कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १३१ / २०५ № 131 of 205 रचना १३१ / २०५
३० जुलाई २०१६ 30 July 2016 ३० जुलाई २०१६

द्वार दिल के dvaar dil ke द्वार दिल के

द्वार दिल के, तुमने पहरे तो बिठाए

॥

अब अकेलापन तुम्हें ही, खा न जाए।

॥

बाँट सकता ख़ुशबुएँ गुलशन तभी जब

॥

गुल हरिक परिवार का, खुल मुस्कुराए।

॥

पेड़ से माँगोगे फल यदि मार पत्थर

॥

वो भी देगा फेंककर, सब चोट खाए।

॥

है नज़र कमज़ोर तो चश्मा बदल लो

॥

ज्यों नज़र आएँ न दुश्मन, मित्र-साए।

॥

जाँच लो किरदार अपना भी जगत में

॥

फिर रहे हो औरों पर, उँगली उठाए।

॥

यदि बुझानी प्यास है, तो पग बढ़ाओ

॥

क्यों घड़ा, बढ़कर तुम्हारे, पास आए।

॥

पाओगे प्रतिदान में भी प्रेम-वाणी

॥

बोल मृदु तुमने किसी पर, यदि लुटाए।

॥

पूछ लो बस एक बार, अपने ही मन से

॥

किसलिए तुम ‘कल्पना’, मानव कहाए।

॥

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

dvaar dil ke, tumane pahare to bithaae

·

ab akelaapan tumhen hee, khaa n jaae

·

baant sakataa kushabuen gulashan tabhee jab

·

gul harik pariwaar kaa, khul muskuraae

·

ped se maangoge phal yadi maar patthar

·

wo bhee degaa phenkakar, sab chot khaae

·

hai nazar kamazor to chashmaa badal lo

·

jyon nazar aaen n dushman, mitr-saae

·

jaanch lo kiradaar apanaa bhee jagat men

·

phir rahe ho auron par, ungalee uthaae

·

yadi bujhaanee pyaas hai, to pag bढ़aao

·

kyon ghadaa, bढ़kar tumhaare, paas aae

·

paaoge pratidaan men bhee prem-waanee

·

bol mriidu tumane kisee par, yadi lutaae

·

pooch lo bas ek baar, apane hee man se

·

kisalie tum ‘kalpanaa’, maanaw kahaae

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

द्वार दिल के, तुमने पहरे तो बिठाए

॥

अब अकेलापन तुम्हें ही, खा न जाए।

॥

बाँट सकता ख़ुशबुएँ गुलशन तभी जब

॥

गुल हरिक परिवार का, खुल मुस्कुराए।

॥

पेड़ से माँगोगे फल यदि मार पत्थर

॥

वो भी देगा फेंककर, सब चोट खाए।

॥

है नज़र कमज़ोर तो चश्मा बदल लो

॥

ज्यों नज़र आएँ न दुश्मन, मित्र-साए।

॥

जाँच लो किरदार अपना भी जगत में

॥

फिर रहे हो औरों पर, उँगली उठाए।

॥

यदि बुझानी प्यास है, तो पग बढ़ाओ

॥

क्यों घड़ा, बढ़कर तुम्हारे, पास आए।

॥

पाओगे प्रतिदान में भी प्रेम-वाणी

॥

बोल मृदु तुमने किसी पर, यदि लुटाए।

॥

पूछ लो बस एक बार, अपने ही मन से

॥

किसलिए तुम ‘कल्पना’, मानव कहाए।

॥

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗