बोल उठा भू का तन प्यासा bol uthaa bhoo kaa tan pyaasaa बोल उठा भू का तन प्यासा
बोल
उठा भू का तन प्यासा
घन
बरसो, जग-जीवन प्यासा
आस
लगी इस मानसून पर
रह
जाए न कृषक-मन प्यासा
कब
से नभ को ताक रहा है
कर
तरणी धर, बचपन प्यासा
किलकेंगे
प्यारे गुल कितने
अगर
न हो कोई गुलशन प्यासा
मंगल
वर्षा हो यदि वन में
तरसे
क्यों जीवांगन प्यासा
पिहू, कुहू औ’ मोर चकोरी
का
अब तक है नर्तन प्यासा
तैरा
करते धनिक साल भर
रह
जाता तन-निर्धन प्यासा
जाता
है हर मौसम में क्यों
या
अषाढ़ या सावन प्यासा
चाह
‘कल्पना’ सुनो बादलों
अब
की रहे कोई जीव, न प्यासा
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
bol
uthaa bhoo kaa tan pyaasaa
ghan
baraso, jag-jeewan pyaasaa
aas
lagee is maanasoon par
rah
jaae n kriishak-man pyaasaa
kab
se nabh ko taak rahaa hai
kar
taranee dhar, bachapan pyaasaa
kilakenge
pyaare gul kitane
agar
n ho koee gulashan pyaasaa
mangal
warshaa ho yadi wan men
tarase
kyon jeewaangan pyaasaa
pihoo, kuhoo au’ mor chakoree
kaa
ab tak hai nartan pyaasaa
tairaa
karate dhanik saal bhar
rah
jaataa tan-nirdhan pyaasaa
jaataa
hai har mausam men kyon
yaa
ashaaढ़ yaa saawan pyaasaa
chaah
‘kalpanaa’ suno baadalon
ab
kee rahe koee jeew, n pyaasaa
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
बोल
उठा भू का तन प्यासा
घन
बरसो, जग-जीवन प्यासा
आस
लगी इस मानसून पर
रह
जाए न कृषक-मन प्यासा
कब
से नभ को ताक रहा है
कर
तरणी धर, बचपन प्यासा
किलकेंगे
प्यारे गुल कितने
अगर
न हो कोई गुलशन प्यासा
मंगल
वर्षा हो यदि वन में
तरसे
क्यों जीवांगन प्यासा
पिहू, कुहू औ’ मोर चकोरी
का
अब तक है नर्तन प्यासा
तैरा
करते धनिक साल भर
रह
जाता तन-निर्धन प्यासा
जाता
है हर मौसम में क्यों
या
अषाढ़ या सावन प्यासा
चाह
‘कल्पना’ सुनो बादलों
अब
की रहे कोई जीव, न प्यासा
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी