बुला रही फुहार है bulaa rahee phuhaar hai बुला रही फुहार है
बदलती ऋतु की रागिनी,
सुना रही फुहार है।
उड़ी सुगंध बाग में,
बुला रही फुहार है।
कहीं घटा घनी-घनी, कहीं पे धूप है खिली
लुका-छुपी के खेल से, रिझा रही फुहार है।
अमा है चाँद रात भी, है साँवली प्रभात भी
अनूप रूप सृष्टि का, दिखा रही फुहार है।
वनों में पेड़-पेड़ पर, पखेरुओं को छेड़कर
बुलंद छंद कान में, सुना रही फुहार है।
चमन के पात-पात पर, कली-कली के गात पर
बिसात बूँद-बूँद से, बिछा रही फुहार है।
पहाड़ पर कछार में, नदी-नदीश धार में
जहाँ-तहाँ बहार में, नहा रही फुहार है।
सहर्ष होगी बोवनी,
भरेगी गोद भूमि की
किसान संग-संग हल,
चला रही फुहार है।
मयूर नृत्य में मगन, कुहुक रही है कोकिला
सुरों में सुर मिलाके गीत, गा रही फुहार है।
झुला रही है शाख पे, सहेलियों को झूलना
घरों में पर्व प्यार से, मना रही हैं फुहार है।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
badalatee riitu kee raaginee,
sunaa rahee phuhaar hai
udee sugandh baag men,
bulaa rahee phuhaar hai
kaheen ghataa ghanee-ghanee, kaheen pe dhoop hai khilee
lukaa-chupee ke khel se, rijhaa rahee phuhaar hai
amaa hai chaand raat bhee, hai saanvalee prabhaat bhee
anoop roop sriishti kaa, dikhaa rahee phuhaar hai
wanon men ped-ped par, pakheruon ko chedakar
buland chand kaan men, sunaa rahee phuhaar hai
chaman ke paat-paat par, kalee-kalee ke gaat par
bisaat boond-boond se, bichaa rahee phuhaar hai
pahaad par kachaar men, nadee-nadeesh dhaar men
jahaan-tahaan bahaar men, nahaa rahee phuhaar hai
saharsh hogee bowanee,
bharegee god bhoomi kee
kisaan sang-sang hal,
chalaa rahee phuhaar hai
mayoor nriity men magan, kuhuk rahee hai kokilaa
suron men sur milaake geet, gaa rahee phuhaar hai
jhulaa rahee hai shaakh pe, saheliyon ko jhoolanaa
gharon men parv pyaar se, manaa rahee hain phuhaar hai
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
बदलती ऋतु की रागिनी,
सुना रही फुहार है।
उड़ी सुगंध बाग में,
बुला रही फुहार है।
कहीं घटा घनी-घनी, कहीं पे धूप है खिली
लुका-छुपी के खेल से, रिझा रही फुहार है।
अमा है चाँद रात भी, है साँवली प्रभात भी
अनूप रूप सृष्टि का, दिखा रही फुहार है।
वनों में पेड़-पेड़ पर, पखेरुओं को छेड़कर
बुलंद छंद कान में, सुना रही फुहार है।
चमन के पात-पात पर, कली-कली के गात पर
बिसात बूँद-बूँद से, बिछा रही फुहार है।
पहाड़ पर कछार में, नदी-नदीश धार में
जहाँ-तहाँ बहार में, नहा रही फुहार है।
सहर्ष होगी बोवनी,
भरेगी गोद भूमि की
किसान संग-संग हल,
चला रही फुहार है।
मयूर नृत्य में मगन, कुहुक रही है कोकिला
सुरों में सुर मिलाके गीत, गा रही फुहार है।
झुला रही है शाख पे, सहेलियों को झूलना
घरों में पर्व प्यार से, मना रही हैं फुहार है।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी