कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १३ / २०४ № 13 of 204 रचना १३ / २०४
६ सितम्बर २०१३ 6 September 2013 ६ सितम्बर २०१३

चलो हर कदम सँभलके//गज़ल// chalo har kadam sanbhalake//gazal// चलो हर कदम सँभलके//गज़ल//

चलो हर कदम सँभल के, कहीं पग फिसल

न जाए

जो मिला है आज अवसर, कहीं वो भी टल

न जाए।

बड़े दिन के बाद आए, ज़रा देर पास

बैठो

यूँ न छोड़ जाओ जब तक, मेरा मन सँभल

न जाए।

जो वफा की खाते कसमें, नहीं उनका कुछ

भरोसा

जिसे मन से अपना माना, वही मीत छल न

जाए।

सुनो प्राणिश्रेष्ठ

मानव, करो नेक कर्म भी कुछ

यूँ ही पाप बढ़ गया तो, ये धरा दहल न

जाए।

ये खिली खिली सी धरती, हमें दे रही

हवाला

रहे जल का संतुलन भी, कहीं पौध गल न

जाए।

करो कैद गीत नगमें, कि गज़ल ने है बुलाया

है ये मंच शायरों का, ये समाँ निकल

न जाए।

नहीं व्यर्थ बीत जाएँ, ये तुम्हारे

दीद के पल

“न झुकाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न

जाए”

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

chalo har kadam sanbhal ke, kaheen pag phisal

n jaae

·

jo milaa hai aaj awasar, kaheen wo bhee tal

n jaae

·

bade din ke baad aae, zaraa der paas

baitho

·

yoon n chod jaao jab tak, meraa man sanbhal

n jaae

·

jo waphaa kee khaate kasamen, naheen unakaa kuch

bharosaa

·

jise man se apanaa maanaa, wahee meet chal n

jaae

·

suno praanishreshth

maanaw, karo nek karm bhee kuch

·

yoon hee paap bढ़ gayaa to, ye dharaa dahal n

jaae

·

ye khilee khilee see dharatee, hamen de rahee

hawaalaa

·

rahe jal kaa santulan bhee, kaheen paudh gal n

jaae

·

karo kaid geet nagamen, ki gazal ne hai bulaayaa

·

hai ye manch shaayaron kaa, ye samaan nikal

n jaae

·

naheen wyarth beet jaaen, ye tumhaare

deed ke pal

·

“n jhukaao tum nigaahen, kaheen raat dhal n

jaae”

·

- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

चलो हर कदम सँभल के, कहीं पग फिसल

न जाए

जो मिला है आज अवसर, कहीं वो भी टल

न जाए।

बड़े दिन के बाद आए, ज़रा देर पास

बैठो

यूँ न छोड़ जाओ जब तक, मेरा मन सँभल

न जाए।

जो वफा की खाते कसमें, नहीं उनका कुछ

भरोसा

जिसे मन से अपना माना, वही मीत छल न

जाए।

सुनो प्राणिश्रेष्ठ

मानव, करो नेक कर्म भी कुछ

यूँ ही पाप बढ़ गया तो, ये धरा दहल न

जाए।

ये खिली खिली सी धरती, हमें दे रही

हवाला

रहे जल का संतुलन भी, कहीं पौध गल न

जाए।

करो कैद गीत नगमें, कि गज़ल ने है बुलाया

है ये मंच शायरों का, ये समाँ निकल

न जाए।

नहीं व्यर्थ बीत जाएँ, ये तुम्हारे

दीद के पल

“न झुकाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न

जाए”

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗