गाथा कृष्ण की//गज़ल// gaathaa kriishn kee//gazal// गाथा कृष्ण की//गज़ल//
फिर सुनी पावन
पुरा-कालीन गाथा कृष्ण की।
जो सदा है मोक्षदाई, द्वार, महिमा कृष्ण
की।
विष्णु के अवतार
जन्में, पापियों के नाश को
थे चकित भूलोक वासी, देख माया
कृष्ण की।
देवकी-वसुदेव सुत, गोकुल में
खेले औ बढ़े
गूँजती गलियों में थी, प्यारी
मुरलिया कृष्ण की।
जब बने राजा बसाई, एक नगरी द्वारका
और देवी रुक्मिणी, कहलाई भामा
कृष्ण की।
सारथी बन, वीर अर्जुन, के बढ़ाए हौसले
युद्ध के मैदान में
फहरी पताका कृष्ण की।
जो दिये उपदेश उनका, सार कवियों ने
रचा।
ग्रंथ-गीता में निहित
वो, ज्ञानगंगा कृष्ण की।
जन्म-उत्सव साल हर, जन-जन मनाता
देश में
झाँकियों में दृष्ट
होती, रास-लीला कृष्ण की।
मटकियाँ माखन दही की, टाँग हर
चौराहे पर
फोड़ कर, दुहराई जाती, बाल क्रीडा
कृष्ण की।
गाँव-गोकुल, तीर यमुना, सून सब मोहन
बिना
नारियाँ-नर याद करते, प्रीत राधा
कृष्ण की।
-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
phir sunee paawan
puraa-kaaleen gaathaa kriishn kee
jo sadaa hai mokshadaaee, dvaar, mahimaa kriishn
kee
wishnu ke awataar
janmen, paapiyon ke naash ko
the chakit bhoolok waasee, dekh maayaa
kriishn kee
dewakee-wasudew sut, gokul men
khele au bढ़e
goonjatee galiyon men thee, pyaaree
muraliyaa kriishn kee
jab bane raajaa basaaee, ek nagaree dvaarakaa
aur dewee rukminee, kahalaaee bhaamaa
kriishn kee
saarathee ban, weer arjun, ke bढ़aae hausale
yuddh ke maidaan men
phaharee pataakaa kriishn kee
jo diye upadesh unakaa, saar kawiyon ne
rachaa
granth-geetaa men nihit
wo, jnaanagangaa kriishn kee
janm-utsaw saal har, jan-jan manaataa
desh men
jhaankiyon men driisht
hotee, raas-leelaa kriishn kee
matakiyaan maakhan dahee kee, taang har
chauraahe par
phod kar, duharaaee jaatee, baal kreedaa
kriishn kee
gaanv-gokul, teer yamunaa, soon sab mohan
binaa
naariyaan-nar yaad karate, preet raadhaa
kriishn kee
-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
फिर सुनी पावन
पुरा-कालीन गाथा कृष्ण की।
जो सदा है मोक्षदाई, द्वार, महिमा कृष्ण
की।
विष्णु के अवतार
जन्में, पापियों के नाश को
थे चकित भूलोक वासी, देख माया
कृष्ण की।
देवकी-वसुदेव सुत, गोकुल में
खेले औ बढ़े
गूँजती गलियों में थी, प्यारी
मुरलिया कृष्ण की।
जब बने राजा बसाई, एक नगरी द्वारका
और देवी रुक्मिणी, कहलाई भामा
कृष्ण की।
सारथी बन, वीर अर्जुन, के बढ़ाए हौसले
युद्ध के मैदान में
फहरी पताका कृष्ण की।
जो दिये उपदेश उनका, सार कवियों ने
रचा।
ग्रंथ-गीता में निहित
वो, ज्ञानगंगा कृष्ण की।
जन्म-उत्सव साल हर, जन-जन मनाता
देश में
झाँकियों में दृष्ट
होती, रास-लीला कृष्ण की।
मटकियाँ माखन दही की, टाँग हर
चौराहे पर
फोड़ कर, दुहराई जाती, बाल क्रीडा
कृष्ण की।
गाँव-गोकुल, तीर यमुना, सून सब मोहन
बिना
नारियाँ-नर याद करते, प्रीत राधा
कृष्ण की।
-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी