जंगलों का मातम jangalon kaa maatam जंगलों का मातम
कल जंगलों का मातम, देखा क़रीब से।
पेड़ों को तोड़ते दम, देखा क़रीब से।
जो काल बनके आए, थे तो मनुष्य ही।
पर हाथ कितने निर्मम, देखा क़रीब से।
रह रह के ज़ालिमों की, चलती थीं आरियाँ।
बरबादियों का वो क्रम, देखा क़रीब से।
रोई थी डाली-डाली, काँपी थी हर दिशा।
फिर सिसकियों का आलम, देखा क़रीब से
अपने ही राज से थे, जो बेदखल हुए।
उन चौपदों का भी गम, देखा करीब से।
यह हश्र देख वन का, मन टूटता गया।
दिन के उजाले में तम, देखा करीब से।
kal jangalon kaa maatam, dekhaa qareeb se
pedon ko todate dam, dekhaa qareeb se
jo kaal banake aae, the to manushy hee
par haath kitane nirmam, dekhaa qareeb se
rah rah ke zaalimon kee, chalatee theen aariyaan
barabaadiyon kaa wo kram, dekhaa qareeb se
roee thee daalee-daalee, kaanpee thee har dishaa
phir sisakiyon kaa aalam, dekhaa qareeb se
apane hee raaj se the, jo bedakhal hue
un chaupadon kaa bhee gam, dekhaa kareeb se
yah hashr dekh wan kaa, man tootataa gayaa
din ke ujaale men tam, dekhaa kareeb se
कल जंगलों का मातम, देखा क़रीब से।
पेड़ों को तोड़ते दम, देखा क़रीब से।
जो काल बनके आए, थे तो मनुष्य ही।
पर हाथ कितने निर्मम, देखा क़रीब से।
रह रह के ज़ालिमों की, चलती थीं आरियाँ।
बरबादियों का वो क्रम, देखा क़रीब से।
रोई थी डाली-डाली, काँपी थी हर दिशा।
फिर सिसकियों का आलम, देखा क़रीब से
अपने ही राज से थे, जो बेदखल हुए।
उन चौपदों का भी गम, देखा करीब से।
यह हश्र देख वन का, मन टूटता गया।
दिन के उजाले में तम, देखा करीब से।