कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८८ / २०४ № 188 of 204 रचना १८८ / २०४
१ फ़रवरी २०२० 1 February 2020 १ फ़रवरी २०२०

बसंत आया है basant aayaa hai बसंत आया है

डाल-डाल पर गुल खिले,  बसंत आया है।

पात-पात हँसकर कहे,  बसंत आया है।

चारु चंद्र की चाँदनी,  विहार को उतरी।

स्वर्ग लोक भू पर दिखे,  बसंत आया है।

सुर के साथ ठंडी हवा,  फिज़ाओं में बिखरी

तार-तार मन का गुने,  बसंत आया है।

बाग-बीच कलिकाओं से, किलोल भँवरोंकी

फूल-फूल तितली उड़े,  बसंत आया है।

कुंज कुंज में कोकिला,  खुमार से कुहकी।

आम्र बौर तरु पर लदे,  बसंत आया है।

खूब दृष्टि को भा रहा,  उफान नदियों का।

धार-धार को सुर मिले,  बसंत आया है।

स्वर्ण वर्ण सरसों खिली,  विशाल खेतों में।

लख किसान पुलकित हुए,  बसंत आया है।

नम हवाओं के स्पर्श से,  प्रसन्न है वसुधा।

बीज-बीज अंकुर उगे,  बसंत आया है।

सृष्टि रूप नव से जगी,  उमंग जीवन में।

पर्व काश! घर घर मने,  बसंत आया है।

daal-daal par gul khile, basant aayaa hai

paat-paat hansakar kahe, basant aayaa hai

·

chaaru chandr kee chaandanee, wihaar ko utaree

svarg lok bhoo par dikhe, basant aayaa hai

·

sur ke saath thandee hawaa, phizaaon men bikharee

taar-taar man kaa gune, basant aayaa hai

·

baag-beech kalikaaon se, kilol bhanvaronkee

phool-phool titalee ude, basant aayaa hai

·

kunj kunj men kokilaa, khumaar se kuhakee

aamr baur taru par lade, basant aayaa hai

·

khoob driishti ko bhaa rahaa, uphaan nadiyon kaa

dhaar-dhaar ko sur mile, basant aayaa hai

·

svarn warn sarason khilee, wishaal kheton men

lakh kisaan pulakit hue, basant aayaa hai

·

nam hawaaon ke sparsh se, prasann hai wasudhaa

beej-beej ankur uge, basant aayaa hai

·

sriishti roop naw se jagee, umang jeewan men

parv kaash! ghar ghar mane, basant aayaa hai

डाल-डाल पर गुल खिले,  बसंत आया है।

पात-पात हँसकर कहे,  बसंत आया है।

चारु चंद्र की चाँदनी,  विहार को उतरी।

स्वर्ग लोक भू पर दिखे,  बसंत आया है।

सुर के साथ ठंडी हवा,  फिज़ाओं में बिखरी

तार-तार मन का गुने,  बसंत आया है।

बाग-बीच कलिकाओं से, किलोल भँवरोंकी

फूल-फूल तितली उड़े,  बसंत आया है।

कुंज कुंज में कोकिला,  खुमार से कुहकी।

आम्र बौर तरु पर लदे,  बसंत आया है।

खूब दृष्टि को भा रहा,  उफान नदियों का।

धार-धार को सुर मिले,  बसंत आया है।

स्वर्ण वर्ण सरसों खिली,  विशाल खेतों में।

लख किसान पुलकित हुए,  बसंत आया है।

नम हवाओं के स्पर्श से,  प्रसन्न है वसुधा।

बीज-बीज अंकुर उगे,  बसंत आया है।

सृष्टि रूप नव से जगी,  उमंग जीवन में।

पर्व काश! घर घर मने,  बसंत आया है।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗