कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २३ / २०४ № 23 of 204 रचना २३ / २०४
९ दिसम्बर २०१३ 9 December 2013 ९ दिसम्बर २०१३

भोर का तारा छिपा जाने किधर है bhor kaa taaraa chipaa jaane kidhar hai भोर का तारा छिपा जाने किधर है

आज

खबरों में जहाँ जाती नज़र है।

रक्त

में डूबी हुई, होती खबर है।

फिर

रहा है दिन उजाले को छिपाकर,

रात

पूनम पर अमावस की मुहर है।

ढूँढते

हैं दीप लेकर लोग उसको,

भोर

का तारा छिपा जाने किधर है।

डर

रहे हैं रास्ते मंज़िल दिखाते,

मंज़िलों

पर खौफ का दिखता कहर है।

खो

चुके हैं नद-नदी रफ्तार अपनी,

साहिलों

की ओट छिपती हर लहर है।

साज़

हैं खामोश, चुप है रागिनी भी,

गीत

गुमसुम, मूक सुर, बेबस बहर है।

हसरतों

के फूल चुनता मन का माली,

नफरतों

के शूल बुनती सेज पर है।

आज

मेरा देश क्यों भयभीत इतना,

हर

गली सुनसान, सहमा हर शहर है।

---------- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

aaj

khabaron men jahaan jaatee nazar hai

·

rakt

men doobee huee, hotee khabar hai

·

phir

rahaa hai din ujaale ko chipaakar,

·

raat

poonam par amaawas kee muhar hai

·

dhoondhate

hain deep lekar log usako,

·

bhor

kaa taaraa chipaa jaane kidhar hai

·

dar

rahe hain raaste manzil dikhaate,

·

manzilon

par khauph kaa dikhataa kahar hai

·

kho

chuke hain nad-nadee raphtaar apanee,

·

saahilon

kee ot chipatee har lahar hai

·

saaz

hain khaamosh, chup hai raaginee bhee,

·

geet

gumasum, mook sur, bebas bahar hai

·

hasaraton

ke phool chunataa man kaa maalee,

·

napharaton

ke shool bunatee sej par hai

·

aaj

meraa desh kyon bhayabheet itanaa,

·

har

galee sunasaan, sahamaa har shahar hai

·

---------- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

आज

खबरों में जहाँ जाती नज़र है।

रक्त

में डूबी हुई, होती खबर है।

फिर

रहा है दिन उजाले को छिपाकर,

रात

पूनम पर अमावस की मुहर है।

ढूँढते

हैं दीप लेकर लोग उसको,

भोर

का तारा छिपा जाने किधर है।

डर

रहे हैं रास्ते मंज़िल दिखाते,

मंज़िलों

पर खौफ का दिखता कहर है।

खो

चुके हैं नद-नदी रफ्तार अपनी,

साहिलों

की ओट छिपती हर लहर है।

साज़

हैं खामोश, चुप है रागिनी भी,

गीत

गुमसुम, मूक सुर, बेबस बहर है।

हसरतों

के फूल चुनता मन का माली,

नफरतों

के शूल बुनती सेज पर है।

आज

मेरा देश क्यों भयभीत इतना,

हर

गली सुनसान, सहमा हर शहर है।

---------- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗