कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १४१ / २०४ № 141 of 204 रचना १४१ / २०४
१२ दिसम्बर २०१६ 12 December 2016 १२ दिसम्बर २०१६

शीतल ऋतु के नैन खुले sheetal riitu ke nain khule शीतल ऋतु के नैन खुले

शीतल ऋतु के नैन खुले, मौसम नैनों का नूर

हुआ।

जाग उठा जगती का कण-कण, क्षितिज सर्द सिंदूर

हुआ।

बाग-बाग चहके चिड़िया से, रंग-रंग के फूलों

संग

कलियों की मनुहारों से, भँवरों का मन मगरूर

हुआ।

सुविधाओं की उड़ीं पतंगें, नई उमंगें संग लिए

कुदरत हुई कृपालु सृष्टि का, दरियादिल दस्तूर

हुआ।

चारु-चंद्रिका चली विचरने, शीत-निशा के प्रांगण

में

सरिताओं का देख मचलना, सागर मद में चूर

हुआ।

कलमों पर वो चढ़ी खुमारी, लगे झूमने गीत ग़ज़ल

और “कल्पना” हर सरगम-सुर, सारंगी संतूर हुआ।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

sheetal riitu ke nain khule, mausam nainon kaa noor

huaa

·

jaag uthaa jagatee kaa kan-kan, kshitij sard sindoor

huaa

·

baag-baag chahake chidiyaa se, rang-rang ke phoolon

sang

·

kaliyon kee manuhaaron se, bhanvaron kaa man magaroor

huaa

·

suwidhaaon kee udeen patangen, naee umangen sang lie

·

kudarat huee kriipaalu sriishti kaa, dariyaadil dastoor

huaa

·

chaaru-chandrikaa chalee wicharane, sheet-nishaa ke praangan

men

·

saritaaon kaa dekh machalanaa, saagar mad men choor

huaa

·

kalamon par wo chढ़ee khumaaree, lage jhoomane geet gazal

·

aur “kalpanaa” har saragam-sur, saarangee santoor huaa

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

शीतल ऋतु के नैन खुले, मौसम नैनों का नूर

हुआ।

जाग उठा जगती का कण-कण, क्षितिज सर्द सिंदूर

हुआ।

बाग-बाग चहके चिड़िया से, रंग-रंग के फूलों

संग

कलियों की मनुहारों से, भँवरों का मन मगरूर

हुआ।

सुविधाओं की उड़ीं पतंगें, नई उमंगें संग लिए

कुदरत हुई कृपालु सृष्टि का, दरियादिल दस्तूर

हुआ।

चारु-चंद्रिका चली विचरने, शीत-निशा के प्रांगण

में

सरिताओं का देख मचलना, सागर मद में चूर

हुआ।

कलमों पर वो चढ़ी खुमारी, लगे झूमने गीत ग़ज़ल

और “कल्पना” हर सरगम-सुर, सारंगी संतूर हुआ।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗