कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९ / २०४ № 9 of 204 रचना ९ / २०४
४ अगस्त २०१३ 4 August 2013 ४ अगस्त २०१३

कैसे सुफल पाएँगे आप kaise suphal paaenge aap कैसे सुफल पाएँगे आप

हक़ किसी का छीनकर, कैसे सुफल पाएँगे आप?

बीज जैसे बो रहे, वैसी फसल पाएँगे आप।

यों अगर जलते रहे, कालिख भरे मन के दिये

बंधुवर! सच मानिए, निज अंध कल पाएँगे आप।

भूलकर अमृत वचन, यदि विष उगलते ही रहे

फिर निगलने के लिए भी, घट-गरल पाएँगे आप।

निर्बलों की नाव गर, मझधार मोड़ी आपने

दैव्य के इंसाफ से,

बचकर न चल पाएँगे आप।

प्यार देकर प्यार लें, आनंद पल-पल बाँटिए

मित्र!

तय है तृप्त मन, आनंद-पल पाएँगे आप।

शुद्ध भावों से रचें,

कोमल गज़ल के काफिये

क्षुब्ध मन के पंक में, खिलते कमल पाएँगे आप।

याद हो वेदों की भाषा, मान संस्कृति का भी हो

हे मनुज! सम्मान का, विस्तृत पटल पाएँगे आप।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

haq kisee kaa cheenakar, kaise suphal paaenge aap?

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beej jaise bo rahe, waisee phasal paaenge aap

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yon agar jalate rahe, kaalikh bhare man ke diye

·

bandhuwar! sach maanie, nij andh kal paaenge aap

·

bhoolakar amriit wachan, yadi wish ugalate hee rahe

·

phir nigalane ke lie bhee, ghat-garal paaenge aap

·

nirbalon kee naaw gar, majhadhaar modee aapane

·

daivy ke insaaph se,

bachakar n chal paaenge aap

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pyaar dekar pyaar len, aanand pal-pal baantie

·

mitr!

tay hai triipt man, aanand-pal paaenge aap

·

shuddh bhaawon se rachen,

komal gazal ke kaaphiye

·

kshubdh man ke pank men, khilate kamal paaenge aap

·

yaad ho wedon kee bhaashaa, maan sanskriiti kaa bhee ho

·

he manuj! sammaan kaa, wistriit patal paaenge aap

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हक़ किसी का छीनकर, कैसे सुफल पाएँगे आप?

बीज जैसे बो रहे, वैसी फसल पाएँगे आप।

यों अगर जलते रहे, कालिख भरे मन के दिये

बंधुवर! सच मानिए, निज अंध कल पाएँगे आप।

भूलकर अमृत वचन, यदि विष उगलते ही रहे

फिर निगलने के लिए भी, घट-गरल पाएँगे आप।

निर्बलों की नाव गर, मझधार मोड़ी आपने

दैव्य के इंसाफ से,

बचकर न चल पाएँगे आप।

प्यार देकर प्यार लें, आनंद पल-पल बाँटिए

मित्र!

तय है तृप्त मन, आनंद-पल पाएँगे आप।

शुद्ध भावों से रचें,

कोमल गज़ल के काफिये

क्षुब्ध मन के पंक में, खिलते कमल पाएँगे आप।

याद हो वेदों की भाषा, मान संस्कृति का भी हो

हे मनुज! सम्मान का, विस्तृत पटल पाएँगे आप।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗