कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ७३ / २०५ № 73 of 205 रचना ७३ / २०५
३ मार्च २०१५ 3 March 2015 ३ मार्च २०१५

चलो मीत मिलजुल के होली मनाएँ chalo meet milajul ke holee manaaen चलो मीत मिलजुल के होली मनाएँ

हुई

हैं गुलाबी, हठीली हवाएँ

॥

चलो

मीत मिलजुल के होली मनाएँ

॥

जो

बोनस में बेचैनियाँ बाँध लाए

॥

उमंगों

के रंगों में उनको बहाएँ

॥

तहाकर

झमेलों की बेरंग गादी

॥

कि

मस्ती की सतरंगी चादर बिछाएँ

॥

जो

पल-प्रीत लाया है चुन-चुन के फागुन

॥

उन्हें

गीत की धुन बना गुनगुनाएँ

॥

जिसे

ढूँढते हैं सितारों से आगे

॥

ज़मीं

पर ही वो आज दुनिया बसाएँ

॥

ये

दिन चार घर में नहीं बैठने के

॥

निकल

महफिलों को मवाली बनाएँ

॥

पलाशों

पे होता मगन मास फागुन

॥

उन्हें

पाश में बाँध,

आँगन में लाएँ

॥

वरें

यह विरासत नई पीढ़ियाँ ज्यों

॥

उन्हें

होलिका की कहानी सुनाएँ

॥

बसे!

‘कल्पना’ पर्व यादों के दिल में

॥

यही

याद हो और सब भूल जाएँ

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

huee

hain gulaabee, hatheelee hawaaen

·

chalo

meet milajul ke holee manaaen

·

jo

bonas men bechainiyaan baandh laae

·

umangon

ke rangon men unako bahaaen

·

tahaakar

jhamelon kee berang gaadee

·

ki

mastee kee satarangee chaadar bichaaen

·

jo

pal-preet laayaa hai chun-chun ke phaagun

·

unhen

geet kee dhun banaa gunagunaaen

·

jise

dhoondhate hain sitaaron se aage

·

zameen

par hee wo aaj duniyaa basaaen

·

ye

din chaar ghar men naheen baithane ke

·

nikal

mahaphilon ko mawaalee banaaen

·

palaashon

pe hotaa magan maas phaagun

·

unhen

paash men baandh,

aangan men laaen

·

waren

yah wiraasat naee peeढ़iyaan jyon

·

unhen

holikaa kee kahaanee sunaaen

·

base!

‘kalpanaa’ parv yaadon ke dil men

·

yahee

yaad ho aur sab bhool jaaen

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हुई

हैं गुलाबी, हठीली हवाएँ

॥

चलो

मीत मिलजुल के होली मनाएँ

॥

जो

बोनस में बेचैनियाँ बाँध लाए

॥

उमंगों

के रंगों में उनको बहाएँ

॥

तहाकर

झमेलों की बेरंग गादी

॥

कि

मस्ती की सतरंगी चादर बिछाएँ

॥

जो

पल-प्रीत लाया है चुन-चुन के फागुन

॥

उन्हें

गीत की धुन बना गुनगुनाएँ

॥

जिसे

ढूँढते हैं सितारों से आगे

॥

ज़मीं

पर ही वो आज दुनिया बसाएँ

॥

ये

दिन चार घर में नहीं बैठने के

॥

निकल

महफिलों को मवाली बनाएँ

॥

पलाशों

पे होता मगन मास फागुन

॥

उन्हें

पाश में बाँध,

आँगन में लाएँ

॥

वरें

यह विरासत नई पीढ़ियाँ ज्यों

॥

उन्हें

होलिका की कहानी सुनाएँ

॥

बसे!

‘कल्पना’ पर्व यादों के दिल में

॥

यही

याद हो और सब भूल जाएँ

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗