कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १४८ / २०४ № 148 of 204 रचना १४८ / २०४
७ जुलाई २०१७ 7 July 2017 ७ जुलाई २०१७

नर पिशाचों के लिए nar pishaachon ke lie नर पिशाचों के लिए

भर्त्सना के भाव भर, कितनी भला कटुता लिखें?

नर पिशाचों के लिए, हो काल वो रचना लिखें।

नारियों का मान मर्दन, कर रहे जो का-पुरुष

न्याय पृष्ठों पर उन्हें, ज़िंदा नहीं मुर्दा लिखें।

रौंदते मासूमियत, लक़दक़ मुखौटे ओढ़कर

अक्स हर दीवार पर,कालिख पुता उनका लिखें।

पशु कहें दानव कहें, या दुष्ट, दुर्जन, घृष्टतम

फर्क उनको क्या भला,जो नाम, जो ओहदा लिखें।

पापियों के बोझ से, फटती नहीं अब ये धरा

खोद कब्रें कर दफन, कोरा कफन टुकड़ा लिखें।

हों बहिष्कृत परिजनों से, और धिक्कृत हर गली

डूब जिसमें खुद मरें, वो शर्म का दरिया लिखें।

'कल्पना' थमने न पाए, लेखनी खूं से भरी!

हों न वर्धित वंश, उनके नाश को न्यौता लिखें।

bhartsanaa ke bhaaw bhar, kitanee bhalaa katutaa likhen?

nar pishaachon ke lie, ho kaal wo rachanaa likhen

·

naariyon kaa maan mardan, kar rahe jo kaa-purush

nyaay priishthon par unhen, zindaa naheen murdaa likhen

·

raundate maasoomiyat, laqadaq mukhaute oढ़kar

aks har deewaar par,kaalikh putaa unakaa likhen

·

pashu kahen daanaw kahen, yaa dusht, durjan, ghriishtatam

phark unako kyaa bhalaa,jo naam, jo ohadaa likhen

·

paapiyon ke bojh se, phatatee naheen ab ye dharaa

khod kabren kar daphan, koraa kaphan tukadaa likhen

·

hon bahishkriit parijanon se, aur dhikkriit har galee

doob jisamen khud maren, wo sharm kaa dariyaa likhen

·

'kalpanaa' thamane n paae, lekhanee khoon se bharee!

hon n wardhit wansh, unake naash ko nyautaa likhen

भर्त्सना के भाव भर, कितनी भला कटुता लिखें?

नर पिशाचों के लिए, हो काल वो रचना लिखें।

नारियों का मान मर्दन, कर रहे जो का-पुरुष

न्याय पृष्ठों पर उन्हें, ज़िंदा नहीं मुर्दा लिखें।

रौंदते मासूमियत, लक़दक़ मुखौटे ओढ़कर

अक्स हर दीवार पर,कालिख पुता उनका लिखें।

पशु कहें दानव कहें, या दुष्ट, दुर्जन, घृष्टतम

फर्क उनको क्या भला,जो नाम, जो ओहदा लिखें।

पापियों के बोझ से, फटती नहीं अब ये धरा

खोद कब्रें कर दफन, कोरा कफन टुकड़ा लिखें।

हों बहिष्कृत परिजनों से, और धिक्कृत हर गली

डूब जिसमें खुद मरें, वो शर्म का दरिया लिखें।

'कल्पना' थमने न पाए, लेखनी खूं से भरी!

हों न वर्धित वंश, उनके नाश को न्यौता लिखें।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗