कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना २ / ६५ № 2 of 65 रचना २ / ६५
२१ जुलाई २०१२ 21 July 2012 २१ जुलाई २०१२

ढाई अक्षर प्रेम के dhaaee akshar prem ke ढाई अक्षर प्रेम के

ढाई

अक्षर प्रेम के, गूढ

मगर है सार।

एक

शब्द की नींव पर, टिका

हुआ संसार।

प्रेम

तृप्ति का रूप है, प्रेम

अधूरी प्यास।

इसके

मालिक आप हैं, आप

इसीके दास।

प्रेम

न माँगे सम्पदा, और न

माँगे भोग।

जग

बैरी उसके लिए, जिसे

प्रेम का रोग।

प्रेम

अनोखी अगन है, हिय

सुलगे दिन रात।

स्वयं

पतंगा जल मरे, समझ

न आए बात।

प्रेम

न माने नीतियाँ, और न

रीति रिवाज।

प्रेमी

का होता सदा, एक

dhaaee

akshar prem ke, goodh

magar hai saar

·

ek

shabd kee neenv par, tikaa

huaa sansaar

·

prem

triipti kaa roop hai, prem

adhooree pyaas

·

isake

maalik aap hain, aap

iseeke daas

·

prem

n maange sampadaa, aur n

maange bhog

·

jag

bairee usake lie, jise

prem kaa rog

·

prem

anokhee agan hai, hiy

sulage din raat

·

svayan

patangaa jal mare, samajh

n aae baat

·

prem

n maane neetiyaan, aur n

reeti riwaaj

·

premee

kaa hotaa sadaa, ek

ढाई

अक्षर प्रेम के, गूढ

मगर है सार।

एक

शब्द की नींव पर, टिका

हुआ संसार।

प्रेम

तृप्ति का रूप है, प्रेम

अधूरी प्यास।

इसके

मालिक आप हैं, आप

इसीके दास।

प्रेम

न माँगे सम्पदा, और न

माँगे भोग।

जग

बैरी उसके लिए, जिसे

प्रेम का रोग।

प्रेम

अनोखी अगन है, हिय

सुलगे दिन रात।

स्वयं

पतंगा जल मरे, समझ

न आए बात।

प्रेम

न माने नीतियाँ, और न

रीति रिवाज।

प्रेमी

का होता सदा, एक

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗