कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९७ / २०५ № 97 of 205 रचना ९७ / २०५
१२ जुलाई २०१५ 12 July 2015 १२ जुलाई २०१५

बेला खिले belaa khile बेला खिले

मृदु-मधुर

झोंके हवा के, कह गये, बेला खिले

॥

धूप

सहते तन महक से तर हुए, बेला खिले

॥

गंध

पुरवा में घुली ज्यों, झूम उठी हर-मन कली

॥

सैर

को लाखों कदम बढ़ते दिखे, बेला खिले

॥

फूल

चुनने चल पड़ी डलिया लिए मालिन मगन

॥

है

उमंगित, आ गए दिन, मद भरे, बेला

खिले

॥

रश्क

करती रात-रानी, मूँद लेती तब नयन

॥

प्रात

में हैं जब बुलाते, प्यार से बेला खिले

॥

दंग

रह जाते हैं गुल, चम्पा-चमेली या गुलाब

॥

जब

धरा की गोद में वे, देखते बेला खिले

॥

देख

दर्पण मुग्ध हो, शृंगार करती रूपसी

॥

सोचती

है बाग में मेरे लिए बेला खिले

॥

कामिनी

से कंत बोला, सेज कलियों से सजा

॥

दिन

विरह के लद गए अब, सुन प्रिये! बेला खिले

॥

अब

नहीं दिखते कहीं बहुमंज़िलों में ये सुमन

॥

‘कल्पना’ मेरा ये मन कैसे कहे,

बेला खिले

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

mriidu-madhur

jhonke hawaa ke, kah gaye, belaa khile

·

dhoop

sahate tan mahak se tar hue, belaa khile

·

gandh

purawaa men ghulee jyon, jhoom uthee har-man kalee

·

sair

ko laakhon kadam bढ़te dikhe, belaa khile

·

phool

chunane chal padee daliyaa lie maalin magan

·

hai

umangit, aa gae din, mad bhare, belaa

khile

·

rashk

karatee raat-raanee, moond letee tab nayan

·

praat

men hain jab bulaate, pyaar se belaa khile

·

dang

rah jaate hain gul, champaa-chamelee yaa gulaab

·

jab

dharaa kee god men we, dekhate belaa khile

·

dekh

darpan mugdh ho, shriingaar karatee roopasee

·

sochatee

hai baag men mere lie belaa khile

·

kaaminee

se kant bolaa, sej kaliyon se sajaa

·

din

wirah ke lad gae ab, sun priye! belaa khile

·

ab

naheen dikhate kaheen bahumanzilon men ye suman

·

‘kalpanaa’ meraa ye man kaise kahe,

belaa khile

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

मृदु-मधुर

झोंके हवा के, कह गये, बेला खिले

॥

धूप

सहते तन महक से तर हुए, बेला खिले

॥

गंध

पुरवा में घुली ज्यों, झूम उठी हर-मन कली

॥

सैर

को लाखों कदम बढ़ते दिखे, बेला खिले

॥

फूल

चुनने चल पड़ी डलिया लिए मालिन मगन

॥

है

उमंगित, आ गए दिन, मद भरे, बेला

खिले

॥

रश्क

करती रात-रानी, मूँद लेती तब नयन

॥

प्रात

में हैं जब बुलाते, प्यार से बेला खिले

॥

दंग

रह जाते हैं गुल, चम्पा-चमेली या गुलाब

॥

जब

धरा की गोद में वे, देखते बेला खिले

॥

देख

दर्पण मुग्ध हो, शृंगार करती रूपसी

॥

सोचती

है बाग में मेरे लिए बेला खिले

॥

कामिनी

से कंत बोला, सेज कलियों से सजा

॥

दिन

विरह के लद गए अब, सुन प्रिये! बेला खिले

॥

अब

नहीं दिखते कहीं बहुमंज़िलों में ये सुमन

॥

‘कल्पना’ मेरा ये मन कैसे कहे,

बेला खिले

॥

-कल्पना रामानी

॥

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗