खिल उठा गुलशन khil uthaa gulashan खिल उठा गुलशन
खिल उठा गुलशन,
गुलों में जान आई।
साल नूतन दे रहा सबको बधाई।
कह रहीं देखो, नवेली सूर्य किरणें
अब वरो आगत,
विगत को दो विदाई।
साज़ ने संगीत छेड़ा, गीत
झूमे
मन हुआ चन्दन, गज़ल
भी गुनगुनाई।
जिन समीकरणों में उलझा साल बीता
शुभ घड़ी सरलीकरण की उनके आई।
काट दें इस बार वे बंधन जिन्होंने
रूढ़ियों से बाँध की थी बेहयाई।
स्वत्व अपने हाकिमों से कर लें
हासिल
और जनता के हितों हित हो लड़ाई।
हों न बैरी अब बरी,
सुन लो सपूतों
मौत के पिंजड़े में तड़पें आततायी।
ले शपथ कर लें हरिक सार्थक जतन से
दुर्दिनों का अंत,
अंतर की सफाई।
कर बढ़ाकर नष्ट वे अवरोध कर दें
प्रगति-पथ पर जिनसे हमने चोट खाई।
साल नव अर्पित उन्हें हो आज मित्रों
भाग्य की ठोकर जिन्होंने, कल
थी खाई।
जीत का सेहरा बँधे हर हार के सिर,
वर्ष नूतन की यही असली कमाई।
--कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
khil uthaa gulashan,
gulon men jaan aaee
saal nootan de rahaa sabako badhaaee
kah raheen dekho, nawelee soory kiranen
ab waro aagat,
wigat ko do widaaee
saaz ne sangeet chedaa, geet
jhoome
man huaa chandan, gazal
bhee gunagunaaee
jin sameekaranon men ulajhaa saal beetaa
shubh ghadee saraleekaran kee unake aaee
kaat den is baar we bandhan jinhonne
rooढ़iyon se baandh kee thee behayaaee
svatv apane haakimon se kar len
haasil
aur janataa ke hiton hit ho ladaaee
hon n bairee ab baree,
sun lo sapooton
maut ke pinjade men tadapen aatataayee
le shapath kar len harik saarthak jatan se
durdinon kaa ant,
antar kee saphaaee
kar bढ़aakar nasht we awarodh kar den
pragati-path par jinase hamane chot khaaee
saal naw arpit unhen ho aaj mitron
bhaagy kee thokar jinhonne, kal
thee khaaee
jeet kaa seharaa bandhe har haar ke sir,
warsh nootan kee yahee asalee kamaaee
--kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
खिल उठा गुलशन,
गुलों में जान आई।
साल नूतन दे रहा सबको बधाई।
कह रहीं देखो, नवेली सूर्य किरणें
अब वरो आगत,
विगत को दो विदाई।
साज़ ने संगीत छेड़ा, गीत
झूमे
मन हुआ चन्दन, गज़ल
भी गुनगुनाई।
जिन समीकरणों में उलझा साल बीता
शुभ घड़ी सरलीकरण की उनके आई।
काट दें इस बार वे बंधन जिन्होंने
रूढ़ियों से बाँध की थी बेहयाई।
स्वत्व अपने हाकिमों से कर लें
हासिल
और जनता के हितों हित हो लड़ाई।
हों न बैरी अब बरी,
सुन लो सपूतों
मौत के पिंजड़े में तड़पें आततायी।
ले शपथ कर लें हरिक सार्थक जतन से
दुर्दिनों का अंत,
अंतर की सफाई।
कर बढ़ाकर नष्ट वे अवरोध कर दें
प्रगति-पथ पर जिनसे हमने चोट खाई।
साल नव अर्पित उन्हें हो आज मित्रों
भाग्य की ठोकर जिन्होंने, कल
थी खाई।
जीत का सेहरा बँधे हर हार के सिर,
वर्ष नूतन की यही असली कमाई।
--कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी