कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १३० / २०४ № 130 of 204 रचना १३० / २०४
३० जुलाई २०१६ 30 July 2016 ३० जुलाई २०१६

द्वार दिल के dvaar dil ke द्वार दिल के

द्वार दिल के, तुमने पहरे तो बिठाए

अब अकेलापन तुम्हें ही, खा न जाए।

बाँट सकता ख़ुशबुएँ गुलशन तभी जब

गुल हरिक परिवार का, खुल मुस्कुराए।

पेड़ से माँगोगे फल यदि मार पत्थर

वो भी देगा फेंककर, सब चोट खाए।

है नज़र कमज़ोर तो चश्मा बदल लो

ज्यों नज़र आएँ न दुश्मन, मित्र-साए।

जाँच लो किरदार अपना भी जगत में

फिर रहे हो औरों पर, उँगली उठाए।

यदि बुझानी प्यास है, तो पग बढ़ाओ

क्यों घड़ा, बढ़कर तुम्हारे, पास आए।

पाओगे प्रतिदान में भी प्रेम-वाणी

बोल मृदु तुमने किसी पर, यदि लुटाए।

पूछ लो बस एक बार, अपने ही मन से

किसलिए तुम ‘कल्पना’, मानव कहाए।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

dvaar dil ke, tumane pahare to bithaae

·

ab akelaapan tumhen hee, khaa n jaae

·

baant sakataa kushabuen gulashan tabhee jab

·

gul harik pariwaar kaa, khul muskuraae

·

ped se maangoge phal yadi maar patthar

·

wo bhee degaa phenkakar, sab chot khaae

·

hai nazar kamazor to chashmaa badal lo

·

jyon nazar aaen n dushman, mitr-saae

·

jaanch lo kiradaar apanaa bhee jagat men

·

phir rahe ho auron par, ungalee uthaae

·

yadi bujhaanee pyaas hai, to pag bढ़aao

·

kyon ghadaa, bढ़kar tumhaare, paas aae

·

paaoge pratidaan men bhee prem-waanee

·

bol mriidu tumane kisee par, yadi lutaae

·

pooch lo bas ek baar, apane hee man se

·

kisalie tum ‘kalpanaa’, maanaw kahaae

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

द्वार दिल के, तुमने पहरे तो बिठाए

अब अकेलापन तुम्हें ही, खा न जाए।

बाँट सकता ख़ुशबुएँ गुलशन तभी जब

गुल हरिक परिवार का, खुल मुस्कुराए।

पेड़ से माँगोगे फल यदि मार पत्थर

वो भी देगा फेंककर, सब चोट खाए।

है नज़र कमज़ोर तो चश्मा बदल लो

ज्यों नज़र आएँ न दुश्मन, मित्र-साए।

जाँच लो किरदार अपना भी जगत में

फिर रहे हो औरों पर, उँगली उठाए।

यदि बुझानी प्यास है, तो पग बढ़ाओ

क्यों घड़ा, बढ़कर तुम्हारे, पास आए।

पाओगे प्रतिदान में भी प्रेम-वाणी

बोल मृदु तुमने किसी पर, यदि लुटाए।

पूछ लो बस एक बार, अपने ही मन से

किसलिए तुम ‘कल्पना’, मानव कहाए।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗