फिर से खिले पलाश phir se khile palaash फिर से खिले पलाश
फागुन आया,
सघन वनों में
फिर से खिले पलाश।
ऋतु बसंत की हवा नशीली।
रवि किरणें कुछ स्वर्णिम पीली।
साथ लिए अंगार गोद में
मचल रही थी फिज़ा रंगीली।
दूर शहर से,
देखा भू पर
स्वर्ग लोक का वास।
तान छिड़ी थी कुहू-कुहू की।
रटन अनोखी पिहू-पिहू की।
जल रंगों से वनज बेखबर
खेल रहे थे होली सूखी।
मंगल गाती रहीं दिशाएँ
संग धरा आकाश।
phaagun aayaa,
saghan wanon men
phir se khile palaash
riitu basant kee hawaa nasheelee
rawi kiranen kuch svarnim peelee
saath lie angaar god men
machal rahee thee phizaa rangeelee
door shahar se,
dekhaa bhoo par
svarg lok kaa waas
taan chidee thee kuhoo-kuhoo kee
ratan anokhee pihoo-pihoo kee
jal rangon se wanaj bekhabar
khel rahe the holee sookhee
mangal gaatee raheen dishaaen
sang dharaa aakaash
फागुन आया,
सघन वनों में
फिर से खिले पलाश।
ऋतु बसंत की हवा नशीली।
रवि किरणें कुछ स्वर्णिम पीली।
साथ लिए अंगार गोद में
मचल रही थी फिज़ा रंगीली।
दूर शहर से,
देखा भू पर
स्वर्ग लोक का वास।
तान छिड़ी थी कुहू-कुहू की।
रटन अनोखी पिहू-पिहू की।
जल रंगों से वनज बेखबर
खेल रहे थे होली सूखी।
मंगल गाती रहीं दिशाएँ
संग धरा आकाश।