कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना २३ / ६५ № 23 of 65 रचना २३ / ६५
५ जुलाई २०१३ 5 July 2013 ५ जुलाई २०१३

कहते चम्पा पेड़ को kahate champaa ped ko कहते चम्पा पेड़ को

कहते चम्पा पेड़ को, जंगल का सिरमौर। चलता रहता साल भर, गुल खिलने का दौर। इसके फूलों का बड़ा, अलग एक अंदाज़। एक वृंत पर हर सुमन, करता एकल राज। यूँ तो खिलते पुष्प ये, पूरे बारह मास। लेकिन अंत बसंत का, इनका मौसम खास। गर्मी इनकी मीत है, इन्हें धूप से नेह। निखरे तपकर ताप से, कंचन वर्णी देह। जन जीवन जब छेड़ता, धूप-स्वेद से जंग। वन्य जीव

kahate champaa ped ko, jangal kaa siramaur chalataa rahataa saal bhar, gul khilane kaa daur isake phoolon kaa badaa, alag ek andaaz ek wriint par har suman, karataa ekal raaj yoon to khilate pushp ye, poore baarah maas lekin ant basant kaa, inakaa mausam khaas garmee inakee meet hai, inhen dhoop se neh nikhare tapakar taap se, kanchan warnee deh jan jeewan jab chedataa, dhoop-sved se jang wany jeew

कहते चम्पा पेड़ को, जंगल का सिरमौर। चलता रहता साल भर, गुल खिलने का दौर। इसके फूलों का बड़ा, अलग एक अंदाज़। एक वृंत पर हर सुमन, करता एकल राज। यूँ तो खिलते पुष्प ये, पूरे बारह मास। लेकिन अंत बसंत का, इनका मौसम खास। गर्मी इनकी मीत है, इन्हें धूप से नेह। निखरे तपकर ताप से, कंचन वर्णी देह। जन जीवन जब छेड़ता, धूप-स्वेद से जंग। वन्य जीव

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗