कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १० / २०४ № 10 of 204 रचना १० / २०४
४ अगस्त २०१३ 4 August 2013 ४ अगस्त २०१३

सुनहरी भोर बागों में sunaharee bhor baagon men सुनहरी भोर बागों में

सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें!

नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें!

चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं,

सुरों में साथ देती हैं, सुहानी ओस की बूँदें!

चितेरा कौन है जो रात, में जाजम बिछा जाता,

न जाने रैन कब बुनती,

अकेली ओस की बूँदें!

करिश्मा है ये कुदरत का, या फिर जादू कोई उसका

घुमाकर जो छड़ी कोई,

गिराती ओस की बूँदें!

नवल सूरज की किरणों में, छिपी होती हैं ये शायद

जो पुरवाई पवन लाती,

सुधा सी ओस की बूँदें!

टहलने चल पड़ें मित्रों, प्रकृति के रूप को निरखें

न जाने कब बिखर जाएँ, फरेबी ओस की बूँदें!

- कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

sunaharee bhor baagon men, bichaatee os kee boonden!

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nayan kaa noor hotee hain, nawelee os kee boonden!

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chapal bhanvaron kee kaliyon se, chuhal par mugdh see hoteen,

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suron men saath detee hain, suhaanee os kee boonden!

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chiteraa kaun hai jo raat, men jaajam bichaa jaataa,

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n jaane rain kab bunatee,

akelee os kee boonden!

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karishmaa hai ye kudarat kaa, yaa phir jaadoo koee usakaa

·

ghumaakar jo chadee koee,

giraatee os kee boonden!

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nawal sooraj kee kiranon men, chipee hotee hain ye shaayad

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jo purawaaee pawan laatee,

sudhaa see os kee boonden!

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tahalane chal paden mitron, prakriiti ke roop ko nirakhen

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n jaane kab bikhar jaaen, pharebee os kee boonden!

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- kalpanaa raamaanee

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें!

नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें!

चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं,

सुरों में साथ देती हैं, सुहानी ओस की बूँदें!

चितेरा कौन है जो रात, में जाजम बिछा जाता,

न जाने रैन कब बुनती,

अकेली ओस की बूँदें!

करिश्मा है ये कुदरत का, या फिर जादू कोई उसका

घुमाकर जो छड़ी कोई,

गिराती ओस की बूँदें!

नवल सूरज की किरणों में, छिपी होती हैं ये शायद

जो पुरवाई पवन लाती,

सुधा सी ओस की बूँदें!

टहलने चल पड़ें मित्रों, प्रकृति के रूप को निरखें

न जाने कब बिखर जाएँ, फरेबी ओस की बूँदें!

- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗