कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६४ / २०४ № 64 of 204 रचना ६४ / २०४
९ जनवरी २०१५ 9 January 2015 ९ जनवरी २०१५

पावन होती प्रीत वही तो paawan hotee preet wahee to पावन होती प्रीत वही तो

जो रस्मों को मन से माने,

पावन होती प्रीत वही तो!

जीवन भर जो साथ निभाए,

सच्चा होता मीत वही तो!

रूढ़ पुरानी परम्पराएँ, मानें

हम, है नहीं ज़रूरी।

जो समाज को नई दिशा दे, प्रचलित

होती रीत वही तो!

मंदिर-मंदिर चढ़े चढ़ावा,

भरे हुओं की भरती झोली।

जो भूखों की भरे झोलियाँ,

होता कर्म पुनीत वही तो!

ऐसा कोई हुआ न हाकिम,

जो जग में हर बाज़ी जीता

बाद हार के जो हासिल हो,

सुखदाई है जीत वही तो!

भाव बिना है कविता फीकी,

बिना सुरीले बोल,

तराने।

जो तन-मन को करे तरंगित मधुरिम है संगीत वही तो!

यों तो मिलती नेक नसीहत,

भूलें जो बीता दुखदाई,

संग जिये पर जिसके पल-पल,

होता याद अतीत वही तो!

- कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

jo rasmon ko man se maane,

paawan hotee preet wahee to!

·

jeewan bhar jo saath nibhaae,

sachchaa hotaa meet wahee to!

·

rooढ़ puraanee paramparaaen, maanen

ham, hai naheen zarooree

·

jo samaaj ko naee dishaa de, prachalit

hotee reet wahee to!

·

mandir-mandir chढ़e chढ़aawaa,

bhare huon kee bharatee jholee

·

jo bhookhon kee bhare jholiyaan,

hotaa karm puneet wahee to!

·

aisaa koee huaa n haakim,

jo jag men har baazee jeetaa

·

baad haar ke jo haasil ho,

sukhadaaee hai jeet wahee to!

·

bhaaw binaa hai kawitaa pheekee,

binaa sureele bol,

taraane

·

jo tan-man ko kare tarangit madhurim hai sangeet wahee to!

·

yon to milatee nek naseehat,

bhoolen jo beetaa dukhadaaee,

·

sang jiye par jisake pal-pal,

hotaa yaad ateet wahee to!

·

- kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

जो रस्मों को मन से माने,

पावन होती प्रीत वही तो!

जीवन भर जो साथ निभाए,

सच्चा होता मीत वही तो!

रूढ़ पुरानी परम्पराएँ, मानें

हम, है नहीं ज़रूरी।

जो समाज को नई दिशा दे, प्रचलित

होती रीत वही तो!

मंदिर-मंदिर चढ़े चढ़ावा,

भरे हुओं की भरती झोली।

जो भूखों की भरे झोलियाँ,

होता कर्म पुनीत वही तो!

ऐसा कोई हुआ न हाकिम,

जो जग में हर बाज़ी जीता

बाद हार के जो हासिल हो,

सुखदाई है जीत वही तो!

भाव बिना है कविता फीकी,

बिना सुरीले बोल,

तराने।

जो तन-मन को करे तरंगित मधुरिम है संगीत वही तो!

यों तो मिलती नेक नसीहत,

भूलें जो बीता दुखदाई,

संग जिये पर जिसके पल-पल,

होता याद अतीत वही तो!

- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗