कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना ६३ / ६७ № 63 of 67 रचना ६३ / ६७
८ अक्तूबर २०१५ 8 October 2015 ८ अक्तूबर २०१५

जय बोले जो सत्य की jay bole jo saty kee जय बोले जो सत्य की

टिके

हुए हैं सत्य पर, धरती

औ’ आकाश।

॥

पर

झूठों का जूथ ये, बात

समझता काश!

॥

हमने

खुद ही झूठ को, पहनाया

है ताज।

॥

हम

ही ला सकते पुनः, सच

का खोया राज।

॥

हम

ही हैं जो झूठ की, पल

पल लेते ओट।

॥

फिर

चाहे देता रहे, हर

पल मन को चोट।

॥

किससे

करें शिकायतें, जब

खुद जिम्मेदार।

॥

शीश

नवाया झूठ को, दोषी

क्यों करतार।

॥

जप

करता जो झूठ का, कितना

वो नादान।

॥

क्षणिक

भोग ले सुख मगर, खो

देता

tike

hue hain saty par, dharatee

au’ aakaash

·

par

jhoothon kaa jooth ye, baat

samajhataa kaash!

·

hamane

khud hee jhooth ko, pahanaayaa

hai taaj

·

ham

hee laa sakate punah, sach

kaa khoyaa raaj

·

ham

hee hain jo jhooth kee, pal

pal lete ot

·

phir

chaahe detaa rahe, har

pal man ko chot

·

kisase

karen shikaayaten, jab

khud jimmedaar

·

sheesh

nawaayaa jhooth ko, doshee

kyon karataar

·

jap

karataa jo jhooth kaa, kitanaa

wo naadaan

·

kshanik

bhog le sukh magar, kho

detaa

टिके

हुए हैं सत्य पर, धरती

औ’ आकाश।

॥

पर

झूठों का जूथ ये, बात

समझता काश!

॥

हमने

खुद ही झूठ को, पहनाया

है ताज।

॥

हम

ही ला सकते पुनः, सच

का खोया राज।

॥

हम

ही हैं जो झूठ की, पल

पल लेते ओट।

॥

फिर

चाहे देता रहे, हर

पल मन को चोट।

॥

किससे

करें शिकायतें, जब

खुद जिम्मेदार।

॥

शीश

नवाया झूठ को, दोषी

क्यों करतार।

॥

जप

करता जो झूठ का, कितना

वो नादान।

॥

क्षणिक

भोग ले सुख मगर, खो

देता

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗