते सुधा अपनी आदत के अनुसार नारियल वाले से जानकारी जुटाने लग गई-

“भैया, आप ये नारियल कैसे जुटाते हो और इतनी धूप में कितनी दूर से यहाँ तक ले आते हो?”

“ये बहुत मेहनत का काम है दीदी, लेकिन बचपन से करते-करते हम इसके आदी हो जाते हैं क्योंकि यही कार्य हमारी गुजर-बसर का सहारा है.”

“अगर आप बचपन में पढ़-लिख लेते तो यही कार्य बड़े पैमाने पर करके और अच्छी कमाई कर लेते और दिन-भर धूप में हलकान नहीं होना पड़ता!”

“छोड़ो सुधा, तुम भी न...भैंस के आगे बीन बजाने से बाज नहीं आओगी. पैसे दो और जल्दी चलो. पढ-लिख कर कमाने के लिए दिमाग भी तो चाहिए न...ये लोग ऐसे कामों के लिए ही बने होते हैं.” सुरुचि ने उसे टोकते हुए कहा.

नारियल वाले को सुरुचि की बातों से अपना अपमान महसूस हुआ, तुरंत बोला-

“आप ठीक कहती हैं बहन, लेकिन हम जैसों में इतना दिमाग होता तो ऐसे वीरान स्थलों पर चिलचिलाती धूप में आप जैसों की सेवा कौन करता?”

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us ghumaawadaar guphaanumaa baajaar se tagadee khareedaaree karane ke baad paseene se lathapath hoteen sudhaa aur suruchi behad thak chukee theen pyaas se behaal hokar baahar aakar idhar udhar nazar daudaaee to aasapaas koee hotal nazar naheen aayaa, n hee unamen dhoondhane kee shakti baakee thee lekin sadak ke us paar chaayaa men ek kataar men kuch thelaagaadiyaan dekhakar galaa tar karane kee ummeed lie phurtee se udhar pahunch gaeen neenboo-paanee, jal-jeeraa, lassee aadi thande pey dekhate hue unakee nazaren naariyal-paanee ke thele par thahar gaeen naariyal paanee peete hee unakee thakaan door hone ke saath hee bhookh pyaas donon se raahat mil gaee paise dete-dete sudhaa apanee aadat ke anusaar naariyal waale se jaanakaaree jutaane lag gaee-

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“bhaiyaa, aap ye naariyal kaise jutaate ho aur itanee dhoop men kitanee door se yahaan tak le aate ho?”

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“ye bahut mehanat kaa kaam hai deedee, lekin bachapan se karate-karate ham isake aadee ho jaate hain kyonki yahee kaary hamaaree gujar-basar kaa sahaaraa hai”

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“agar aap bachapan men pढ़-likh lete to yahee kaary bade paimaane par karake aur achchee kamaaee kar lete aur din-bhar dhoop men halakaan naheen honaa padataa!”

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“chodo sudhaa, tum bhee nbhains ke aage been bajaane se baaj naheen aaogee paise do aur jaldee chalo padh-likh kar kamaane ke lie dimaag bhee to chaahie nye log aise kaamon ke lie hee bane hote hain” suruchi ne use tokate hue kahaa

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naariyal waale ko suruchi kee baaton se apanaa apamaan mahasoos huaa, turant bolaa-

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“aap theek kahatee hain bahan, lekin ham jaison men itanaa dimaag hotaa to aise weeraan sthalon par chilachilaatee dhoop men aap jaison kee sewaa kaun karataa?”

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उस घुमावदार गुफानुमा बाजार से तगड़ी खरीदारी करने के बाद पसीने से लथपथ होतीं सुधा और सुरुचि बेहद थक चुकी थीं. प्यास से बेहाल होकर बाहर आकर इधर उधर नज़र दौड़ाई तो आसपास कोई होटल नज़र नहीं आया, न ही उनमें ढूँढने की शक्ति बाकी थी लेकिन सड़क के उस पार छाया में एक कतार में कुछ ठेलागाड़ियाँ देखकर गला तर करने की उम्मीद लिए फुर्ती से उधर पहुँच गईं. नींबू-पानी, जल-जीरा, लस्सी आदि ठन्डे पेय देखते हुए उनकी नज़रें नारियल-पानी के ठेले पर ठहर गईं. नारियल पानी पीते ही उनकी थकान दूर होने के साथ ही भूख प्यास दोनों से राहत मिल गई. पैसे देते-देते सुधा अपनी आदत के अनुसार नारियल वाले से जानकारी जुटाने लग गई-

“भैया, आप ये नारियल कैसे जुटाते हो और इतनी धूप में कितनी दूर से यहाँ तक ले आते हो?”

“ये बहुत मेहनत का काम है दीदी, लेकिन बचपन से करते-करते हम इसके आदी हो जाते हैं क्योंकि यही कार्य हमारी गुजर-बसर का सहारा है.”

“अगर आप बचपन में पढ़-लिख लेते तो यही कार्य बड़े पैमाने पर करके और अच्छी कमाई कर लेते और दिन-भर धूप में हलकान नहीं होना पड़ता!”

“छोड़ो सुधा, तुम भी न...भैंस के आगे बीन बजाने से बाज नहीं आओगी. पैसे दो और जल्दी चलो. पढ-लिख कर कमाने के लिए दिमाग भी तो चाहिए न...ये लोग ऐसे कामों के लिए ही बने होते हैं.” सुरुचि ने उसे टोकते हुए कहा.

नारियल वाले को सुरुचि की बातों से अपना अपमान महसूस हुआ, तुरंत बोला-

“आप ठीक कहती हैं बहन, लेकिन हम जैसों में इतना दिमाग होता तो ऐसे वीरान स्थलों पर चिलचिलाती धूप में आप जैसों की सेवा कौन करता?”

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗