नेकी का नतीजा nekee kaa nateejaa नेकी का नतीजा
“यहाँ क्यों खड़े हो बच्चे, तुम्हेंक्या चाहिए?” कहते हुए गाँव के दो कमरों वाले उस एकमात्र सरकारी विद्या-मंदिर के एक मात्र शिक्षक रमाकांत ने सवालिया नज़रों से उस भिखारी से दिखने वाले बालक से पूछा।
“कुछ भोजन मिलेगा बाबूजी? सुबह से भूखा हूँ”। उसने सामने ही पाठशाला के आँगन में भोजन करते हुए बच्चों को देखते हुए कहा।
“देखो, अगर तुम यहाँ प्रतिदिन पढ़ने आओगे तो भोजन, कपड़े, किताबें, सब मुफ्त मिलेगा, तुम्हें भीख नहीं माँगनी चाहिए”।
“मैं पढ़ना चाहता हूँ बाबूजी लेकिन मेरा कोई घर नहीं है, भीख नहीं माँगूँगा तो खोली वाले ‘दादा’ को पैसे कहाँ से दूँगा और अगर एक दिन भी पैसे न दिये तो वो खूब पिटाई करेगा। अगर यहाँ मुझे काम मिल जाए तो मैं पढ़ाई के साथ-साथ वो भी कर लूँगा”।
रमाकांत सोच में पड़ गया। वो यहाँ सरकार की तरफ से शिक्षक के पद पर अनेक सालों से ईमानदारी और समर्पित भाव से कार्य कर रहा था। वो उस बालक की पढ़ने में रुचि देखकर सहायता तो करना चाहता था लेकिन उसे कौनसा काम सौंपे जिससे उसकी समस्या हल हो जाए। हर काम के लिए कर्मचारी नियुक्त थे। सरकारी भुगतान से ही सारा खर्च चलता था और पूरा हिसाब वही रखता था। उसने बालक को साफ कपड़े पहनकर अगले दिन आने के लिए कहा।
“लेकिन बाबूजी साफ कपड़े ‘दादा’ नहीं पहनने देता। वो कहता है, कपड़े जितने गंदे और फटे-पुराने होंगे, भीख उतनी ही अधिक मिलेगी”।
“ठीक है, तुम यहाँ आकर कपड़े बदल लिया करना और जाते समय अपने कपड़े पहनकर जाया करना”।
बालक ने सहमति में सिर हिला दिया।
रमाकांत ने उसे विद्यालय के छोटे-मोटे कार्य सौंपकर उसके लिए दैनिक वेतन तय कर दिया। वो कक्षा शुरू होने से काफी पहले आकर उत्साहपूर्वक अपने कार्य पूरे कर लेता और कक्षा शुरू होते ही एक तरफ बैठकर चुपचाप मनोयोग से पढ़ाई करने लगा। समय बीतने लगा, लेकिन अच्छाई पर हमला करने के लिए बुराई तो ताक में रहती ही है... उस भिखारी बालक की विद्यालय में उपस्थिति न जाने कब, किसकी आँख की किरकिरी बन गई और...
आज के स्थानीय समाचार-पत्र में यह समाचार सुर्खियों में था-
“बाल-श्रम” कराने के आरोप में सरकारी विद्या-मंदिर का शिक्षक रमाकांत सेवा कार्य से निलम्बित”।
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
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“yahaan kyon khade ho bachche, tumhenkyaa chaahie?” kahate hue gaanv ke do kamaron waale us ekamaatr sarakaaree widyaa-mandir ke ek maatr shikshak ramaakaant ne sawaaliyaa nazaron se us bhikhaaree se dikhane waale baalak se poochaa
“kuch bhojan milegaa baaboojee? subah se bhookhaa hoon” usane saamane hee paathashaalaa ke aangan men bhojan karate hue bachchon ko dekhate hue kahaa
“dekho, agar tum yahaan pratidin pढ़ne aaoge to bhojan, kapade, kitaaben, sab mupht milegaa, tumhen bheekh naheen maanganee chaahie”
“main pढ़naa chaahataa hoon baaboojee lekin meraa koee ghar naheen hai, bheekh naheen maangoongaa to kholee waale ‘daadaa’ ko paise kahaan se doongaa aur agar ek din bhee paise n diye to wo khoob pitaaee karegaa agar yahaan mujhe kaam mil jaae to main pढ़aaee ke saath-saath wo bhee kar loongaa”
ramaakaant soch men pad gayaa wo yahaan sarakaar kee taraph se shikshak ke pad par anek saalon se eemaanadaaree aur samarpit bhaaw se kaary kar rahaa thaa wo us baalak kee pढ़ne men ruchi dekhakar sahaayataa to karanaa chaahataa thaa lekin use kaunasaa kaam saunpe jisase usakee samasyaa hal ho jaae har kaam ke lie karmachaaree niyukt the sarakaaree bhugataan se hee saaraa kharch chalataa thaa aur pooraa hisaab wahee rakhataa thaa usane baalak ko saaph kapade pahanakar agale din aane ke lie kahaa
“lekin baaboojee saaph kapade ‘daadaa’ naheen pahanane detaa wo kahataa hai, kapade jitane gande aur phate-puraane honge, bheekh utanee hee adhik milegee”
“theek hai, tum yahaan aakar kapade badal liyaa karanaa aur jaate samay apane kapade pahanakar jaayaa karanaa”
baalak ne sahamati men sir hilaa diyaa
ramaakaant ne use widyaalay ke chote-mote kaary saunpakar usake lie dainik wetan tay kar diyaa wo kakshaa shuroo hone se kaaphee pahale aakar utsaahapoorvak apane kaary poore kar letaa aur kakshaa shuroo hote hee ek taraph baithakar chupachaap manoyog se pढ़aaee karane lagaa samay beetane lagaa, lekin achchaaee par hamalaa karane ke lie buraaee to taak men rahatee hee hai us bhikhaaree baalak kee widyaalay men upasthiti n jaane kab, kisakee aankh kee kirakiree ban gaee aur
aaj ke sthaaneey samaachaar-patr men yah samaachaar surkhiyon men thaa-
“baal-shram” karaane ke aarop men sarakaaree widyaa-mandir kaa shikshak ramaakaant sewaa kaary se nilambit”
kalpanaa raamaanee
nawee munbaee
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“यहाँ क्यों खड़े हो बच्चे, तुम्हेंक्या चाहिए?” कहते हुए गाँव के दो कमरों वाले उस एकमात्र सरकारी विद्या-मंदिर के एक मात्र शिक्षक रमाकांत ने सवालिया नज़रों से उस भिखारी से दिखने वाले बालक से पूछा।
“कुछ भोजन मिलेगा बाबूजी? सुबह से भूखा हूँ”। उसने सामने ही पाठशाला के आँगन में भोजन करते हुए बच्चों को देखते हुए कहा।
“देखो, अगर तुम यहाँ प्रतिदिन पढ़ने आओगे तो भोजन, कपड़े, किताबें, सब मुफ्त मिलेगा, तुम्हें भीख नहीं माँगनी चाहिए”।
“मैं पढ़ना चाहता हूँ बाबूजी लेकिन मेरा कोई घर नहीं है, भीख नहीं माँगूँगा तो खोली वाले ‘दादा’ को पैसे कहाँ से दूँगा और अगर एक दिन भी पैसे न दिये तो वो खूब पिटाई करेगा। अगर यहाँ मुझे काम मिल जाए तो मैं पढ़ाई के साथ-साथ वो भी कर लूँगा”।
रमाकांत सोच में पड़ गया। वो यहाँ सरकार की तरफ से शिक्षक के पद पर अनेक सालों से ईमानदारी और समर्पित भाव से कार्य कर रहा था। वो उस बालक की पढ़ने में रुचि देखकर सहायता तो करना चाहता था लेकिन उसे कौनसा काम सौंपे जिससे उसकी समस्या हल हो जाए। हर काम के लिए कर्मचारी नियुक्त थे। सरकारी भुगतान से ही सारा खर्च चलता था और पूरा हिसाब वही रखता था। उसने बालक को साफ कपड़े पहनकर अगले दिन आने के लिए कहा।
“लेकिन बाबूजी साफ कपड़े ‘दादा’ नहीं पहनने देता। वो कहता है, कपड़े जितने गंदे और फटे-पुराने होंगे, भीख उतनी ही अधिक मिलेगी”।
“ठीक है, तुम यहाँ आकर कपड़े बदल लिया करना और जाते समय अपने कपड़े पहनकर जाया करना”।
बालक ने सहमति में सिर हिला दिया।
रमाकांत ने उसे विद्यालय के छोटे-मोटे कार्य सौंपकर उसके लिए दैनिक वेतन तय कर दिया। वो कक्षा शुरू होने से काफी पहले आकर उत्साहपूर्वक अपने कार्य पूरे कर लेता और कक्षा शुरू होते ही एक तरफ बैठकर चुपचाप मनोयोग से पढ़ाई करने लगा। समय बीतने लगा, लेकिन अच्छाई पर हमला करने के लिए बुराई तो ताक में रहती ही है... उस भिखारी बालक की विद्यालय में उपस्थिति न जाने कब, किसकी आँख की किरकिरी बन गई और...
आज के स्थानीय समाचार-पत्र में यह समाचार सुर्खियों में था-
“बाल-श्रम” कराने के आरोप में सरकारी विद्या-मंदिर का शिक्षक रमाकांत सेवा कार्य से निलम्बित”।
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
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