कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १५७ / १६३ № 157 of 163 रचना १५७ / १६३
२९ मई २०२० 29 May 2020 २९ मई २०२०

गोल चाँद की रात gol chaand kee raat गोल चाँद की रात

बहुत दिनों के बाद आज माँ

रोटी की फिर याद आई है।

कल भी  तूने प्याज दिया था।

परसों बस जल घूँट  पिया था।

कई दिनों तक सूखे टुकड़े

भिगो भिगो कर स्वाद लिया था।

बात  मगर यह भूल गया हूँ

रोटी किस दिन हाथ आई है।

माँ! क्यों नहीं हमारे घर में

रोज रोज रोटी बनती है?

बस डिब्बों को खोल खोल कर

बचे हुए दाने  गिनती  है।

महँगाई क्या होती है माँ

इस घर के क्यों पास आई है?

कहती तो है  मेरे चंदा!

चंदा जैसी रोटी दूँगी।

जिस दिन जैसा चाँद दिखेगा

उस दिन उतनी मोटी दूँगी।

आज दिखेगा बड़ा चंद्रमा

कहती बस यह बात  आई है।

कब तक  चने चबाऊँगा माँ

कब तक सत्तू खाऊँगा मैं

क्या यों ही भूखे रह रह कर

कभी बड़ा हो पाऊँगा मैं?

सच कह दे माँ! कब बोलेगी

गोल चाँद की रात आई है!!

bahut dinon ke baad aaj maan

rotee kee phir yaad aaee hai

·

kal bhee toone pyaaj diyaa thaa

parason bas jal ghoont piyaa thaa

kaee dinon tak sookhe tukade

bhigo bhigo kar svaad liyaa thaa

·

baat magar yah bhool gayaa hoon

rotee kis din haath aaee hai

·

maan! kyon naheen hamaare ghar men

roj roj rotee banatee hai?

bas dibbon ko khol khol kar

bache hue daane ginatee hai

·

mahangaaee kyaa hotee hai maan

is ghar ke kyon paas aaee hai?

·

kahatee to hai mere chandaa!

chandaa jaisee rotee doongee

jis din jaisaa chaand dikhegaa

us din utanee motee doongee

·

aaj dikhegaa badaa chandramaa

kahatee bas yah baat aaee hai

·

kab tak chane chabaaoongaa maan

kab tak sattoo khaaoongaa main

kyaa yon hee bhookhe rah rah kar

kabhee badaa ho paaoongaa main?

·

sach kah de maan! kab bolegee

gol chaand kee raat aaee hai!!

बहुत दिनों के बाद आज माँ

रोटी की फिर याद आई है।

कल भी  तूने प्याज दिया था।

परसों बस जल घूँट  पिया था।

कई दिनों तक सूखे टुकड़े

भिगो भिगो कर स्वाद लिया था।

बात  मगर यह भूल गया हूँ

रोटी किस दिन हाथ आई है।

माँ! क्यों नहीं हमारे घर में

रोज रोज रोटी बनती है?

बस डिब्बों को खोल खोल कर

बचे हुए दाने  गिनती  है।

महँगाई क्या होती है माँ

इस घर के क्यों पास आई है?

कहती तो है  मेरे चंदा!

चंदा जैसी रोटी दूँगी।

जिस दिन जैसा चाँद दिखेगा

उस दिन उतनी मोटी दूँगी।

आज दिखेगा बड़ा चंद्रमा

कहती बस यह बात  आई है।

कब तक  चने चबाऊँगा माँ

कब तक सत्तू खाऊँगा मैं

क्या यों ही भूखे रह रह कर

कभी बड़ा हो पाऊँगा मैं?

सच कह दे माँ! कब बोलेगी

गोल चाँद की रात आई है!!

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗