कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९४ / २०४ № 94 of 204 रचना ९४ / २०४
१३ जून २०१५ 13 June 2015 १३ जून २०१५

बोल उठा भू का तन प्यासा bol uthaa bhoo kaa tan pyaasaa बोल उठा भू का तन प्यासा

बोल

उठा भू का तन प्यासा

घन

बरसो, जग-जीवन प्यासा

आस

लगी इस मानसून पर

रह

जाए न कृषक-मन प्यासा

कब

से नभ को ताक रहा है

कर

तरणी धर, बचपन प्यासा

किलकेंगे

प्यारे गुल कितने

अगर

न हो कोई गुलशन प्यासा

मंगल

वर्षा हो यदि वन में

तरसे

क्यों जीवांगन प्यासा

पिहू, कुहू औ’ मोर चकोरी

का

अब तक है नर्तन प्यासा

तैरा

करते धनिक साल भर

रह

जाता तन-निर्धन प्यासा

जाता

है हर मौसम में क्यों

या

अषाढ़ या सावन प्यासा

चाह

‘कल्पना’ सुनो बादलों

अब

की रहे कोई जीव, न प्यासा

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

bol

uthaa bhoo kaa tan pyaasaa

·

ghan

baraso, jag-jeewan pyaasaa

·

aas

lagee is maanasoon par

·

rah

jaae n kriishak-man pyaasaa

·

kab

se nabh ko taak rahaa hai

·

kar

taranee dhar, bachapan pyaasaa

·

kilakenge

pyaare gul kitane

·

agar

n ho koee gulashan pyaasaa

·

mangal

warshaa ho yadi wan men

·

tarase

kyon jeewaangan pyaasaa

·

pihoo, kuhoo au’ mor chakoree

·

kaa

ab tak hai nartan pyaasaa

·

tairaa

karate dhanik saal bhar

·

rah

jaataa tan-nirdhan pyaasaa

·

jaataa

hai har mausam men kyon

·

yaa

ashaaढ़ yaa saawan pyaasaa

·

chaah

‘kalpanaa’ suno baadalon

·

ab

kee rahe koee jeew, n pyaasaa

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

बोल

उठा भू का तन प्यासा

घन

बरसो, जग-जीवन प्यासा

आस

लगी इस मानसून पर

रह

जाए न कृषक-मन प्यासा

कब

से नभ को ताक रहा है

कर

तरणी धर, बचपन प्यासा

किलकेंगे

प्यारे गुल कितने

अगर

न हो कोई गुलशन प्यासा

मंगल

वर्षा हो यदि वन में

तरसे

क्यों जीवांगन प्यासा

पिहू, कुहू औ’ मोर चकोरी

का

अब तक है नर्तन प्यासा

तैरा

करते धनिक साल भर

रह

जाता तन-निर्धन प्यासा

जाता

है हर मौसम में क्यों

या

अषाढ़ या सावन प्यासा

चाह

‘कल्पना’ सुनो बादलों

अब

की रहे कोई जीव, न प्यासा

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗