कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १८७ / २०४ № 187 of 204 रचना १८७ / २०४
२६ जनवरी २०२० 26 January 2020 २६ जनवरी २०२०

ऋतु स्वरांत्रता की है riitu svaraantrataa kee hai ऋतु स्वरांत्रता की है

फना हुईं गुलामियाँ

ये ऋतु स्वतन्त्रता की है

अमन की बात बोलिए

कि प्रात, वंदना की है

लपेट लोभ, छल-कपट

बिछी हुई हैं गोटियाँ

अखंड जीत हो कि ये

बिसात, दासता की है

मिटे जो देश के लिए

शहीद, उनकी याद में

जलाएँ इक दिया पुनः

ये रात प्रार्थना की है

रहें न वे अपूर्ण अब

स्वतंत्र राजतंत्र में

जो ख्वाब हर सपूत के

जो आस हर सुता की है

भुलाके द्वेष-क्लेश सब

करें नमन निशान को

सुयोग से मिली हमें

ये भू परम्परा की है

सदय बनें, सुदृढ़ बनें

हृदय उतार लें चलो

हवाओं में घुली हुई

जो सीख हर ऋचा की है

करें न अंध अनुकरण

विदेशी रीति-नीति का

स्वदेश की पुकार ये

गुहार माँ धरा की है

रुकें न पग प्रयास के

झुके न अब ध्वजा कभी

बनी रहे स्वतन्त्रता

ये चाह ‘कल्पना’ की है

-कल्पना रामानी

phanaa hueen gulaamiyaan

ye riitu svatantrataa kee hai

aman kee baat bolie

ki praat, wandanaa kee hai

·

lapet lobh, chal-kapat

bichee huee hain gotiyaan

akhand jeet ho ki ye

bisaat, daasataa kee hai

·

mite jo desh ke lie

shaheed, unakee yaad men

jalaaen ik diyaa punah

ye raat praarthanaa kee hai

·

rahen n we apoorn ab

svatantr raajatantr men

jo khvaab har sapoot ke

jo aas har sutaa kee hai

·

bhulaake dvesh-klesh sab

karen naman nishaan ko

suyog se milee hamen

ye bhoo paramparaa kee hai

·

saday banen, sudriiढ़ banen

hriiday utaar len chalo

hawaaon men ghulee huee

jo seekh har riichaa kee hai

·

karen n andh anukaran

wideshee reeti-neeti kaa

svadesh kee pukaar ye

guhaar maan dharaa kee hai

·

ruken n pag prayaas ke

jhuke n ab dhvajaa kabhee

banee rahe svatantrataa

ye chaah ‘kalpanaa’ kee hai

·

-kalpanaa raamaanee

फना हुईं गुलामियाँ

ये ऋतु स्वतन्त्रता की है

अमन की बात बोलिए

कि प्रात, वंदना की है

लपेट लोभ, छल-कपट

बिछी हुई हैं गोटियाँ

अखंड जीत हो कि ये

बिसात, दासता की है

मिटे जो देश के लिए

शहीद, उनकी याद में

जलाएँ इक दिया पुनः

ये रात प्रार्थना की है

रहें न वे अपूर्ण अब

स्वतंत्र राजतंत्र में

जो ख्वाब हर सपूत के

जो आस हर सुता की है

भुलाके द्वेष-क्लेश सब

करें नमन निशान को

सुयोग से मिली हमें

ये भू परम्परा की है

सदय बनें, सुदृढ़ बनें

हृदय उतार लें चलो

हवाओं में घुली हुई

जो सीख हर ऋचा की है

करें न अंध अनुकरण

विदेशी रीति-नीति का

स्वदेश की पुकार ये

गुहार माँ धरा की है

रुकें न पग प्रयास के

झुके न अब ध्वजा कभी

बनी रहे स्वतन्त्रता

ये चाह ‘कल्पना’ की है

-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗