कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १७७ / २०४ № 177 of 204 रचना १७७ / २०४
२९ नवम्बर २०१९ 29 November 2019 २९ नवम्बर २०१९

जंगलों का मातम jangalon kaa maatam जंगलों का मातम

कल जंगलों का मातम, देखा क़रीब से।

पेड़ों को तोड़ते दम, देखा क़रीब से।

जो काल बनके आए, थे तो मनुष्य ही।

पर हाथ कितने निर्मम, देखा क़रीब से।

रह रह के ज़ालिमों की, चलती थीं आरियाँ।

बरबादियों का वो क्रम, देखा क़रीब से।

रोई थी डाली-डाली, काँपी थी हर दिशा।

फिर सिसकियों का आलम, देखा क़रीब से

अपने ही राज से थे, जो बेदखल हुए।

उन चौपदों का भी गम, देखा करीब से।

यह हश्र देख वन का, मन टूटता गया।

दिन के उजाले में तम, देखा करीब से।

kal jangalon kaa maatam, dekhaa qareeb se

pedon ko todate dam, dekhaa qareeb se

·

jo kaal banake aae, the to manushy hee

par haath kitane nirmam, dekhaa qareeb se

·

rah rah ke zaalimon kee, chalatee theen aariyaan

barabaadiyon kaa wo kram, dekhaa qareeb se

·

roee thee daalee-daalee, kaanpee thee har dishaa

phir sisakiyon kaa aalam, dekhaa qareeb se

·

apane hee raaj se the, jo bedakhal hue

un chaupadon kaa bhee gam, dekhaa kareeb se

·

yah hashr dekh wan kaa, man tootataa gayaa

din ke ujaale men tam, dekhaa kareeb se

कल जंगलों का मातम, देखा क़रीब से।

पेड़ों को तोड़ते दम, देखा क़रीब से।

जो काल बनके आए, थे तो मनुष्य ही।

पर हाथ कितने निर्मम, देखा क़रीब से।

रह रह के ज़ालिमों की, चलती थीं आरियाँ।

बरबादियों का वो क्रम, देखा क़रीब से।

रोई थी डाली-डाली, काँपी थी हर दिशा।

फिर सिसकियों का आलम, देखा क़रीब से

अपने ही राज से थे, जो बेदखल हुए।

उन चौपदों का भी गम, देखा करीब से।

यह हश्र देख वन का, मन टूटता गया।

दिन के उजाले में तम, देखा करीब से।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗