कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ८ / २०४ № 8 of 204 रचना ८ / २०४
४ अगस्त २०१३ 4 August 2013 ४ अगस्त २०१३

बुला रही फुहार है bulaa rahee phuhaar hai बुला रही फुहार है

बदलती ऋतु की रागिनी,

सुना रही फुहार है।

उड़ी सुगंध बाग में,

बुला रही फुहार है।

कहीं घटा घनी-घनी, कहीं पे धूप है खिली

लुका-छुपी के खेल से, रिझा रही फुहार है।

अमा है चाँद रात भी, है साँवली प्रभात भी

अनूप रूप सृष्टि का, दिखा रही फुहार है।

वनों में पेड़-पेड़ पर, पखेरुओं को छेड़कर

बुलंद छंद कान में, सुना रही फुहार है।

चमन के पात-पात पर, कली-कली के गात पर

बिसात बूँद-बूँद से, बिछा रही फुहार है।

पहाड़ पर कछार में, नदी-नदीश धार में

जहाँ-तहाँ बहार में, नहा रही फुहार है।

सहर्ष होगी बोवनी,

भरेगी गोद भूमि की

किसान संग-संग हल,

चला रही फुहार है।

मयूर नृत्य में मगन, कुहुक रही है कोकिला

सुरों में सुर मिलाके गीत, गा रही फुहार है।

झुला रही है शाख पे, सहेलियों को झूलना

घरों में पर्व प्यार से, मना रही हैं फुहार है।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

badalatee riitu kee raaginee,

sunaa rahee phuhaar hai

·

udee sugandh baag men,

bulaa rahee phuhaar hai

·

kaheen ghataa ghanee-ghanee, kaheen pe dhoop hai khilee

·

lukaa-chupee ke khel se, rijhaa rahee phuhaar hai

·

amaa hai chaand raat bhee, hai saanvalee prabhaat bhee

·

anoop roop sriishti kaa, dikhaa rahee phuhaar hai

·

wanon men ped-ped par, pakheruon ko chedakar

·

buland chand kaan men, sunaa rahee phuhaar hai

·

chaman ke paat-paat par, kalee-kalee ke gaat par

·

bisaat boond-boond se, bichaa rahee phuhaar hai

·

pahaad par kachaar men, nadee-nadeesh dhaar men

·

jahaan-tahaan bahaar men, nahaa rahee phuhaar hai

·

saharsh hogee bowanee,

bharegee god bhoomi kee

·

kisaan sang-sang hal,

chalaa rahee phuhaar hai

·

mayoor nriity men magan, kuhuk rahee hai kokilaa

·

suron men sur milaake geet, gaa rahee phuhaar hai

·

jhulaa rahee hai shaakh pe, saheliyon ko jhoolanaa

·

gharon men parv pyaar se, manaa rahee hain phuhaar hai

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

बदलती ऋतु की रागिनी,

सुना रही फुहार है।

उड़ी सुगंध बाग में,

बुला रही फुहार है।

कहीं घटा घनी-घनी, कहीं पे धूप है खिली

लुका-छुपी के खेल से, रिझा रही फुहार है।

अमा है चाँद रात भी, है साँवली प्रभात भी

अनूप रूप सृष्टि का, दिखा रही फुहार है।

वनों में पेड़-पेड़ पर, पखेरुओं को छेड़कर

बुलंद छंद कान में, सुना रही फुहार है।

चमन के पात-पात पर, कली-कली के गात पर

बिसात बूँद-बूँद से, बिछा रही फुहार है।

पहाड़ पर कछार में, नदी-नदीश धार में

जहाँ-तहाँ बहार में, नहा रही फुहार है।

सहर्ष होगी बोवनी,

भरेगी गोद भूमि की

किसान संग-संग हल,

चला रही फुहार है।

मयूर नृत्य में मगन, कुहुक रही है कोकिला

सुरों में सुर मिलाके गीत, गा रही फुहार है।

झुला रही है शाख पे, सहेलियों को झूलना

घरों में पर्व प्यार से, मना रही हैं फुहार है।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗