कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ५९ / १६४ № 59 of 164 रचना ५९ / १६४
२७ फ़रवरी २०१४ 27 February 2014 २७ फ़रवरी २०१४

फिर से खिले पलाश phir se khile palaash फिर से खिले पलाश

फागुन आया,

सघन वनों में

॥

फिर से खिले पलाश।

॥

ऋतु बसंत की हवा नशीली।

॥

रवि किरणें कुछ स्वर्णिम पीली।

॥

साथ लिए अंगार गोद में

॥

मचल रही थी फिज़ा रंगीली।

॥

दूर शहर से,

देखा भू पर

॥

स्वर्ग लोक का वास।

॥

तान छिड़ी थी कुहू-कुहू की।

॥

रटन अनोखी पिहू-पिहू की।

॥

जल रंगों से वनज बेखबर

॥

खेल रहे थे होली सूखी।

॥

मंगल गाती रहीं दिशाएँ

॥

संग धरा आकाश।

phaagun aayaa,

saghan wanon men

·

phir se khile palaash

·

riitu basant kee hawaa nasheelee

·

rawi kiranen kuch svarnim peelee

·

saath lie angaar god men

·

machal rahee thee phizaa rangeelee

·

door shahar se,

dekhaa bhoo par

·

svarg lok kaa waas

·

taan chidee thee kuhoo-kuhoo kee

·

ratan anokhee pihoo-pihoo kee

·

jal rangon se wanaj bekhabar

·

khel rahe the holee sookhee

·

mangal gaatee raheen dishaaen

·

sang dharaa aakaash

फागुन आया,

सघन वनों में

॥

फिर से खिले पलाश।

॥

ऋतु बसंत की हवा नशीली।

॥

रवि किरणें कुछ स्वर्णिम पीली।

॥

साथ लिए अंगार गोद में

॥

मचल रही थी फिज़ा रंगीली।

॥

दूर शहर से,

देखा भू पर

॥

स्वर्ग लोक का वास।

॥

तान छिड़ी थी कुहू-कुहू की।

॥

रटन अनोखी पिहू-पिहू की।

॥

जल रंगों से वनज बेखबर

॥

खेल रहे थे होली सूखी।

॥

मंगल गाती रहीं दिशाएँ

॥

संग धरा आकाश।

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗