चलो हर कदम सँभलके//गज़ल// chalo har kadam sanbhalake//gazal// चलो हर कदम सँभलके//गज़ल//
चलो हर कदम सँभल के, कहीं पग फिसल
न जाए
जो मिला है आज अवसर, कहीं वो भी टल
न जाए।
बड़े दिन के बाद आए, ज़रा देर पास
बैठो
यूँ न छोड़ जाओ जब तक, मेरा मन सँभल
न जाए।
जो वफा की खाते कसमें, नहीं उनका कुछ
भरोसा
जिसे मन से अपना माना, वही मीत छल न
जाए।
सुनो प्राणिश्रेष्ठ
मानव, करो नेक कर्म भी कुछ
यूँ ही पाप बढ़ गया तो, ये धरा दहल न
जाए।
ये खिली खिली सी धरती, हमें दे रही
हवाला
रहे जल का संतुलन भी, कहीं पौध गल न
जाए।
करो कैद गीत नगमें, कि गज़ल ने है बुलाया
है ये मंच शायरों का, ये समाँ निकल
न जाए।
नहीं व्यर्थ बीत जाएँ, ये तुम्हारे
दीद के पल
“न झुकाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न
जाए”
- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
chalo har kadam sanbhal ke, kaheen pag phisal
n jaae
jo milaa hai aaj awasar, kaheen wo bhee tal
n jaae
bade din ke baad aae, zaraa der paas
baitho
yoon n chod jaao jab tak, meraa man sanbhal
n jaae
jo waphaa kee khaate kasamen, naheen unakaa kuch
bharosaa
jise man se apanaa maanaa, wahee meet chal n
jaae
suno praanishreshth
maanaw, karo nek karm bhee kuch
yoon hee paap bढ़ gayaa to, ye dharaa dahal n
jaae
ye khilee khilee see dharatee, hamen de rahee
hawaalaa
rahe jal kaa santulan bhee, kaheen paudh gal n
jaae
karo kaid geet nagamen, ki gazal ne hai bulaayaa
hai ye manch shaayaron kaa, ye samaan nikal
n jaae
naheen wyarth beet jaaen, ye tumhaare
deed ke pal
“n jhukaao tum nigaahen, kaheen raat dhal n
jaae”
- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
चलो हर कदम सँभल के, कहीं पग फिसल
न जाए
जो मिला है आज अवसर, कहीं वो भी टल
न जाए।
बड़े दिन के बाद आए, ज़रा देर पास
बैठो
यूँ न छोड़ जाओ जब तक, मेरा मन सँभल
न जाए।
जो वफा की खाते कसमें, नहीं उनका कुछ
भरोसा
जिसे मन से अपना माना, वही मीत छल न
जाए।
सुनो प्राणिश्रेष्ठ
मानव, करो नेक कर्म भी कुछ
यूँ ही पाप बढ़ गया तो, ये धरा दहल न
जाए।
ये खिली खिली सी धरती, हमें दे रही
हवाला
रहे जल का संतुलन भी, कहीं पौध गल न
जाए।
करो कैद गीत नगमें, कि गज़ल ने है बुलाया
है ये मंच शायरों का, ये समाँ निकल
न जाए।
नहीं व्यर्थ बीत जाएँ, ये तुम्हारे
दीद के पल
“न झुकाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न
जाए”
- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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-कल्पना रामानी