बदले हो तुम तो है क्या... badale ho tum to hai kyaa बदले हो तुम तो है क्या...
बदले हो तुम, तो
है क्या, मैं भी बदल जाऊँगी।
दायरा तोड़ कहीं और निकल जाऊँगी।
एक चट्टान हूँ मैं,
मोम नहीं याद रहे।
जो छुअन भर से तुम्हारी,
ही पिघल जाऊँगी।
जब बिना बात के नाराज़ हो दरका दर्पण।
मेरा चेहरा है वही, क्यों मैं दहल जाऊँगी?
मैं तो बेफिक्र थी, मासूम
सा दिल देके तुम्हें।
क्या खबर थी कि मैं यूँ, खुद
को ही छल जाऊँगी।
वक्त पर होश मुझे आ गया अच्छा ये हुआ।
ठोकरें खा के मुहब्बत में सँभल जाऊँगी।
दर अगर बंद हुआ एक,
तो हैं और अनेक।
चलते-चलते ही नए दौर में ढल जाऊँगी।
किसी गफलत में न रहना,
कि अकेली हूँ सुनो।
साथ मैं एक सखी लेके गज़ल जाऊँगी।
जो मुझे आज तलक,
तुमने दिये हैं तोहफे।
वे तुम्हारे ही लिए छोड़ सकल जाऊँगी।
‘कल्पना’ सोच
के रक्खा है जिगर पर पत्थर।
पी के इक बार जुदाई का गरल जाऊँगी।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
badale ho tum, to
hai kyaa, main bhee badal jaaoongee
daayaraa tod kaheen aur nikal jaaoongee
ek chattaan hoon main,
mom naheen yaad rahe
jo chuan bhar se tumhaaree,
hee pighal jaaoongee
jab binaa baat ke naaraaz ho darakaa darpan
meraa cheharaa hai wahee, kyon main dahal jaaoongee?
main to bephikr thee, maasoom
saa dil deke tumhen
kyaa khabar thee ki main yoon, khud
ko hee chal jaaoongee
wakt par hosh mujhe aa gayaa achchaa ye huaa
thokaren khaa ke muhabbat men sanbhal jaaoongee
dar agar band huaa ek,
to hain aur anek
chalate-chalate hee nae daur men dhal jaaoongee
kisee gaphalat men n rahanaa,
ki akelee hoon suno
saath main ek sakhee leke gazal jaaoongee
jo mujhe aaj talak,
tumane diye hain tohaphe
we tumhaare hee lie chod sakal jaaoongee
‘kalpanaa’ soch
ke rakkhaa hai jigar par patthar
pee ke ik baar judaaee kaa garal jaaoongee
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
बदले हो तुम, तो
है क्या, मैं भी बदल जाऊँगी।
दायरा तोड़ कहीं और निकल जाऊँगी।
एक चट्टान हूँ मैं,
मोम नहीं याद रहे।
जो छुअन भर से तुम्हारी,
ही पिघल जाऊँगी।
जब बिना बात के नाराज़ हो दरका दर्पण।
मेरा चेहरा है वही, क्यों मैं दहल जाऊँगी?
मैं तो बेफिक्र थी, मासूम
सा दिल देके तुम्हें।
क्या खबर थी कि मैं यूँ, खुद
को ही छल जाऊँगी।
वक्त पर होश मुझे आ गया अच्छा ये हुआ।
ठोकरें खा के मुहब्बत में सँभल जाऊँगी।
दर अगर बंद हुआ एक,
तो हैं और अनेक।
चलते-चलते ही नए दौर में ढल जाऊँगी।
किसी गफलत में न रहना,
कि अकेली हूँ सुनो।
साथ मैं एक सखी लेके गज़ल जाऊँगी।
जो मुझे आज तलक,
तुमने दिये हैं तोहफे।
वे तुम्हारे ही लिए छोड़ सकल जाऊँगी।
‘कल्पना’ सोच
के रक्खा है जिगर पर पत्थर।
पी के इक बार जुदाई का गरल जाऊँगी।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी