कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ११ / २०५ № 11 of 205 रचना ११ / २०५
४ अगस्त २०१३ 4 August 2013 ४ अगस्त २०१३

सुनहरी भोर बागों में sunaharee bhor baagon men सुनहरी भोर बागों में

सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें!

॥

नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें!

॥

चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं,

॥

सुरों में साथ देती हैं, सुहानी ओस की बूँदें!

॥

चितेरा कौन है जो रात, में जाजम बिछा जाता,

॥

न जाने रैन कब बुनती,

अकेली ओस की बूँदें!

॥

करिश्मा है ये कुदरत का, या फिर जादू कोई उसका

॥

घुमाकर जो छड़ी कोई,

गिराती ओस की बूँदें!

॥

नवल सूरज की किरणों में, छिपी होती हैं ये शायद

॥

जो पुरवाई पवन लाती,

सुधा सी ओस की बूँदें!

॥

टहलने चल पड़ें मित्रों, प्रकृति के रूप को निरखें

॥

न जाने कब बिखर जाएँ, फरेबी ओस की बूँदें!

॥

- कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

sunaharee bhor baagon men, bichaatee os kee boonden!

·

nayan kaa noor hotee hain, nawelee os kee boonden!

·

chapal bhanvaron kee kaliyon se, chuhal par mugdh see hoteen,

·

suron men saath detee hain, suhaanee os kee boonden!

·

chiteraa kaun hai jo raat, men jaajam bichaa jaataa,

·

n jaane rain kab bunatee,

akelee os kee boonden!

·

karishmaa hai ye kudarat kaa, yaa phir jaadoo koee usakaa

·

ghumaakar jo chadee koee,

giraatee os kee boonden!

·

nawal sooraj kee kiranon men, chipee hotee hain ye shaayad

·

jo purawaaee pawan laatee,

sudhaa see os kee boonden!

·

tahalane chal paden mitron, prakriiti ke roop ko nirakhen

·

n jaane kab bikhar jaaen, pharebee os kee boonden!

·

- kalpanaa raamaanee

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें!

॥

नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें!

॥

चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं,

॥

सुरों में साथ देती हैं, सुहानी ओस की बूँदें!

॥

चितेरा कौन है जो रात, में जाजम बिछा जाता,

॥

न जाने रैन कब बुनती,

अकेली ओस की बूँदें!

॥

करिश्मा है ये कुदरत का, या फिर जादू कोई उसका

॥

घुमाकर जो छड़ी कोई,

गिराती ओस की बूँदें!

॥

नवल सूरज की किरणों में, छिपी होती हैं ये शायद

॥

जो पुरवाई पवन लाती,

सुधा सी ओस की बूँदें!

॥

टहलने चल पड़ें मित्रों, प्रकृति के रूप को निरखें

॥

न जाने कब बिखर जाएँ, फरेबी ओस की बूँदें!

॥

- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗