कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३५ / २०४ № 35 of 204 रचना ३५ / २०४
१ मार्च २०१४ 1 March 2014 १ मार्च २०१४

खुशनुमा यह ज़िंदगी होने लगी khushanumaa yah zindagee hone lagee खुशनुमा यह ज़िंदगी होने लगी

ज्यों ही मौसम में नमी होने लगी।

खुशनुमा यह ज़िंदगी होने लगी।

उपवनों में देखकर ऋतुराज को

सुर्ख रंगी हर कली होने लगी।

बादलों से पा सुधारस,

फिर फिदा

सागरों पर हर नदी होने लगी।

चाँद-तारे तो चले मुख मोड़कर

जुगनुओं से रोशनी होने लगी।

रास्ते पक्के शहर के देखकर

गाँव की आहत गली होने लगी।

लोभ का लखकर समंदर “कल्पना”

इस जहाँ से बेरुखी होने लगी।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

jyon hee mausam men namee hone lagee

·

khushanumaa yah zindagee hone lagee

·

upawanon men dekhakar riituraaj ko

·

surkh rangee har kalee hone lagee

·

baadalon se paa sudhaaras,

phir phidaa

·

saagaron par har nadee hone lagee

·

chaand-taare to chale mukh modakar

·

juganuon se roshanee hone lagee

·

raaste pakke shahar ke dekhakar

·

gaanv kee aahat galee hone lagee

·

lobh kaa lakhakar samandar “kalpanaa”

·

is jahaan se berukhee hone lagee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

ज्यों ही मौसम में नमी होने लगी।

खुशनुमा यह ज़िंदगी होने लगी।

उपवनों में देखकर ऋतुराज को

सुर्ख रंगी हर कली होने लगी।

बादलों से पा सुधारस,

फिर फिदा

सागरों पर हर नदी होने लगी।

चाँद-तारे तो चले मुख मोड़कर

जुगनुओं से रोशनी होने लगी।

रास्ते पक्के शहर के देखकर

गाँव की आहत गली होने लगी।

लोभ का लखकर समंदर “कल्पना”

इस जहाँ से बेरुखी होने लगी।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗