कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३२ / २०४ № 32 of 204 रचना ३२ / २०४
५ फ़रवरी २०१४ 5 February 2014 ५ फ़रवरी २०१४

बागों बुलाती है सुबह baagon bulaatee hai subah बागों बुलाती है सुबह

रात पर जय प्राप्त कर जब,

जगमगाती है सुबह।

किस तरह हारा अँधेरा, कह

सुनाती है सुबह।

त्याग बिस्तर, नित्य

तत्पर, एक नव ऊर्जा लिए,

लुत्फ लेने भोर का, बागों

बुलाती है सुबह।

कालिमा को काटकर, आह्वान

करती सूर्य का,

बाद बढ़कर,

कर्म-पथ पर, दिन बिताती है सुबह।

बन कभी तितली,

कभी चिड़िया, चमन में डोलती,

लॉन हरियल पर विचरती,

गुनगुनाती है सुबह।

फूल कलियाँ मुग्ध-मन,

रहते सजग सत्कार को,

क्यारियों फुलवारियों को,

खूब भाती है सुबह।

इस मधुर बेला को जीने, “कल्पना” उठ चल पड़ें,

रंग जीवन के निहारें, जो दिखाती है सुबह।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

raat par jay praapt kar jab,

jagamagaatee hai subah

·

kis tarah haaraa andheraa, kah

sunaatee hai subah

·

tyaag bistar, nity

tatpar, ek naw oorjaa lie,

·

lutph lene bhor kaa, baagon

bulaatee hai subah

·

kaalimaa ko kaatakar, aahvaan

karatee soory kaa,

·

baad bढ़kar,

karm-path par, din bitaatee hai subah

·

ban kabhee titalee,

kabhee chidiyaa, chaman men dolatee,

·

lॉn hariyal par wicharatee,

gunagunaatee hai subah

·

phool kaliyaan mugdh-man,

rahate sajag satkaar ko,

·

kyaariyon phulawaariyon ko,

khoob bhaatee hai subah

·

is madhur belaa ko jeene, “kalpanaa” uth chal paden,

·

rang jeewan ke nihaaren, jo dikhaatee hai subah

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

रात पर जय प्राप्त कर जब,

जगमगाती है सुबह।

किस तरह हारा अँधेरा, कह

सुनाती है सुबह।

त्याग बिस्तर, नित्य

तत्पर, एक नव ऊर्जा लिए,

लुत्फ लेने भोर का, बागों

बुलाती है सुबह।

कालिमा को काटकर, आह्वान

करती सूर्य का,

बाद बढ़कर,

कर्म-पथ पर, दिन बिताती है सुबह।

बन कभी तितली,

कभी चिड़िया, चमन में डोलती,

लॉन हरियल पर विचरती,

गुनगुनाती है सुबह।

फूल कलियाँ मुग्ध-मन,

रहते सजग सत्कार को,

क्यारियों फुलवारियों को,

खूब भाती है सुबह।

इस मधुर बेला को जीने, “कल्पना” उठ चल पड़ें,

रंग जीवन के निहारें, जो दिखाती है सुबह।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗