खुशबू से महकाओ मन khushaboo se mahakaao man खुशबू से महकाओ मन
खुशबू
से महकाओ मन, फूलों की तरहा
रंगों
से भर दो जीवन, बागों की तरहा
कभी
न बनकर बाँध, रोकना बहती धारा
सतत
प्रवाहित रहो धार-नदियों की तरहा
कितना
प्यार जगत में, देखो थोड़ा नमकर
अकड़न, ऐंठन छोड़, फलित डालों की तरहा
ऋतुएँ
रूठें, करो न ऐसी खल करतूतें
रौंद
रहे क्यों भू को, यमदूतों की तरहा
किया
प्रदूषण अब तक अर्पित नीर-पवन को
बनो
चमन मन! हरो दोष, पेड़ों की तरहा
अँधियारों
को राह दिखाओ जुगनू बनकर
उजियारों
से तम काटो तारों की तरहा
बोल
लबों से कभी न फूटें अंगारे बन
मित्र!
चहकते रहो सदा चिड़ियों की तरहा
बात
पुरानी कहने का अंदाज़ नया हो
ज्यों
महफिल तुमको गाए, गज़लों की तरहा
मनुष
बनाकर तुम्हें ईश ने भू पर भेजा
कर्म
“कल्पना” फिर क्यों हों पशुओं की तरहा
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
khushaboo
se mahakaao man, phoolon kee tarahaa
rangon
se bhar do jeewan, baagon kee tarahaa
kabhee
n banakar baandh, rokanaa bahatee dhaaraa
satat
prawaahit raho dhaar-nadiyon kee tarahaa
kitanaa
pyaar jagat men, dekho thodaa namakar
akadan, ainthan chod, phalit daalon kee tarahaa
riituen
roothen, karo n aisee khal karatooten
raund
rahe kyon bhoo ko, yamadooton kee tarahaa
kiyaa
pradooshan ab tak arpit neer-pawan ko
bano
chaman man! haro dosh, pedon kee tarahaa
andhiyaaron
ko raah dikhaao juganoo banakar
ujiyaaron
se tam kaato taaron kee tarahaa
bol
labon se kabhee n phooten angaare ban
mitr!
chahakate raho sadaa chidiyon kee tarahaa
baat
puraanee kahane kaa andaaz nayaa ho
jyon
mahaphil tumako gaae, gazalon kee tarahaa
manush
banaakar tumhen eesh ne bhoo par bhejaa
karm
“kalpanaa” phir kyon hon pashuon kee tarahaa
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
खुशबू
से महकाओ मन, फूलों की तरहा
रंगों
से भर दो जीवन, बागों की तरहा
कभी
न बनकर बाँध, रोकना बहती धारा
सतत
प्रवाहित रहो धार-नदियों की तरहा
कितना
प्यार जगत में, देखो थोड़ा नमकर
अकड़न, ऐंठन छोड़, फलित डालों की तरहा
ऋतुएँ
रूठें, करो न ऐसी खल करतूतें
रौंद
रहे क्यों भू को, यमदूतों की तरहा
किया
प्रदूषण अब तक अर्पित नीर-पवन को
बनो
चमन मन! हरो दोष, पेड़ों की तरहा
अँधियारों
को राह दिखाओ जुगनू बनकर
उजियारों
से तम काटो तारों की तरहा
बोल
लबों से कभी न फूटें अंगारे बन
मित्र!
चहकते रहो सदा चिड़ियों की तरहा
बात
पुरानी कहने का अंदाज़ नया हो
ज्यों
महफिल तुमको गाए, गज़लों की तरहा
मनुष
बनाकर तुम्हें ईश ने भू पर भेजा
कर्म
“कल्पना” फिर क्यों हों पशुओं की तरहा
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी